नन्दी भी अब डोल रहे हैं
बन्द पड़े पट खोल रहे हैं
बरसों से जो मौन पड़े थे
वो पत्थर भी बोल रहे हैं
बोल रहा है चप्पा — चप्पा
खण्डित प्रतिमा बोल रही है
जिसने झेला आघातों को
वो दीवारें बोल रही है
बोल रहा बाबा का डमरू
और त्रिशूल भी बोल रहा है
नीलकण्ठ से लिपट लिपट कर
नाग वासुकी बोल रहा है
और जटाओं से गंगा की
लहरें हर — हर बोल रही है
बोल रही है आज हवाएं
दशों दिशाएं बोल रही है
बोल रहे हैं धरती अम्बर
मां गौरा भी बोल रही है
बोली हर — हर महादेव की
कण कण काशी बोल रही है