Friday, 11 December 2020

लघुकथा : जिम्मेदारियों का बोझ

लघु कथा : जिम्मेदारियों का बोझ

पिता के असमय अवसान ने बहुत जल्द जिम्मेदारियों का बोझ उसके नाजुक कन्धों पर लाद दिया था। घर के मुखिया के असमय अवसान से उसका घर बिखर चुका था। लेकिन वह परिस्थितियों से हारा नहीं बल्कि चुनौती समझ अपनी कमर बांधी और बिखरे घर को समेटने में जुट गया । मेहनत की सीमेन्ट में पसीने को मिलाकर आखिरकार उसने अपना बिखरा हुआ घर फिर से समेट ही लिया। वह नहीं चाहता था कि इतनी मेहनत से बना उसका घर बिखर जाये इसलिये घर की नींव में खुद खड़ा हो गया और पूरे घर को अपने कन्धों पर उठा लिया। कई तूफान और भूकम्प आये लेकिन उसने अपने घर को मजबूती से थामे रखा और बिखरने नहीं दिया।
इस दौरान कई बरस बीत गये। जिम्मेदारियों ने पता ही नहीं चलने दिया कि कब युवावस्था विदा हो चुकी थी और बुढ़ापा द्वार पर दस्तक दे रहा था। अब उसके हाथों में वह ताकत नहीं थी कि इस घर को ज्यादा दिनों तक सम्भाल कर खड़ा हो सके। उसे डर था कि अब यदि छोटा सा तूफान या भूकम्प भी आया तो वह अपने घर को सम्भाल नहीं सकेगा। उसका डर सही भी निकला। अचानक कहीं से एक तूफान आया और मकान की नींवें हिलने लगी।  वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी मकान को बिखरने से बचाने में असमर्थ था। उसके हाथ और पैर कांप रहे थे और घर बिखरने को था कि अचानक कहीं से दो मजबूत कन्धे उसकी मदद को आगे आये। उन कन्धों में शक्ति की कोई सीमा नहीं थी। उन भुजाओं का बल मानों पर्वत को चीर देने की क्षमता रखता था। देखते ही देखते उन कन्धों ने उसका सारा भार अपने ऊपर ले लिया। तूफान उसकी शक्ति के आगे नतमस्तक हो गया। वृद्ध आँखों ने जब ऊपर देखा तो पाया कि यह उसका युवा पुत्र था जिसने अपने पिता को भार से मुक्त कर दिया। उसे अब भरोसा हो गया कि उसका पुत्र अब उसके घर को बिखरने नहीं देगा। भावनाएं पानी का रूप लेकर आँखों में छलछला गयीं।