Saturday, 21 December 2013

भारत का भविष्य

यद्यपि भारत का सुनहरा भविष्य तो तुमने देखा है
लेकिन यथार्थ से परे कभी इस तस्वीर को देखा है
मैंने सड़कों के किनारे भारत का भविष्य देखा है
कंपकपाती सरदी में नंगे बदन ठिठुरते देखा है
पेट पालने की जुगत में भीख मांगते देखा है
भारत के भविष्य को भूख से दम तोड़ते देखा है
चाय की होटल पर उसको बरतन धोते देखा है
भारत के भविष्य का यूं अपमान होते देखा है
मैंने भारत के भविष्य को जूते माँजते देखा है
कचरे की टोकरी से उसको झूठन खाते देखा है
स्कूलों के बैग टकटकी लगा देखते देखा है
और फिर खुद की हालत पे यूं मन मसोसते देखा है
फटे हुए कपड़ों में उसको बदन छिपाते देखा है
भारत का भविष्य दर-दर ठोकर खाते देखा है
सड़क किनारे बिन चद्दर के रात बिताते देखा है
और कभी गाड़ी की टक्कर से बेमौत मरते देखा है

यद्यपि भारत का सुनहरा भविष्य तो तुमने देखा है
लेकिन यथार्थ से परे कभी इस तस्वीर को देखा है

‘पथिक’

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