जो समझो तो बड़ी अनमोल सभी की जिन्दगानी है
फिर दुनिया को मिटाने की भला तुमने क्यूं ठानी है
लाशों के लगे अम्बार, और शर्मसार है मानवता
ये अल्लाह का करम है या तुम्हारी मेहरबानी है
हंसते गाते लोगों के आंगन में आग लगा बैठे
अपने हाथों अपनी ही बगिया भी तुम जला बैठे
अरे उसने तो सौंपा था तुम्हे हरा भरा गुलशन
हरे भरे उस गुलशन को तुम मरघट क्यूं बना बैठे
गर इन्सान हो तुम तो थोड़ी सी शरम करना
कहां से सीखा है तुमने यूं इतना सितम करना
मजहब के नाम पर जो कत्ले आम मचाते हो
क्या अल्लाह सिखाता है गरदन यूं कलम करना
‘पथिक
फिर दुनिया को मिटाने की भला तुमने क्यूं ठानी है
लाशों के लगे अम्बार, और शर्मसार है मानवता
ये अल्लाह का करम है या तुम्हारी मेहरबानी है
हंसते गाते लोगों के आंगन में आग लगा बैठे
अपने हाथों अपनी ही बगिया भी तुम जला बैठे
अरे उसने तो सौंपा था तुम्हे हरा भरा गुलशन
हरे भरे उस गुलशन को तुम मरघट क्यूं बना बैठे
गर इन्सान हो तुम तो थोड़ी सी शरम करना
कहां से सीखा है तुमने यूं इतना सितम करना
मजहब के नाम पर जो कत्ले आम मचाते हो
क्या अल्लाह सिखाता है गरदन यूं कलम करना
‘पथिक
