Tuesday, 26 March 2013

फिर कलम डूबोकर शोणित में मैं गीत होली के लिखता हूँ ये देश भूलकर रंगों में वो डूबा यौवन लिखता हूँ धूं-धूं कर थी जली होलिका फिर आज याद वो लिखता हूँ पर आज होलिका हंस रही मैं जलता प्रहलाद लिखता हूँ रोता वो हिमालय लिखता हूँ सोती ये जनता लिखता हूँ देख अतीत के गौरव को मैं रोता वर्तमान लिखता हूँ सीता-सावित्री की धरा को लज्जित होते लिखता हूँ जहां नारी पूजी जाती थी वहां नारी को लुटते लिखता हूँ जो देश की खातिर शीश कटे इन्तजार उन्हीं का लिखता हूँ और उन वीरों की माँ के वो पथराये नैना लिखता हूँ राम के ही देश में अब अपमान राम का लिखता हूँ और इतना सबकुछ देख कर खामोश कलम मैं लिखता हूँ पवन प्रजापति ‘पथिक’

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