Sunday, 3 April 2022

गिद्धों की विलुप्ति

गिद्धों की विलुप्ति
प्राचीन समय में गिद्ध बहुतायत में पाये जाते थे। राजतन्त्र था, प्रत्येक राजा का अपनी सीमाओं के विस्तार के लिये दूसरे राजा से संघर्ष जारी रहता था। लगातार होते युद्धों में दोनों ओर से भारी संख्या में मारकाट मचती, हजारों की संख्या में निर्दोष सैनिक मारे जाते। गिद्धों के लिये ऐसे युद्ध किसी महाभोज से कम न थे। गिद्धों के दिन भी आराम से व्यतीत हो रहे थे। समय बीतता गया। धीरे — धीरे राजतन्त्र का स्थान लोकतन्त्र ने ले लिया। सैंकड़ों राज्यों का विलय एक ही देश में होने लगा। अब सीमाओं के विस्तार के लिये पहले की तरह युद्ध नहीं होते थे। अगर युद्ध होे भी थे तो उतनी जनहानि नहीं होती थी। जिन गिद्धों को इंसानी मांस नोचने की आदत लग चुकी थी उन्हें अब आवारा पशुओं के शवों से सन्तोष करना पड़ता था। यह बात उन्हें अन्दर ही अन्दर कचोट रही थी। गिद्ध आखिरकार कितने दिनों तक अपने आत्मसम्मान से समझौता करते। थक हार ​कर गिद्धों घनघोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया और अगले जन्म में गिद्ध के स्थान पर मनुष्य योनि का वरदान मांगा। ब्रह्माजी तथास्तु कहकर अदृश्य हो गये। अब गिद्ध धीरे — धीरे मनुष्य योनि में जन्म लेने लगे। कुछ गिद्ध राजनीति में उतर गये तो कुछ अलग — अलग रूप धर कर विभिन्न विभागों में फैल गये। हर जगह लाशों को नोचने का उनका काम बदस्तूर जारी था। अब लाश चाहे किसी की भी हो मानव गिद्ध उसे पूरे बेशर्मी से नोचते। लाशें नोचने में तो वे पहले से ही सिद्ध हस्त थे। मानव देह ने उनका काम और आसान कर दिया। अब वे बेधड़क और बेशर्मी से लाशें नोचते। कुछ गिद्धों ने अपने आतंकी समूह भी बना​ लिये और ​जीवित मनुष्यों का शिकार करने लगे। धीरे — धीरे आसमान में गिद्धों की संख्या कम पड़ने लगी और मानव देह धारी गिद्धों की संख्या बढ़ने लगी।