Tuesday, 9 August 2022

चारधाम यात्रा भाग 2

 यमुनोत्री 

सुबह मोबाईल के अलार्म ने चीख चीख कर जब पांच बजने का संकेत देना शुरू किया तो हमें भी उठना ही पड़ा। कभी सोचता हूं यह मोबाईल हमें बात करवाने के अलावा भी कितने काम करता है। दुनिया से रूबरू करवाना, फोटोग्राफर, घड़ी, अलार्म, रास्ता भटकने पर गाइड और भी न जाने क्या - क्या। हमारी चारधाम यात्रा का विधिवत प्रारम्भ आज ही था। दैनिक कार्यों से निवृत होकर सभी यात्री अपना - अपना सामान लेकर धर्मशाला के मध्य में बने प्रांगण में आकर बैठ गये। कुछ बन्धु तो प्रातः काल फिर गंगा स्नान कर आये। प्रांगण के मध्य में विश्राम हेतु बनी कुर्सियों पर बैठकर सभी यात्री चाय-कॉफी की चुस्कियां ले रहे थे। प्रांगण में ही सुन्दर मन्दिर है जहां भगवान राम, महादेव, माँ दुर्गा आदि देवी - देवताओं की मूर्तियां लगी हुई है। मन्दिर से आ रही आरती व घंटे की ध्वनि वातावरण की पावनता को बढ़ा रही थी। भोजनादि से निवृत होते - होते हमें आठ बज गये। बसें भी तब तक आ चुकी थी। चालीस यात्रियों को तीन बसों के अनुसार तीन समूहों में बांटा गया। सभी यात्री अपने - अपने समुह अनुसार बसों में जा जमे हम अपने पहले पड़ाव अर्थात माँ यमुना के उद्गम स्थल यमुनोत्री की ओर निकल पड़े।
हरिद्वार से निकलते ही जोरदार बारिश ने हमारा स्वागत किया । देहरादून से आगे जाकर हम यमुनोत्री मार्ग की ओर मुड़ गये जो राजमार्ग की अपेक्षा थोड़ा संकरा है। रास्ते के दोनों ओर आमों से लदे पेड़ थे जो मानों अपनी टहनियां झुका कर हमारी मनुहार कर रहे थे। कुछ घण्टों की यात्रा के पश्चात् हमारी बसें पहाड़ी मार्गो पर थी। जहां तक दृष्टि जाती वहां ऊंचे-ऊंचे पर्वत ही दिखाई दे रहे थे। पर्वतों के ऊंचे शिखर मेघों को चूम रहे थे। पहाड़ियों में यत्र - तत्र बिखरे सफेद बादलों को देख कर प्रतीत होता था मानो किसी ने पर्वत श्रृंखला में जगह - जगह रूई के फाहे बिखेर दिये हो। चाय - पानी हेतु गाड़ी कहीं रूकती तो सभी यात्री घाटी के मनोरम दृश्यों को अपने मोबाईल के कैमरों में सहेज लेते। पूरा दिन यात्रा में ही बीता रात्रि विश्राम यमुनोत्री से थोड़ा पहले खरादी गांव में एक होटल में किया। होटल में ही भोजन बनाया व भोजनोपरान्त सड़क पर टहलने निकल गये। पर्वतों पर चीड़ व देवदार के वृक्ष ध्रुव समाधी की मुद्रा में खड़े हैं। रात के सन्नाटे में भी यमुना व्याकुल होकर भाग रही थी और उसकी व्याकुलता का शोर रात्रि की नीरवता पर चोट कर रही थी। पलकों के घोंसलों पर नीन्द के पंछी ने बसेरा डाल दिया था और पलके उसके बोझ से दबी जा रही थी।
सुबह जल्दी हमने जानकीचट्टी के लिये प्रस्थान किया क्योंकि बसें जानकी चट्टी तक ही जाती हैं। जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक 5 किलोमीटर की यात्रा अपनी इच्छानुसार पैदल, घोड़ा या पालकी से कर सकते हैं। कुछ साथी घोड़ों पर सवार हो गये यद्यपि अधिकांश ने पैदल ही चढ़ने का निर्णय लिया। भोजन सभी ने जानकी चट्टी पहुंचकर ही किया। बारीश भी शुरु हो चुकी थी सो सभी ने रेनकोट पहन लिये। जिनके पास रेनकोट नहीं थे उन्हें वहीं से खरीदने पड़े । पैदल चढ़ाई के लिऐ लकड़ियां खरीदी और यमुनोत्री की ओर प्रस्थान किया। बारीश ने लगभग पूरे रास्ते हमारा साथ दिया मानों वह भी हमारे साथ ही यमुनोत्री की यात्रा कर रही थी। साधारण सड़क की तुलना में चढ़ाई वाले रास्तों पर पैदल चलना अत्यन्त दुष्कर है। थोड़ा सा चलने पर सांस फूलने लगती है और विश्राम करना पड़ता है। इसी तरह विश्राम करते - करते यमुनोत्री तक की 5 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने में लगभग 3 घण्टे से अधिक का समय लग गया। मन्दिर तक पहुंचते - पहुंचते सभी थक कर चूर हो चुके थे। एक कदम तक भरने की स्थिति नहीं रही।
यमुनोत्री की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 3300 मीटर है। ऊपर से बारीश होने के कारण ठण्ड भी अधिक थी। यमुनोत्री माँ यमुना का उद्गम स्थल है। मन्दिर परिसर में ही महिला व पुरुषों हेतु के स्नान हेतु अलग - अलग तप्त कुण्ड बने हुए हैं जिनमें दैवीय कृपा से गर्म पानी आता है। दर्शनों से पहले सभी स्नान करने कुण्ड में उतरे। कुण्ड के पानी का स्पर्श पातें ही ऐसा लगा मानो स्वयं माँ यमुना हमें अपनी गोद में लेकर दुलार रही हो। आश्चर्यजनक रूप से यात्रा की सारी थकान पल भर में जाती रही।

