प्रेम......
यूं तो प्रेम करने से भला किसने कब रोका है
प्रेम जिसे तुम कहते है वो केवल एक धोखा है
जिस्मों का आकर्षण है, उम्र की नादानी है
ना मिली तो ना मिली और मिल जाए तो मौका है
गोपियों ने प्रेम वश मोहन से मन लगाया था
दुनिया बनाने वाले को माखन के लिए नचाया था
राधा ने भी तो कान्हा से सच्चा प्रेम निभाया था
कर्तव्य पथ जब चले कृष्ण, इक आंसू ना टपकाया था
प्रेम ने महलों की रानी मीरा को जोगन बना दिया
हार भुजंग के बने पुष्प और विष को अमृत बना दिया
वो छोड़ महलो के वैभव मोहन के गीत गाती थी
प्रेम में करमाबाई मोहन को भी खीच खिलाती थी
केवल नयनों को भा जाने से प्रेम नहीं होता है
नयनों का क्या काम प्रेम अदृश्य दृगों से होता है
रूप रंग और यौवन समय के साथ मुरझा जाता है
अजर, अमर, पावन है प्रेम जो चिर युवा रहता है
‘पथिक’
यूं तो प्रेम करने से भला किसने कब रोका है
प्रेम जिसे तुम कहते है वो केवल एक धोखा है
जिस्मों का आकर्षण है, उम्र की नादानी है
ना मिली तो ना मिली और मिल जाए तो मौका है
गोपियों ने प्रेम वश मोहन से मन लगाया था
दुनिया बनाने वाले को माखन के लिए नचाया था
राधा ने भी तो कान्हा से सच्चा प्रेम निभाया था
कर्तव्य पथ जब चले कृष्ण, इक आंसू ना टपकाया था
प्रेम ने महलों की रानी मीरा को जोगन बना दिया
हार भुजंग के बने पुष्प और विष को अमृत बना दिया
वो छोड़ महलो के वैभव मोहन के गीत गाती थी
प्रेम में करमाबाई मोहन को भी खीच खिलाती थी
केवल नयनों को भा जाने से प्रेम नहीं होता है
नयनों का क्या काम प्रेम अदृश्य दृगों से होता है
रूप रंग और यौवन समय के साथ मुरझा जाता है
अजर, अमर, पावन है प्रेम जो चिर युवा रहता है
‘पथिक’