Sunday, 10 August 2014

यूं ही राह चलते चलते

यूं ही राह चलते चलते तितली से पूछ बैठा
मेरे शहर से ऐ तितली, तू दूर क्यूं है रहती
बोली की तेरे शहर में तितली को नोंचा जाता
पर उसके कतरे जाते, पैरों से रौन्दा जाता
कलियों से पूछ बैठा कि ऐ महकती कलियों
महक यह तुम्हारी, मेरे शहर क्यूं ना आती
बोली वो कली कुछ यूं, शर्मिन्दा हो गया मैं
तेरे शहर में तो कलियां, खिलने कहां दी जाती
चहचहाती चिडि़या से कुछ यूं मैं पूछ बैठा
मेरे शहर में ऐ चिडि़या, तू क्यूं ना चहचहाती
बोली वो चिडि़या मुझसे, ऐ राह के मुसाफिर
गुंगों के इस शहर में, मैं कैसे चहचहाती
कुछ दूर जो चला तो, इक श्वान हंस पड़ा था
पूछा जो श्वान से कि, तुझको हंसी क्यूं आती
बोला वो श्वान मुझसे, मुझे बोलते हैं कुत्ता
मुझसे भी बदत्तर इन्सा, इसलिए हंसी आती

मैं सुनकर ये सबकुछ स्तब्ध रह गया था
इन्सान कहते खुदको, हमें शर्म क्यूं ना आती

Tuesday, 5 August 2014

अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

तू मौन क्यूं खड़ा है तेरा मिट रहा अस्तित्व है
सतियों की धरा पे देखो लुट रहा सतीत्व है
तू क्यूं है चुप सनातनी अब तो जरा क्रुद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

अन्याय पर मौन रहने वाला सदा रोया है
धृतराष्ट्र के मौन ने भी सौ पुत्रों को खोया है
तू तोड़ दे ये मौन चाहे विश्व भी विरूद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

धर्म रक्षा के लिए हथियार ना उठाओगे
आने वाली पीढि़यों को क्या मुंह दिखाओगे?
विधर्मी के रक्त से ये धरा अब शुद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो

मन्दिर टूट रहे थे तेरे तू तब भी चुप बैठा था
राम खुद आएंगे बचाने ये क्यूं सोच बैठा था
राम अब ना आएंगे तू स्वयं अधर्म विरूद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो
‘पथिक’