Tuesday, 26 March 2013

फिर कलम डूबोकर शोणित में मैं गीत होली के लिखता हूँ ये देश भूलकर रंगों में वो डूबा यौवन लिखता हूँ धूं-धूं कर थी जली होलिका फिर आज याद वो लिखता हूँ पर आज होलिका हंस रही मैं जलता प्रहलाद लिखता हूँ रोता वो हिमालय लिखता हूँ सोती ये जनता लिखता हूँ देख अतीत के गौरव को मैं रोता वर्तमान लिखता हूँ सीता-सावित्री की धरा को लज्जित होते लिखता हूँ जहां नारी पूजी जाती थी वहां नारी को लुटते लिखता हूँ जो देश की खातिर शीश कटे इन्तजार उन्हीं का लिखता हूँ और उन वीरों की माँ के वो पथराये नैना लिखता हूँ राम के ही देश में अब अपमान राम का लिखता हूँ और इतना सबकुछ देख कर खामोश कलम मैं लिखता हूँ पवन प्रजापति ‘पथिक’

Thursday, 14 March 2013


मित्रों होली का त्यौहार आने वाला है। सभी होली का त्यौंहार मनाएंगे लेकिन हमारे कुछ भाई जो सीमा पर देश की रक्षा करते हैं उनकी पत्नियों की होली को दर्शाती कुछ लाईनें प्रस्तुत कर रहा हूं, अपने कमेन्ट जरूर दें
आई आई होली सखी री
तू नाचे पिया संग रंग बरसे
मोरे पिया गये कौन देश
मोहे पिया मिलन को मन तरसे
तोरे पिया ने चुनर रंग डारी
सखी मोरी चुनर रह गई कोरी
जो मोरी चुनर रंग जाती तो
तोरी चुनर रह जाती कोरी
सखी होली का रंग भी तन पे
ना जाने अब क्यूं चढ़ता ही नहीं
और पिया के रंग बिना
कोई रंग दूजा चढ़ता ही
नहीं सखी फागुन का गीत भी जाने
कानों को क्यूं भाता ही नहीं
और पिया पिया के गीता बिना
कोई गीता दूजा आता ही नहीं
सखी मोरे पिया तो भये सिपहिया
जो देश की रक्षा करते हैं
और मोरे पिया के ही कारणे
ये होली का रंग बरसे हैं

पवन प्रजापति 'पथिक'