धरा पर कुछ यूं बरसे मेघ, हुआ सब पानी पानी है
कहीं रिसती छतें हैं तो, कहीं छत आसमानी है
कहीं कागज की कश्ती संग बहता बचपन नादानी है
और सावन की बून्दोँ संग कहीं खिलती जवानी है
इन सावन की बून्दों की अजब सी ये कहानी है
कहीं ये उम्मीदें है तो कहीं उम्मीदों पर ही पानी है
बरसती है कहीं पर तो ये खुशियों की कहानी है
किसी को आँखों की नमी, इन बून्दों संग छुपानी है
स्वरचित