यमुनोत्री
सुबह मोबाईल के अलार्म ने चीख चीख कर जब पांच बजने का संकेत देना शुरू किया तो हमें भी उठना ही पड़ा। कभी सोचता हूं यह मोबाईल हमें बात करवाने के अलावा भी कितने काम करता है। दुनिया से रूबरू करवाना, फोटोग्राफर, घड़ी, अलार्म, रास्ता भटकने पर गाइड और भी न जाने क्या - क्या। हमारी चारधाम यात्रा का विधिवत प्रारम्भ आज ही था। दैनिक कार्यों से निवृत होकर सभी यात्री अपना - अपना सामान लेकर धर्मशाला के मध्य में बने प्रांगण में आकर बैठ गये। कुछ बन्धु तो प्रातः काल फिर गंगा स्नान कर आये। प्रांगण के मध्य में विश्राम हेतु बनी कुर्सियों पर बैठकर सभी यात्री चाय-कॉफी की चुस्कियां ले रहे थे। प्रांगण में ही सुन्दर मन्दिर है जहां भगवान राम, महादेव, माँ दुर्गा आदि देवी - देवताओं की मूर्तियां लगी हुई है। मन्दिर से आ रही आरती व घंटे की ध्वनि वातावरण की पावनता को बढ़ा रही थी। भोजनादि से निवृत होते - होते हमें आठ बज गये। बसें भी तब तक आ चुकी थी। चालीस यात्रियों को तीन बसों के अनुसार तीन समूहों में बांटा गया। सभी यात्री अपने - अपने समुह अनुसार बसों में जा जमे हम अपने पहले पड़ाव अर्थात माँ यमुना के उद्गम स्थल यमुनोत्री की ओर निकल पड़े।
हरिद्वार से निकलते ही जोरदार बारिश ने हमारा स्वागत किया । देहरादून से आगे जाकर हम यमुनोत्री मार्ग की ओर मुड़ गये जो राजमार्ग की अपेक्षा थोड़ा संकरा है। रास्ते के दोनों ओर आमों से लदे पेड़ थे जो मानों अपनी टहनियां झुका कर हमारी मनुहार कर रहे थे। कुछ घण्टों की यात्रा के पश्चात् हमारी बसें पहाड़ी मार्गो पर थी। जहां तक दृष्टि जाती वहां ऊंचे-ऊंचे पर्वत ही दिखाई दे रहे थे। पर्वतों के ऊंचे शिखर मेघों को चूम रहे थे। पहाड़ियों में यत्र - तत्र बिखरे सफेद बादलों को देख कर प्रतीत होता था मानो किसी ने पर्वत श्रृंखला में जगह - जगह रूई के फाहे बिखेर दिये हो। चाय - पानी हेतु गाड़ी कहीं रूकती तो सभी यात्री घाटी के मनोरम दृश्यों को अपने मोबाईल के कैमरों में सहेज लेते। पूरा दिन यात्रा में ही बीता रात्रि विश्राम यमुनोत्री से थोड़ा पहले खरादी गांव में एक होटल में किया। होटल में ही भोजन बनाया व भोजनोपरान्त सड़क पर टहलने निकल गये। पर्वतों पर चीड़ व देवदार के वृक्ष ध्रुव समाधी की मुद्रा में खड़े हैं। रात के सन्नाटे में भी यमुना व्याकुल होकर भाग रही थी और उसकी व्याकुलता का शोर रात्रि की नीरवता पर चोट कर रही थी। पलकों के घोंसलों पर नीन्द के पंछी ने बसेरा डाल दिया था और पलके उसके बोझ से दबी जा रही थी।
सुबह जल्दी हमने जानकीचट्टी के लिये प्रस्थान किया क्योंकि बसें जानकी चट्टी तक ही जाती हैं। जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक 5 किलोमीटर की यात्रा अपनी इच्छानुसार पैदल, घोड़ा या पालकी से कर सकते हैं। कुछ साथी घोड़ों पर सवार हो गये यद्यपि अधिकांश ने पैदल ही चढ़ने का निर्णय लिया। भोजन सभी ने जानकी चट्टी पहुंचकर ही किया। बारीश भी शुरु हो चुकी थी सो सभी ने रेनकोट पहन लिये। जिनके पास रेनकोट नहीं थे उन्हें वहीं से खरीदने पड़े । पैदल चढ़ाई के लिऐ लकड़ियां खरीदी और यमुनोत्री की ओर प्रस्थान किया। बारीश ने लगभग पूरे रास्ते हमारा साथ दिया मानों वह भी हमारे साथ ही यमुनोत्री की यात्रा कर रही थी। साधारण सड़क की तुलना में चढ़ाई वाले रास्तों पर पैदल चलना अत्यन्त दुष्कर है। थोड़ा सा चलने पर सांस फूलने लगती है और विश्राम करना पड़ता है। इसी तरह विश्राम करते - करते यमुनोत्री तक की 5 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने में लगभग 3 घण्टे से अधिक का समय लग गया। मन्दिर तक पहुंचते - पहुंचते सभी थक कर चूर हो चुके थे। एक कदम तक भरने की स्थिति नहीं रही।
यमुनोत्री की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 3300 मीटर है। ऊपर से बारीश होने के कारण ठण्ड भी अधिक थी। यमुनोत्री माँ यमुना का उद्गम स्थल है। मन्दिर परिसर में ही महिला व पुरुषों हेतु के स्नान हेतु अलग - अलग तप्त कुण्ड बने हुए हैं जिनमें दैवीय कृपा से गर्म पानी आता है। दर्शनों से पहले सभी स्नान करने कुण्ड में उतरे। कुण्ड के पानी का स्पर्श पातें ही ऐसा लगा मानो स्वयं माँ यमुना हमें अपनी गोद में लेकर दुलार रही हो। आश्चर्यजनक रूप से यात्रा की सारी थकान पल भर में जाती रही।
स्नानोपरान्त माँ यमुना को प्रणाम किया हाथ में जल लेकर आचमन किया और मन्दिर के दर्शन किये। मन्दिर में माँ यमुना श्वेत व श्याम दो रूपों में विराजमान है। मन्दिर के निकट ही एक छोटा सा गर्म पानी का कुण्ड है जिसें खौलता हुआ गर्म पानी आता है। उस पानी में चावल उबाल कर उसका प्रसाद लिया जाता है। सभी ने चावल उबाले और प्रसाद ग्रहण किया। दर्शनोपरान्त पैदल नीचे उतरे। ऊँचा उठना जितना कष्टप्रद व मेहनता भरा है उतना ही आसान नीचे उतरना या गिरना है फिर वह चाहे व्यक्ति हो या चरित्र। चढ़ने में जहां हमें तीन घण्टे से अधिक समय लग गया वहीं मात्र डेढ़ घण्टे में नीचे उतर गये। होटल पहुंचते - पहुंचते शाम हो चली थी और थकान के कारण यात्रा सम्भव न थी। पहाड़ियों पर अन्धेरे की चादर तन गयी थी। हमने भी रात्रि विश्राम वहीं करने का निर्णय लिया।