Tuesday, 1 April 2014

क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी

तुमने सदा ही खून बहाया
मैंने अमन की आस रखी
फिर भला तुम ही बोलो मैं
क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
मैंने तो मस्जिद ना तोड़ी
तुमने मन्दिर क्यूं तोड़े
इबादत की जगह से तुमने
ये तीर नफरती क्यूं छोड़े
धर्मयुद्ध (जिहाद) के नाम पे बोलो
क्यूं आतंक की नींव रखी
फिर भला तुम ही बोलो मैं
क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
इन्सानों को कत्ल करते
शर्म नहीं क्यूं आती है
इस तरह से खून बहाके
क्या तुम्हे शांति मिलती है
बरबाद - ए - गुलिस्तां करने को
तुमने ना कोई कमी रखी
फिर भला तुम ही बोलो
मैं क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
मैं गौ-को माता कहता हूं
तुम उसका खून बहाते हो
जो तेरी माँ का कत्ल करे
क्या उसको गले लगाते हो?
गौ-माता का खून बहाने
वाले तेरी अब खैर नहीं
फिर भला तुम ही बोलो
मैं क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
मैं घायल होकर भी चुप था
तुम रक्त बहाते रहते थे
मेरे धैर्य को शायद तुम
मेरी कायरता समझते थे
जब-जब मेरा धैर्य टूटा
ये धरती रक्त से थी रंगी
फिर भला तुम ही बोलो
मैं क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
पवन प्रजापति ‘पथिक’