तपती दुपहरी भी ठंडी लागे
ओ सैंया तेरे विरह के आगे
तेरे बिना ओ सैंया नींद न आवे
मैं सोऊं मेरी अंखिया जागे
सूनी सेज मोहे कांटे सी लागे
विरह की अगिनी तन में लागे
भोर भये ओ सैंया सेज टटोलूं
सूनी सेज पाऊं अखियां जो खोलूं
आहट हो कोई तो द्वार पे जाउं
तू ना मिले तो जैसे मैं मर जाउं
खाना पीना भी सैंया अब नहीं भावे
जब तक तू मोहे खुद ना खिलावे
द्वार पे बैठी बस राह मैं ताकूं
सब दुनिया को मैं पगली लागूं
खत मिले जो तेरा जीय से लगाउं
अपनी पीर तोहे कैसे समझाउं
तपती रेत पे इत-उत डोलूं
जीय की बात मैं किस से बोलूं
तेरे बिना तो अब मैं जी नहीं पाउं
दरस बिना तो तेरे मर नहीं पाउं
अब तो आजा रे सैंया संग मोहे ले जा
या मोहे कोई जहर तू दे जा
पवन प्रजापति पथिक
ओ सैंया तेरे विरह के आगे
तेरे बिना ओ सैंया नींद न आवे
मैं सोऊं मेरी अंखिया जागे
सूनी सेज मोहे कांटे सी लागे
विरह की अगिनी तन में लागे
भोर भये ओ सैंया सेज टटोलूं
सूनी सेज पाऊं अखियां जो खोलूं
आहट हो कोई तो द्वार पे जाउं
तू ना मिले तो जैसे मैं मर जाउं
खाना पीना भी सैंया अब नहीं भावे
जब तक तू मोहे खुद ना खिलावे
द्वार पे बैठी बस राह मैं ताकूं
सब दुनिया को मैं पगली लागूं
खत मिले जो तेरा जीय से लगाउं
अपनी पीर तोहे कैसे समझाउं
तपती रेत पे इत-उत डोलूं
जीय की बात मैं किस से बोलूं
तेरे बिना तो अब मैं जी नहीं पाउं
दरस बिना तो तेरे मर नहीं पाउं
अब तो आजा रे सैंया संग मोहे ले जा
या मोहे कोई जहर तू दे जा
पवन प्रजापति पथिक