Sunday, 24 May 2020
कान्हा की मुरली
Friday, 22 May 2020
कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े
मैं हूं पत्थर सी मूरत में कौन गढ़े
लज्जा रेखा के इस पार कौन बढ़े
प्रेम की कोई भाषा तो होती नहीं
कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े
Monday, 11 May 2020
कहानी : सुबह का भूला
Saturday, 9 May 2020
कुत्तों का शहर
कुत्तों का शहर
दो कुत्ते शहर की लगभग सुनसान सड़क पर चहलकदमी करते चले जा रहे थे।
एक कुत्ता बोला ''क्या हुआ भाई! क्या शहर के ज्यादातर इंसान, शहर छोड़कर चले गये हैं ? सिर्फ इक्का — दुक्का लोग ही दिख रहे है।''
दुसरा — ''हॉं भाई मुझे भी ऐसा ही लगता है। पिछले काफी दिनों से देख रहा हूॅं, सड़क पर इन्सानों से ज्यादा तो कुत्ते नजर आ रहे हैं मानों इंसानों के शहर में कुत्ते नहीं बल्कि कुत्तों के शहर में इंसान घूम रहे हैं''
तभी पीछे की तरफ से आती हुई किसी गाड़ी का सायरन उन्हें सुनाई देता है।
''भागो! लगता है फिर से शहर में कुत्तों को पकड़ने वाली गाड़ी आ गयी है। जान बचाना चाहते हो तो निकल लो यहां से।''
इतने में सायरन वाली गाड़ी आ पहुंचती है और उनसे थोड़ी ही दूरी पर रूकती है। गाड़ी में से विचित्र वेशभूषा वाले दो आदमी उतरते हैं जिन्होंने अपने पूरे शरीर को सफेद कपड़ों में ढक रखा है। वे दोनों आदमी किसी दूसरे ग्रह के प्राणी होने का आभास दे रहे थे। उन्होंने हाथों में दस्ताने पहने हुए हैं। वे दोनों आदमी सड़क पर चल रहे तीसरे आदमी को पकड़कर बलपूर्वक गाड़ी में धकेल देते हैं और गाड़ी वहां से चली जाती है।
सड़क पर खड़े दोनों कुत्ते विस्मय से एक दूसरे का मुँह देखने लग जाते हैं।