Sunday, 2 June 2013

क्यूं आज कलम की नोक से मेरी
खून की बून्द टपकती है
ये छोड़ प्रणय के गीतों को
क्यूं अंगारे लिख देती है
इस कलम की हिमाकत तो देखो
जो तान के सीना चलती है
छोटा सा कद है लेकिन
खुद को तलवार समझती है
मैं रोकना चाहूं हाथों को
क्यूं रोक नहीं मैं पाता हूं
मैं लिखना चाहूँ प्रेमिका
क्यूं चण्डिका लिख देता हूं
मदमाता यौवन भूल गया
मैं आग प्रखर लिख देता हूँ
श्रृंगार की भाषा भूल गया
क्यूं तलवारें लिख देता हूँ
क्यूं बाग बहारें लिख ना पाऊँ
रण भूमि लिख देता हूँ
क्यूं गीत प्रेम के ना लिख कर
मैं रण के गीत सुनाता हूँ

पवन प्रजापति ‘पथिक’

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