Thursday, 27 April 2017

छोड़ प्रणय के गीतों को अब रण के गीत सुनाता हूं..

एक सैनिक को कितने बलिदान देने पड़ते हैं...
ये बताने का एक छोटा सा प्रयास मेरी ये कविता

ऐसा तो नहीं है प्रेम के गीत मुझे ना भाते हों.
गोरी के कजरारे नैना मुझको ना बुलाते हो
मेरा भी तो मन था आलिंगन में उसके सोने का
और नयनों की उन झीलों में डूब के बस खो जाने का
राखी के दिन सूनी कलाई किसको भला सुहाती है
और तुम्हारी तरह बच्चों की याद मुझे भी आती है
माँ के हाथों की वो रोटी मुझको भी तो भाती थी
थपकी देकर गोदी में माँ मुझको भी सुलाती थी
लेकिन उस माता से ज्यादा भारत माता मानी थी
और राष्ट्र की रक्षा हेतु मर मिटने की ठानी थी
छोड़ आया अपनी माता को नयनों में अश्रु धार लिए
मैं सेज सूनी कर आया, बैठी वो हृदय में प्यार लिए
मैं भूला प्रेमिका की छवि, चण्डिका पूजा करता हूं
मैं छोड़ प्रणय के गीतों को अब रण के गीत सुनाता हूं..