 स्नानोपरान्त माँ यमुना को प्रणाम किया हाथ में जल लेकर आचमन किया और मन्दिर के दर्शन किये। मन्दिर में माँ यमुना श्वेत व श्याम दो रूपों में विराजमान है। मन्दिर के निकट ही एक छोटा सा गर्म पानी का कुण्ड है जिसें खौलता हुआ गर्म पानी आता है। उस पानी में चावल उबाल कर उसका प्रसाद लिया जाता है। सभी ने चावल उबाले और प्रसाद ग्रहण किया। दर्शनोपरान्त पैदल नीचे उतरे। ऊँचा उठना जितना कष्टप्रद व मेहनता भरा है उतना ही आसान नीचे उतरना या गिरना है फिर वह चाहे व्यक्ति हो या चरित्र। चढ़ने में जहां हमें तीन घण्टे से अधिक समय लग गया वहीं मात्र डेढ़ घण्टे में नीचे उतर गये। होटल पहुंचते - पहुंचते शाम हो चली थी और थकान के कारण यात्रा सम्भव न थी। पहाड़ियों पर अन्धेरे की चादर तन गयी थी। हमने भी रात्रि विश्राम वहीं करने का निर्णय लिया।

Sunday, 7 August 2022

चारधाम यात्रा भाग 1

कहते हैं महादेव के दर्शनों की अभिलाषा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक स्वयं महादेव आपको दर्शन देने नहीं बुला लेते। हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। मई माह की एक सुबह की वेला थी। पूजा पाठ आदि से निवृत होकर बैठे ही थे कि एक परम मित्र जसारामजी पधारे और बाबा केदारनाथ सहित चारधाम के दर्शनों की इच्छा प्रकट की और हमें भी साथ चलने का आग्रह किया। हृदय में भाव प्रकट हुआ कि जब स्वयं महादेव कृपा कर बुला रहे हैं तो ऐसे अवसर को हाथ कौन हाथ से जाने देगा? बड़े भैया, भाभी, मैं स्वयं, मेरी धर्मपत्नी एवं माताजी ने चलने के लिए सहर्ष अपनी सहमति दे दी।
यात्रा के लिए ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी। आरम्भ में हमारा दल 15 - 20 लोगों का ही था। लेकिन जैसे - जैसे लोगों को सूचनाएं मिलती गयी, यात्रियों का दल बढ़ता गया क्योंकि एक अच्छा संघ सभी चाहते हैं। एक बारगी तो यात्रियों की संख्या 60 तक आस-पास पहुंच चुकी थी लेकिन कुछ यात्रियों ने अपरिहार्य कारणों से यात्रा रद्द कर दी और प्रस्थान तिथि तक 40 यात्री रहे जिनमें स्थानीय रामद्वारा के सन्त और मेरे गुरुदेव पूज्य श्री सोहनरामजी महाराज भी थे। 29 यात्रियों का टिकट निमाज से ही था बाकी 11 प्रवासी बन्धु थे जिन्हें सीधे हरिद्वार पहुंचना था। यात्रा की पूर्व सन्ध्या को ही हमने अपनी तैयारियां एवं आवश्यक सामान की पैकिंग पूर्ण कर ली थी। प्रस्थान से पहले की रात्रि कुछ अधिक लम्बी लग रही थी। यात्रा के उल्लास ने नीन्द के पंछी को आंखों के कोटरों में आने से रोक रखा था।
नियत तिथि 27 जून को प्रस्थान से पहले सभी यात्रियों ने राघव निवास रामद्वारा माथा टेका व परम पूज्य गुरुदेव श्री माधवरामजी महाराज के चरणों में शीश नवाकर उनका आशीर्वाद लिया क्योंकि उनका आशीर्वाद लिये बिना तो यात्रा प्रारम्भ ही नहीं की जा सकती थी। महाराजश्री ने सभी को आशीर्वाद देकर यात्रा की सफलता की मंगलकामना की। महाराजश्री का आशीर्वाद प्राप्त कर हम बस स्टेशन पहुंचे जहां बस पहले से हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। भोजन बनाने की सामग्री व रसोईये हमारे साथ ही थे। गाड़ी में बैठने से पूर्व सभी यात्री अपने परिजनों से मिले जो हमें विदा करने बस स्टेशन तक आए थे। नम आंखों व हृदय में उल्लास लिये हमने भी विदा ली।
