Saturday, 9 February 2019

एक कुत्ते की प्रेमकथा.. भाग — 1

एक कुत्ते की प्रेमकथा.. भाग — 1
आखिर कई दिनों की मेरी मुराद आज पूरी होने जा रही थी। मेरे सिवा मेरे सभी साथियों को एक - एक कर कोई न कोई ले जा चुका था । ऊपर वाले से मन्नत मांगने की सोची लेकिन पशोपेश में पड़ गया कि मन्दिर जाउं, मस्जिद जाउं या चर्च क्योंकि मुझ पर किसी धर्म का ठप्पा भी नहीं था। फिर सोचा यही बैठकर ही प्रार्थना कर ली जाये हो सकता फरियाद सुन ली जाये। दो दिन बाद जब मुझे लेने के लिये बाकायदा लम्बी सी गाड़ी आयी तो लगा कि फरियाद सुन ली गई है। पेमेन्ट करने के बाद मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया। मैं भी पूंछ हिलाता मालिक के पीछे हो लिया। गाड़ी की गद्देदार सीट पर बैठकर पहली बार लगा कि सच्चे मन से यदि प्रार्थना की जाय तो मन्दिर, मस्जिद या चर्च कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है। गाड़ी शहर की व्यस्त सड़कों से होकर गुजर रही थी। एक चौराहे पर सिग्नल देख गाड़ी रूक जाती है। जैसे ही गाड़ी रूकती है, एक भिखारी कटोरा लेकर कार के पिछले दरवाजे की तरफ आता है और हाथ फैलाता है लेकिन कार की शीट पर किसी आदमी की जगह एक कुत्ते को देख मायूस होकर चला जाता है। उसे देख पहली बार मुझे मन ही मन अपने कुत्ता होने पर गर्व महसूस हुआ। चन्द मिनटों के सफर के बाद मैं अपने नये घर पहुंच चुका था। घर पहुंचते ही मेरा शानदार स्वागत हुआ। बच्चे मुझे देखकर बेहद खुश हुए। लगे हाथों मेरा नामकरण भी कर दिया गया.. जॉनी... वाह कितना बेहतरीन नाम था। 
थोड़े ही दिनों में मैं परिवार वालों के साथ घुल मिल गया था। सभी का चहेता बन गया था। बच्चों से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। बच्चे सुबह उठते ही मुझे पास के पार्क में घुमाने ले जाते, शाम को आते ही मेरे साथ खेलने लग जाते। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी कुल मिलाकर जिन्दगी आराम से कट रही थी और मैं भी ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था।
एक दिन हमेशा की तरह पार्क में टहल रहा था। वैसे तो पार्क में कई कुत्ते-कुतियाएं टहलने के लिए आती थी लेकिन उस दिन एक नई कुतिया पार्क में आई जिसे पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे सफेद बाल, बड़ी बड़ी काली आंखें, रेशमी पूंछ कुल मिलाकर वह सबसे अलग नजर आ रही थी। मैंने अपने डॉग फार्म जहां पहले रहता था वहां भी इतनी खूबसूरत कुतिया नहीं देखी थी। मैं एक टक उसे देखे जा रहा था, तभी अचानक बच्चों ने मेरे पट्टे से बंधी रस्सी खींच घर चलने का आदेश दिया। मैंने जाते जाते मुड़कर उसकी ओर देखा, उसने भी मेरी ओर देखा। फिर मैं भारी कदमों से घर की ओर चल दिया।
आज घर में बिल्कुल मन नहीं लगा रहा था। हमेशा स्वादिष्ट लगने वाले पेडिग्री व बिस्किट में भी वो स्वाद नहीं आ रहा था। मन कर रहा था कि भाग कर वापस पार्क में चला जाउं लेकिन अपनी मजबूरियों से बंधा था। आखिर जब बोर हो गया तो ऊपर जाकर बालकनी में बैठ गया। दिमाग में बस उसी कुतिया की तस्वीर घूम रही थी। थोड़ी देर बाद सामने वाले मकान की बालकनी का दरवाजा खुलता है। एक महिला बालकनी में आती है जिसके साथ एक कुतिया होती है। अरे ये क्या ये तो वही कुतिया है जो मुझे पार्क में मिली थी। उसे देखते ही शरीर में स्फूर्ति सी आ गयी। दोनों की नजरें एक दूसरे से टकरायी और पूंछ हिलाकर हम दोनों एक दूसरे का अभिवादन किया......
क्रमश:

