यूं ही राह चलते चलते तितली से पूछ बैठा
मेरे शहर से ऐ तितली, तू दूर क्यूं है रहती
बोली की तेरे शहर में तितली को नोंचा जाता
पर उसके कतरे जाते, पैरों से रौन्दा जाता
कलियों से पूछ बैठा कि ऐ महकती कलियों
महक यह तुम्हारी, मेरे शहर क्यूं ना आती
बोली वो कली कुछ यूं, शर्मिन्दा हो गया मैं
तेरे शहर में तो कलियां, खिलने कहां दी जाती
चहचहाती चिडि़या से कुछ यूं मैं पूछ बैठा
मेरे शहर में ऐ चिडि़या, तू क्यूं ना चहचहाती
बोली वो चिडि़या मुझसे, ऐ राह के मुसाफिर
गुंगों के इस शहर में, मैं कैसे चहचहाती
कुछ दूर जो चला तो, इक श्वान हंस पड़ा था
पूछा जो श्वान से कि, तुझको हंसी क्यूं आती
बोला वो श्वान मुझसे, मुझे बोलते हैं कुत्ता
मुझसे भी बदत्तर इन्सा, इसलिए हंसी आती
मैं सुनकर ये सबकुछ स्तब्ध रह गया था
इन्सान कहते खुदको, हमें शर्म क्यूं ना आती
मेरे शहर से ऐ तितली, तू दूर क्यूं है रहती
बोली की तेरे शहर में तितली को नोंचा जाता
पर उसके कतरे जाते, पैरों से रौन्दा जाता
कलियों से पूछ बैठा कि ऐ महकती कलियों
महक यह तुम्हारी, मेरे शहर क्यूं ना आती
बोली वो कली कुछ यूं, शर्मिन्दा हो गया मैं
तेरे शहर में तो कलियां, खिलने कहां दी जाती
चहचहाती चिडि़या से कुछ यूं मैं पूछ बैठा
मेरे शहर में ऐ चिडि़या, तू क्यूं ना चहचहाती
बोली वो चिडि़या मुझसे, ऐ राह के मुसाफिर
गुंगों के इस शहर में, मैं कैसे चहचहाती
कुछ दूर जो चला तो, इक श्वान हंस पड़ा था
पूछा जो श्वान से कि, तुझको हंसी क्यूं आती
बोला वो श्वान मुझसे, मुझे बोलते हैं कुत्ता
मुझसे भी बदत्तर इन्सा, इसलिए हंसी आती
मैं सुनकर ये सबकुछ स्तब्ध रह गया था
इन्सान कहते खुदको, हमें शर्म क्यूं ना आती