लगभग 4.45 बजे हम निमाज से रवाना हो गये लेकिन ब्यावर आकर बस को रोक दिया गया। भीषण गर्मी व उमस में भी बस का एसी काम नहीं कर रहा था। ब्यावर में बस लगभग तीन घण्टे रूकी रही। एसी के मैकेनिक को बुलाया गया लेकिन सारी कोशिशों के बाद भी बस का एसी ठीक नहीं हुआ। परिस्थिति से समझौता करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प था भी नहीं। भीषण गरमी में बस में यात्रा करना बहुत कठिन था परन्तु कदाचित महादेव की यही इच्छा थी। कम्प्रेशर के पानी से टपकती बस की छत के बीच हमने बड़ी मुश्किल से रात्रि का सफर बिताया।
सुबह हरिद्वार में प्रवेश करते करते हमें दस बच चुके थे। सभी अपनी दृष्टि खिड़कियों पर गड़ाये हरिद्वार के सौन्दर्य दर्शन में खोए हुए थे। मनोरम दृश्यों को सभी ने खिड़कियों से ही अपने मोबाइल के कैमरों में सहेजा। स्थान - स्थान पर बने मन्दिर व आश्रम हरिद्वार के ‘धर्मनगरी’ उपनाम को सार्थक कर रहे हैं। दूर से ही महादेव की विशालकाय प्रतिमा के दर्शन होते हैं जिनके एक हाथ में त्रिशूल है और दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है मानो हम से कह रहे हों, आ गये भक्तों! मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। निकट ही मोक्षदायिनी माँ गंगा की निर्मल धारा अविरल बह रही है जिसके दोनों तटों पर सुन्दर घाट बने हुए हैं। घाटों पर लोग डुबकियां लगा रहे हैं वही स्थान - स्थान पर पण्डितों के के पास छोटे - छोटे समुहो में भी लोग बैठे हैं जो कदाचित माँ गंगा की पूजा कर रहे हैं अथवा अपने परिजनों का अन्तिम क्रियाकर्म।
बस की खिड़कियों से हरिद्वार का सौन्दर्य निहारते - निहारते कब पार्किंग आ गयी पता ही नही चला। सभी यात्री बस से उतरे व अपना - अपना सामान उतारा। भोजन के सामान ने हमारा भार बढ़ा दिया था। हरिद्वार में गरमी व उमस अपने चरम पर थी। स्थिति यह थी कि खड़ा होना भी दूभर था। अच्छी बात यह थी कि हमने धर्मशाला पहले से बुक कर रखी थी अन्यथा इस भीषण गरमी में धर्मशाला ढूंढने के लिये घूमना अत्यन्त दुष्कर था। सभी यात्री ऑटो करके धर्मशाला पहुंचे।
‘रावी प्रेम सभा धर्मशाला’ पहुंच कर सभी ने पहले यात्रा की थकान उतारी। भूख के मारे सभी का हाल बेहाल था। भोजन बनाने वाले अपने काम पर लग गये। कुछ ही देर में भोजन तैयार हो गया। भोजनोपरान्त विश्राम कर बाजार में आगे की यात्रा हेतु बसें बुक करने निकल गये 40 यात्रियों के लिये 3 टेम्पो ट्रेवल्स बसें बुक कर ली। शाम तक बाकी के 11 यात्री भी हरिद्वार पहुंच गये 40 यात्रियों का समूह अब पूरा हो चुका था
शाम को सभी गंगा स्नान के लिये हर की पौड़ी पहुुंचे। अमावस्या होने के कारण घाट पर भीड़ कुछ अधिक थी। घाट पर पहुंचकर हमने मां गंगा की निर्मल धारा में डुबकी लगायी और यात्रा की सफलता के लिए उनका आशीर्वाद लिया। लगभग आधे घण्टे तक सभी माँ गंगा की गोदी में ही रहे। सन्ध्या का समय होने को था और गंगा आरती में कुछ ही समय शेष था। गंगा आरती की दिव्यता और भव्यता के बारे में आज तक सिर्फ सुना ही था किन्तु आज हम उसके साक्षी बनने जा रहे थे। स्नानोपरान्त हम आरती स्थल पहुंचे जहां सभी तैयारियां पूरी कर ली गयी थी। लाउड स्पीकर पर पुजारियों के कंठ से धाराप्रवाह गूंज रहे मंत्र वातावरण को और भी दिव्य बना रहे थे। लगभग 7.30 बजे मां गंगा की दिव्य आरती प्रारम्भ हुई। पुजारियों हाथों में आरती दीपकों की ज्योति को देखकर आभास होता था मानों नभ से स्वयं तारागण माँ गंगा की आरती के लिए उतर आए हों। आरती के अनुभव को शब्दों में प्रस्तुत करना बहुत दुष्कर कार्य है उसे तो सिर्फ अनुभव ही किया जा सकता है। आरती के उपरान्त पुनः धर्मशाला पहुंचे और भोजनोपरान्त विश्राम किया। प्रातः यमुनोत्री के लिये प्रस्थान करना था।