Sunday, 28 April 2013

हां हमने भी दंगों में सब सपने जलते देखे हैं

हमारे गांव में अभी हिन्दू-मुसलमानों के दंगे हुए हैं
दंगा पीडि़तों की दशा को बयां करती कुछ लाईनें हैं, अपनी राय जरूर दें

हां हमने भी दंगों में सब सपने जलते देखे हैं
जिन बागों में कभी खेले थे, उनको भी जलते देखे है।
आंखों में बवण्डर देखे हैं, सीने में खंजर देखे हैं
जहां लगते थे बाजार कभी, वहां मौत के मंजर देखे है।
ख्वाबों के आशियाने अपने सामने जलते देखे है।
और अपनों को ही अपने पेट पे लात मारते देखे हैं
जो कहते थे कि साथ देंगे हम किसी भी संकट में
उनके ही हाथों अपने आशियाने उजड़ते देखे हैं
मासूमों की आंखों में अनसुलझे सवाल देखे हैं
जो देखना ना चाहते थें, दंगों में वो सब देखे हैं

हां हमने भी दंगों में सब सपने जलते देखे हैं
जिन बागों में कभी खेले थे, उनको भी जलते देखे है।

पवन प्रजापति ‘पथिक’

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