Friday, 12 September 2014

ये अल्लाह का करम है या तुम्हारी मेहरबानी है

जो समझो तो बड़ी अनमोल सभी की जिन्दगानी है
फिर दुनिया को मिटाने की भला तुमने क्यूं ठानी है
लाशों के लगे अम्बार, और शर्मसार है मानवता
ये अल्लाह का करम है या तुम्हारी मेहरबानी है
हंसते गाते लोगों के आंगन में आग लगा बैठे
अपने हाथों अपनी ही बगिया भी तुम जला बैठे
अरे उसने तो सौंपा था तुम्हे हरा भरा गुलशन
हरे भरे उस गुलशन को तुम मरघट क्यूं बना बैठे
गर इन्सान हो तुम तो थोड़ी सी शरम करना
कहां से सीखा है तुमने यूं इतना सितम करना
मजहब के नाम पर जो कत्ले आम मचाते हो
क्या अल्लाह सिखाता है गरदन यूं कलम करना

‘पथिक

Sunday, 10 August 2014

यूं ही राह चलते चलते

यूं ही राह चलते चलते तितली से पूछ बैठा
मेरे शहर से ऐ तितली, तू दूर क्यूं है रहती
बोली की तेरे शहर में तितली को नोंचा जाता
पर उसके कतरे जाते, पैरों से रौन्दा जाता
कलियों से पूछ बैठा कि ऐ महकती कलियों
महक यह तुम्हारी, मेरे शहर क्यूं ना आती
बोली वो कली कुछ यूं, शर्मिन्दा हो गया मैं
तेरे शहर में तो कलियां, खिलने कहां दी जाती
चहचहाती चिडि़या से कुछ यूं मैं पूछ बैठा
मेरे शहर में ऐ चिडि़या, तू क्यूं ना चहचहाती
बोली वो चिडि़या मुझसे, ऐ राह के मुसाफिर
गुंगों के इस शहर में, मैं कैसे चहचहाती
कुछ दूर जो चला तो, इक श्वान हंस पड़ा था
पूछा जो श्वान से कि, तुझको हंसी क्यूं आती
बोला वो श्वान मुझसे, मुझे बोलते हैं कुत्ता
मुझसे भी बदत्तर इन्सा, इसलिए हंसी आती

मैं सुनकर ये सबकुछ स्तब्ध रह गया था
इन्सान कहते खुदको, हमें शर्म क्यूं ना आती

Tuesday, 5 August 2014

अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

तू मौन क्यूं खड़ा है तेरा मिट रहा अस्तित्व है
सतियों की धरा पे देखो लुट रहा सतीत्व है
तू क्यूं है चुप सनातनी अब तो जरा क्रुद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

अन्याय पर मौन रहने वाला सदा रोया है
धृतराष्ट्र के मौन ने भी सौ पुत्रों को खोया है
तू तोड़ दे ये मौन चाहे विश्व भी विरूद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

धर्म रक्षा के लिए हथियार ना उठाओगे
आने वाली पीढि़यों को क्या मुंह दिखाओगे?
विधर्मी के रक्त से ये धरा अब शुद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

मन्दिर टूट रहे थे तेरे तू तब भी चुप बैठा था
राम खुद आएंगे बचाने ये क्यूं सोच बैठा था
राम अब ना आएंगे तू स्वयं अधर्म विरूद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो
‘पथिक’

Friday, 9 May 2014

मन्दिर में जिन्होंने कभी मत्था ना टेका

मन्दिर में जिन्होंने कभी मत्था ना टेका 
वो मजारों पे फूल चढ़ाये जा रहे हैं
राम के नाम से जुबां जिनकी दुखती
वो मुहम्मद के गुण गाए जा रहे हैं
आरती से जिनके हाथ कांपते थे
वो अजानों में हाथ उठाए जा रहे हैं
राम नाम जिनको साम्प्रदायिक लगता
वो अल्ला-हू-अकबर गाए जा रहे हैं
कुमकुम की लाली में जिन्हें खून दिखता
वो टोपी क्यूं जाने लगाए जा रहे हैं
वोटों की खातिर क्यूं ये राजनेता
राजनीति का शीष झुकाए जा रहे हैं

‘पथिक’

Tuesday, 1 April 2014

क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी

तुमने सदा ही खून बहाया
मैंने अमन की आस रखी
फिर भला तुम ही बोलो मैं
क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
मैंने तो मस्जिद ना तोड़ी
तुमने मन्दिर क्यूं तोड़े
इबादत की जगह से तुमने
ये तीर नफरती क्यूं छोड़े
धर्मयुद्ध (जिहाद) के नाम पे बोलो
क्यूं आतंक की नींव रखी
फिर भला तुम ही बोलो मैं
क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
इन्सानों को कत्ल करते
शर्म नहीं क्यूं आती है
इस तरह से खून बहाके
क्या तुम्हे शांति मिलती है
बरबाद - ए - गुलिस्तां करने को
तुमने ना कोई कमी रखी
फिर भला तुम ही बोलो
मैं क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
मैं गौ-को माता कहता हूं
तुम उसका खून बहाते हो
जो तेरी माँ का कत्ल करे
क्या उसको गले लगाते हो?
गौ-माता का खून बहाने
वाले तेरी अब खैर नहीं
फिर भला तुम ही बोलो
मैं क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
मैं घायल होकर भी चुप था
तुम रक्त बहाते रहते थे
मेरे धैर्य को शायद तुम
मेरी कायरता समझते थे
जब-जब मेरा धैर्य टूटा
ये धरती रक्त से थी रंगी
फिर भला तुम ही बोलो
मैं क्यूं ना कहूं तुम्हे आतंकी
पवन प्रजापति ‘पथिक’

Saturday, 15 March 2014

हंमें तो मुहम्मद से शिकवा नहीं था उन्हें राम से फिर ये शिकायत क्यूं है मस्जिद की अजानों को हमने ना कोसा मन्दिर की घटियों से ये नफरत क्यूं है बेवजह खूं बहाने की हमें नहीं आदत कत्ल करने की फिर उन्हें फितरत क्यूं है हमने सदा अमन कायम करना चाहा हंगामा करने की उन्हें हसरत क्यूं है ‘पथिक’