Wednesday, 6 February 2019

लघु कथा : भेड़ और इन्सान

लघु कथा : भेड़ और इन्सान
शाम का समय था, भेड़ों का झुण्ड घर की ओर लौट रहा था। अपनी आदतानुसार बेफिक्र होकर भेड़ें भी अपने पैरों से धूल उड़ाते हुए एक दूसरे के पीछे चली जा रही थी। यातायात के नियमों को जहां इन्सान भी पालन नहीं करते वहां भेड़ों से इस बात की उम्मीद करना भी बेमानी था। उसी दौरान सामने से एक कार आती है जो भेड़ों के विशाल झुण्ड को देखकर रूक जाती है। कार चालक समझ जाता है कि ये भेड़ें हैं और ये अपने हिसाब से ही चलेंगी इसलिए रूकने में ही फायदा है। चालक कार को एक तरफ पार्क कर भेड़ों के निकलने का इन्तजार करने के लिए खड़ा हो जाता है और अपने साथी से कहता है — ''ये भेड़ें भी ना, बिल्कुल बेवकूफ जानवर है, भला ये भी कोई तरीका है सड़क पर चलने का और वो भी इतने बड़े झुण्ड में, जैसे पूरी सड़क इनके बाप की हो।''
उनकी बात को पास ही चल रही एक भेड़ ने सुन लिया और तपाक से बोली — ''क्यों भाई हम भेड़ों को क्यों कोस रहे हो, हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?''
दोनों आदमी चौंक गये, क्योंकि एक भेड़ से इस प्रकार के उत्तर की आशा उन्हें नहीं थी?
कार चालक बोला — ''कोसें नहीं तो क्या करें, ये भी भला कोई तरीका है झुण्ड में चलने का, यदि तरीका सीखना हो तो हम आदमियों से सीखो, तुम्हारे कारण हम कब से परेशान हैं?''
भेड़ बोली — ''कौनसा तरीका सीखें भाई, हम तो भेड़ें हैं सो भेड़चाल हमारा स्वभाव है! लेकिन तुम तो इन्सान हो, फिर हमारी चाल क्यों चलते हो?''
चालक — ''क्या बकवास कर रही हो''
''और नहीं तो क्या, हम तो भेड़ें हैं इसीलिए झुण्ड में चलती है लेकिन
इतना तो है कि एक झुण्ड में चलती हैं, कभी आपस में लड़ती नहीं है। और तुम इन्सान होकर जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर जाने कितने झुण्ड बनाकर बैठे हो, जिस तरह हमें हांकने वाला गडरिया है उसी प्रकार तुम्हें भी तो हांकने वाले हैं जो जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर हांकते हैं। बिना कुछ सोचे विचारे तुम उनके कहने पर मरने — मारने पर उतारू हो जाते हो बताओ फिर ये भेड़चाल नहीं तो क्या है?''
दोनों चकित होकर भेड़ को सुने जा रहे थे
''तुम कहते हो इन्सानों से तरीका सीखें, भला बताओ कौनसा तरीका सीखें, आपस में एक दूसरे को मारने का, नफरत फैलाने का, जातियों के आधार पर एक दूसरे से लड़ने का बताओ भला कौनसा तरीका है तुम्हारा जो हम सीखें।''
दोनों निरूत्तर थे
''वो तो तुमने हमारी 'भेड़ जाति' को लेकर ऐसी बात कह दी थी जिससे हमारा स्वाभिमान आहत हो गया इसलिए तुम्हे जवाब देना उचित समझा। हम तो भेड़ें हैं इसलिए हमारी चाल बदलने की उम्मीद मत करना और हो सके तो खुद की चाल बदलने की कोशिश करना''