Sunday, 24 May 2020

कान्हा की मुरली

इक दिन इक मुरली वाला
मुरली बेचन गोकुल आया
मुरली की मीठी धुन सुनकर
कान्हा का जी भी ललचाया

बंशी की धुन से खींचा हुआ
कान्हा भागा सा जाता था
उस ओर जिधर मुरली वाला
मीठी सी तान सुनाता था

उसने देखा इक वृक्ष तले
वो मुरली वाला रहता था
अपने हाथों में मुरली ले 
वो सबको पुकारा करता था

नन्हा कान्हा जा बैठ पास
बोला मैं भी मुरली लूंगा
मुरली का जो भी मूल्य लगे
बाबा से लेकर दे दूंगा

मुरली ये कैसे बजती है
पहले मुझको भी सिखलाओ
अपने अधरों से छू करके
इक बार बजाकर दिखलाओ

मुरली वाला बोला कान्हा
कैसे ये मुरली बजाओगे?
आयु में भी तुम छोटे हो
ये काम नहीं कर पाओगे
 
कान्हा हठ कर बैठा बोला
मैं भी बंशी ये बजाऊंगा
मीठी सी तान बजा कर के
माँ - बाबा को दिखलाऊंगा

छोटी मुरली दे कान्हा को
बोला अधरों से लगाओ तो
कैसे इसको बजाओगे तुम
तनिक मुझे दिखलाओ तो

कान्हा ने मुरली ली कर में
बाले हे माँ शारद वर दो
मेरी मुरली भी बोल उठे
मेरी मुरली को भी स्वर दो

फिर कान्हा ने उस मुरली को
निज अधरों से ज्योंही छुआ
मुरली से मीठी तान उठी
मुरलीवाला भी चकित हुआ

सातों सुर नतमस्तक हो
मुरली की धुन पर यूं नाचे
मानों वे भी थे धन्य हुए 
जो कान्हा की मुरली बाजे

मुरली की धुन से सम्मोहित
सुरबालाएं भी थिरक उठी
पूरा गोकुल भी विस्मित था
आखिर ये कैसी तरंग उठी

जिसने भी उसकी तान सुनी
वो बेसुध होता जाता था 
उसके सुर के सम्मोहन में
ब्रह्माण्ड झूमता जाता था

मुरली वाला करबद्ध खड़ा
आँखों से आँसूं बहते थे
किन्तु अन्तर के भावों को
दो अधर बोल ना पाते थे

कान्हा की मुरली की धुन से 
शिव - ब्रह्मा भी हर्षाते थे
सुर समस्त करबद्ध खड़े
बस कान्हा का यश गाते थे

Friday, 22 May 2020

कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े

मैं हूं पत्थर सी मूरत में कौन गढ़े

लज्जा रेखा के इस पार कौन बढ़े

प्रेम की कोई भाषा तो होती नहीं

कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े

Monday, 11 May 2020

कहानी : सुबह का भूला

शहर से सोहन को शुरू से लगाव रहा है, शहर से आने वाले लड़के जब उसके सम्मुख शहरी चकाचौंध का वर्णन करते तो सोहन अपनी कल्पना में शहर का चित्र खींचने लग जाता। उनको जब नये एवं चमकदार वस्त्र पहने देखता तो स्वयं को उनके सामने बहुत निम्न श्रेणी का महसूस करता। गांव की कच्ची सड़कों एवं कच्चे मकानों को देख — देख कर मन ही मन दु:खी होता और ईश्वर को उलाहना देता कि उसे किसी शहर में क्यों नहीं पैदा किया। बार — बार के उलाहनों के बाद इस बार ईश्वर ने कदाचित सोहन का उलाहना सुन लिया था। सोहन का मित्र श्याम इस बार गर्मियों की छुट्टियों में गांव आया हुआ था। उसके सेठ की दुकान पर काम करने के लिये लड़कों की आवश्यकता थी। श्याम के कहने भर की ही देर थी। सोहन तो पहले से ही ऐसे किसी अवसर की प्रतीक्षा में था, खुशी — खुशी श्याम के साथ शहर के लिये रवाना हो गया। सोहन तो इतना उत्सुक था मानों अपनी प्रेमिका के प्रथम दर्शन के लिये जा रहा हो। सफर के दौरान रात्रि में सोया भी नहीं, क्या पता नीन्द में कितने शहर निकल जायेंगे और सोहन उन्हें निहारने से वंचित रह जायेगा। लगभग दो दिन व एक रात के सफर के बाद श्याम व सोहन शहर में उतर चुके थे। शाम का समय था, रंगीन रोशनियों से नहायी ऊॅंची—ऊॅंची ईमारतों को चीरती सड़क पर चलते हुए सोहन को स्वयं के इन्द्रपुरी में होने का आभास हो रहा था। कुछ मिनटों के पैदल सफर के बाद दोनों अपने निवास पर पहुंच गये। सुबह श्याम ने सोहन को अपने सेठ से मिलवा दिया। मासिक वेतन तय कर दिया गया। सोहन काम पर लग गया था। रहने के लिये छोटी सी खोली थी जिसमें श्याम और सोहन दोनों रहते थे। सुबह 9 से रात्रि 10 बजे तक काम और उसके बाद हाथों से भोजन बनाना और खाना बस यही सोहन की दिनचर्या थी। समय बीतता गया। धीरे — धीरे सोहन का शहर के प्रति आकर्षण कम होता गया। रात्रि के समय जब दुकान से घर लौटता तो रोशनी से नहाई इमारतें अब उसे पहले की तरह लुभाती नहीं थी। शहर के युवकों को आधुनिक वस्त्र पहने देख अब वह पहले की तरह उनकी तरफ आकर्षित भी नहीं होता था। 

