देश में जब कोई सैनिक शहीद होता है तो उसके परिवार पर क्या बीतती है उसी को दर्शाती कुछ लाईनें
फिर आज देश की सरहद पर भड़क उठी चिंगारी थी
छुट्टी पर जाना था उसको पर देश की जिम्मेदारी थी
हाथों में हथियार लिये वो कुछ ये हाल कर बैठा
दुश्मन के लोहू से अपनी धरती लाल कर बैठा
दीवाली के दीप जले पर उसके लिए तो होली थी
तभी सीने के पार हुई वो दुश्मन की इक गोली थी
लेकिन भारत का सैनिक इतनी जल्दी कैसे हार गया
मरते मरते भी वो सैनिक दो चार को तो मार गया
खुशियों के माहौल में तब एकदम से उदासी छाई थी
सैनिक की शहादत की खबर जब उसके घर आई थी
बूढ़े बाप की आंखों में भी पानी तब भर आया
तिरंगे में लिपटे उस सैनिक का शव जब घर आया
कई रातों से जगा हुआ वो चिर निद्रा में सोया था
और राखी पर बहना से राखी ना बंधवा पाया था
माँ भी थी पगलाई सी देहरी पर जाकर बैठी थी
बेटे के आने की झूठी आस लगाकर बैठी थी।
पत्नी की हालत लेकिन शब्दों में समा ना पाएगी
उसके पतझड़ में तो अब कभी बहार ना आएगी
छोटे छोटे मासूमों को बात यही बतला पाते
पापा गये हैं दूर देश कोई लौट जहां से ना पाते
‘पथिक’
Monday, 17 August 2015
Monday, 1 June 2015
पथिक
बेशक ये राहें लम्बी है लेकिन
पथिक का तो कोई ठिकाना नहीं है
डगर तेरी आसान हो चाहे मुश्किल
रूकने का कोई बहाना नहीं है
चलते ही जाना है बस काम तेरा
भले साथ चाहे जमाना नहीं है
कड़ी धूप हो चाहे हो ठण्डी छांव
थक कर तुझे कभी सोना नहीं है
बाधाओं का हंस के कर सामना तू
डर के कभी तुझे रोना नहीं है
ना मालूम कब कोई आके ये कह दे
रूक जा कि तेरा ठिकाना यहीं है
पवन प्रजापति ‘पथिक’
पथिक का तो कोई ठिकाना नहीं है
डगर तेरी आसान हो चाहे मुश्किल
रूकने का कोई बहाना नहीं है
चलते ही जाना है बस काम तेरा
भले साथ चाहे जमाना नहीं है
कड़ी धूप हो चाहे हो ठण्डी छांव
थक कर तुझे कभी सोना नहीं है
बाधाओं का हंस के कर सामना तू
डर के कभी तुझे रोना नहीं है
ना मालूम कब कोई आके ये कह दे
रूक जा कि तेरा ठिकाना यहीं है
पवन प्रजापति ‘पथिक’
Tuesday, 5 May 2015
प्रेम......
प्रेम......
यूं तो प्रेम करने से भला किसने कब रोका है
प्रेम जिसे तुम कहते है वो केवल एक धोखा है
जिस्मों का आकर्षण है, उम्र की नादानी है
ना मिली तो ना मिली और मिल जाए तो मौका है
गोपियों ने प्रेम वश मोहन से मन लगाया था
दुनिया बनाने वाले को माखन के लिए नचाया था
राधा ने भी तो कान्हा से सच्चा प्रेम निभाया था
कर्तव्य पथ जब चले कृष्ण, इक आंसू ना टपकाया था
प्रेम ने महलों की रानी मीरा को जोगन बना दिया
हार भुजंग के बने पुष्प और विष को अमृत बना दिया
वो छोड़ महलो के वैभव मोहन के गीत गाती थी
प्रेम में करमाबाई मोहन को भी खीच खिलाती थी
केवल नयनों को भा जाने से प्रेम नहीं होता है
नयनों का क्या काम प्रेम अदृश्य दृगों से होता है
रूप रंग और यौवन समय के साथ मुरझा जाता है
अजर, अमर, पावन है प्रेम जो चिर युवा रहता है
‘पथिक’
यूं तो प्रेम करने से भला किसने कब रोका है
प्रेम जिसे तुम कहते है वो केवल एक धोखा है
जिस्मों का आकर्षण है, उम्र की नादानी है
ना मिली तो ना मिली और मिल जाए तो मौका है
गोपियों ने प्रेम वश मोहन से मन लगाया था
दुनिया बनाने वाले को माखन के लिए नचाया था
राधा ने भी तो कान्हा से सच्चा प्रेम निभाया था
कर्तव्य पथ जब चले कृष्ण, इक आंसू ना टपकाया था
प्रेम ने महलों की रानी मीरा को जोगन बना दिया
हार भुजंग के बने पुष्प और विष को अमृत बना दिया
वो छोड़ महलो के वैभव मोहन के गीत गाती थी
प्रेम में करमाबाई मोहन को भी खीच खिलाती थी
केवल नयनों को भा जाने से प्रेम नहीं होता है
नयनों का क्या काम प्रेम अदृश्य दृगों से होता है
रूप रंग और यौवन समय के साथ मुरझा जाता है
अजर, अमर, पावन है प्रेम जो चिर युवा रहता है
‘पथिक’
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