समय रथ अपनी गति से चल रहा था। इसी दौरान देश में भयंकर महामारी फैल गयी। कई इससे बचाव की अभी तक कोई दवाई नहीं थी। इन्सानों के एक दूसरे से स्पर्श से ही यह बिमारी फैल जाती थी। शहरों में धनी आबादी होने के चलते यहां सबसे ज्यादा खतरा था, लिहाजा सरकार ने शहरों को अनिश्चितत काल के लिये बन्द कर दिया। ​24 घण्टे दौड़ने वाला शहर बिल्कुल थम गया। सड़कों पर मरघट का सन्नाटा पसर गया। लोग अपने घरों में दुबक गये। सड़कों पर पुलिस एवं रोगीवाहनों के अतिरिक्त कोई दिखाई न देता था। श्याम व सोहन अपनी कड़ी मेहनत के बाद भी महीने के अन्त में अपने लिये कोई ज्यादा बचत नहीं कर पाते थे। जो थोड़ी बहुत पुंजी उन्होंने जोड़ी थी वो कुछ ही दिनों में खर्च हो गयी।  खाने के लाले पड़ गये। साल भर के अनुभव ने सोहन को यह सिखा दिया था कि शहरों में लोग अपने पड़ौंसियों से भी ज्यादा मेल मिलाप नहीं रखते जबकि उसका पूरा गांव सिर्फ गांव न होकर एक परिवार था। किसी को भी छोटी सी समस्या होने पर गांव वाले उसकी पूरी मदद करते थे। उसके गांव में तो गाय व कुत्तों तक को भूखे नहीं मरने दिया जाता जबकि शहर में इन्सानों की भूख की भी किसीको चिन्ता नहीं है। चकाचौंध वाला शहर अब सोहन को काटने को दौड़ता था। 

मजदूरों की खस्ता हालत को देखते हुए सरकार ने उन्हें अपने — अपने गांव भेजने के लिये गाड़ियों की व्यवस्था कर दी। शहर भर के मजदूर अपने — अपने गांव जाने के लिये रवाना हो गये। श्याम व सोहन भी सरकारी गाड़ियों में लद गये। 

सुबह का भूला शाम को लौट आया था। दोनों गाड़ी से उतरते ही तेज कदमों से गांव की तरफ चल दिये। गांव के कच्चे मकान दूर से ही दिखाई दे रहे थे। जिस गांव को सोहन कोसता रहता था वही गांव आज मानों किसी मॉं की तरह अपने बच्चे की सारी गलतियों को क्षमा कर उसे अपने सीने से लगाने के लिये उतावला था और अपनी बांहें फैलाकर खड़ा था।

Saturday, 9 May 2020

कुत्तों का शहर

कुत्तों का शहर

दो कुत्ते शहर की लगभग सुनसान सड़क पर चहलकदमी करते चले जा रहे थे।

एक कुत्ता बोला ''क्या हुआ भाई! क्या शहर के ज्यादातर इंसान, शहर छोड़कर चले गये हैं ? सिर्फ इक्का — दुक्का लोग ही दिख रहे है।''

दुसरा — ''हॉं भाई मुझे भी ऐसा ही लगता है। पिछले काफी दिनों से देख रहा हूॅं, सड़क पर इन्सानों से ज्यादा तो कुत्ते नजर आ रहे हैं मानों इंसानों के शहर में कुत्ते नहीं बल्कि कुत्तों के शहर में इंसान घूम रहे हैं''

तभी पीछे की तरफ से आती हुई किसी गाड़ी का सायरन उन्हें सुनाई देता है।

''भागो! लगता है फिर से शहर में कुत्तों को पकड़ने वाली गाड़ी आ गयी है। जान बचाना चाहते हो तो निकल लो यहां से।''

इतने में सायरन वाली गाड़ी आ पहुंचती है और उनसे थोड़ी ही दूरी पर रूकती है। गाड़ी में से विचित्र वेशभूषा वाले दो आदमी उतरते हैं जिन्होंने अपने पूरे शरीर को सफेद कपड़ों में ढक रखा है। वे दोनों आदमी किसी दूसरे ग्रह के प्राणी होने का आभास दे रहे थे। उन्होंने हाथों में दस्ताने पहने हुए हैं। वे दोनों आदमी सड़क पर चल रहे तीसरे आदमी को पकड़कर बलपूर्वक गाड़ी में धकेल देते हैं और गाड़ी वहां से चली जाती है।

सड़क पर खड़े दोनों कुत्ते विस्मय से एक दूसरे का मुँह देखने लग जाते हैं।

Thursday, 7 May 2020

शब्द बन गूंजूं

मैं हूं बादल मेरा क्या है
ज्यूं बहे पवन वहीं बह लूं

मुसाफिर हूं भरोसा क्या
बजी सिटी और चल दूं

तेरी दुनिया परेशां क्यूं
मिले ईश्वर तो मैं पूछूं

साधक हूँ बस शब्दों का
सिवा इसके मैं क्या चाहूँ

कभी जब देह ना रह पाए
मैं तब भी शब्द बन गूंजूं