एक कुत्ते की प्रेमकथा.. भाग — 1
आखिर कई दिनों की मेरी मुराद आज पूरी होने जा रही थी। मेरे सिवा मेरे सभी साथियों को एक - एक कर कोई न कोई ले जा चुका था । ऊपर वाले से मन्नत मांगने की सोची लेकिन पशोपेश में पड़ गया कि मन्दिर जाउं, मस्जिद जाउं या चर्च क्योंकि मुझ पर किसी धर्म का ठप्पा भी नहीं था। फिर सोचा यही बैठकर ही प्रार्थना कर ली जाये हो सकता फरियाद सुन ली जाये। दो दिन बाद जब मुझे लेने के लिये बाकायदा लम्बी सी गाड़ी आयी तो लगा कि फरियाद सुन ली गई है। पेमेन्ट करने के बाद मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया। मैं भी पूंछ हिलाता मालिक के पीछे हो लिया। गाड़ी की गद्देदार सीट पर बैठकर पहली बार लगा कि सच्चे मन से यदि प्रार्थना की जाय तो मन्दिर, मस्जिद या चर्च कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है। गाड़ी शहर की व्यस्त सड़कों से होकर गुजर रही थी। एक चौराहे पर सिग्नल देख गाड़ी रूक जाती है। जैसे ही गाड़ी रूकती है, एक भिखारी कटोरा लेकर कार के पिछले दरवाजे की तरफ आता है और हाथ फैलाता है लेकिन कार की शीट पर किसी आदमी की जगह एक कुत्ते को देख मायूस होकर चला जाता है। उसे देख पहली बार मुझे मन ही मन अपने कुत्ता होने पर गर्व महसूस हुआ। चन्द मिनटों के सफर के बाद मैं अपने नये घर पहुंच चुका था। घर पहुंचते ही मेरा शानदार स्वागत हुआ। बच्चे मुझे देखकर बेहद खुश हुए। लगे हाथों मेरा नामकरण भी कर दिया गया.. जॉनी... वाह कितना बेहतरीन नाम था।
थोड़े ही दिनों में मैं परिवार वालों के साथ घुल मिल गया था। सभी का चहेता बन गया था। बच्चों से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। बच्चे सुबह उठते ही मुझे पास के पार्क में घुमाने ले जाते, शाम को आते ही मेरे साथ खेलने लग जाते। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी कुल मिलाकर जिन्दगी आराम से कट रही थी और मैं भी ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था।
एक दिन हमेशा की तरह पार्क में टहल रहा था। वैसे तो पार्क में कई कुत्ते-कुतियाएं टहलने के लिए आती थी लेकिन उस दिन एक नई कुतिया पार्क में आई जिसे पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे सफेद बाल, बड़ी बड़ी काली आंखें, रेशमी पूंछ कुल मिलाकर वह सबसे अलग नजर आ रही थी। मैंने अपने डॉग फार्म जहां पहले रहता था वहां भी इतनी खूबसूरत कुतिया नहीं देखी थी। मैं एक टक उसे देखे जा रहा था, तभी अचानक बच्चों ने मेरे पट्टे से बंधी रस्सी खींच घर चलने का आदेश दिया। मैंने जाते जाते मुड़कर उसकी ओर देखा, उसने भी मेरी ओर देखा। फिर मैं भारी कदमों से घर की ओर चल दिया।
आज घर में बिल्कुल मन नहीं लगा रहा था। हमेशा स्वादिष्ट लगने वाले पेडिग्री व बिस्किट में भी वो स्वाद नहीं आ रहा था। मन कर रहा था कि भाग कर वापस पार्क में चला जाउं लेकिन अपनी मजबूरियों से बंधा था। आखिर जब बोर हो गया तो ऊपर जाकर बालकनी में बैठ गया। दिमाग में बस उसी कुतिया की तस्वीर घूम रही थी। थोड़ी देर बाद सामने वाले मकान की बालकनी का दरवाजा खुलता है। एक महिला बालकनी में आती है जिसके साथ एक कुतिया होती है। अरे ये क्या ये तो वही कुतिया है जो मुझे पार्क में मिली थी। उसे देखते ही शरीर में स्फूर्ति सी आ गयी। दोनों की नजरें एक दूसरे से टकरायी और पूंछ हिलाकर हम दोनों एक दूसरे का अभिवादन किया......
क्रमश:
आखिर कई दिनों की मेरी मुराद आज पूरी होने जा रही थी। मेरे सिवा मेरे सभी साथियों को एक - एक कर कोई न कोई ले जा चुका था । ऊपर वाले से मन्नत मांगने की सोची लेकिन पशोपेश में पड़ गया कि मन्दिर जाउं, मस्जिद जाउं या चर्च क्योंकि मुझ पर किसी धर्म का ठप्पा भी नहीं था। फिर सोचा यही बैठकर ही प्रार्थना कर ली जाये हो सकता फरियाद सुन ली जाये। दो दिन बाद जब मुझे लेने के लिये बाकायदा लम्बी सी गाड़ी आयी तो लगा कि फरियाद सुन ली गई है। पेमेन्ट करने के बाद मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया। मैं भी पूंछ हिलाता मालिक के पीछे हो लिया। गाड़ी की गद्देदार सीट पर बैठकर पहली बार लगा कि सच्चे मन से यदि प्रार्थना की जाय तो मन्दिर, मस्जिद या चर्च कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है। गाड़ी शहर की व्यस्त सड़कों से होकर गुजर रही थी। एक चौराहे पर सिग्नल देख गाड़ी रूक जाती है। जैसे ही गाड़ी रूकती है, एक भिखारी कटोरा लेकर कार के पिछले दरवाजे की तरफ आता है और हाथ फैलाता है लेकिन कार की शीट पर किसी आदमी की जगह एक कुत्ते को देख मायूस होकर चला जाता है। उसे देख पहली बार मुझे मन ही मन अपने कुत्ता होने पर गर्व महसूस हुआ। चन्द मिनटों के सफर के बाद मैं अपने नये घर पहुंच चुका था। घर पहुंचते ही मेरा शानदार स्वागत हुआ। बच्चे मुझे देखकर बेहद खुश हुए। लगे हाथों मेरा नामकरण भी कर दिया गया.. जॉनी... वाह कितना बेहतरीन नाम था।
थोड़े ही दिनों में मैं परिवार वालों के साथ घुल मिल गया था। सभी का चहेता बन गया था। बच्चों से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। बच्चे सुबह उठते ही मुझे पास के पार्क में घुमाने ले जाते, शाम को आते ही मेरे साथ खेलने लग जाते। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी कुल मिलाकर जिन्दगी आराम से कट रही थी और मैं भी ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था।
एक दिन हमेशा की तरह पार्क में टहल रहा था। वैसे तो पार्क में कई कुत्ते-कुतियाएं टहलने के लिए आती थी लेकिन उस दिन एक नई कुतिया पार्क में आई जिसे पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे सफेद बाल, बड़ी बड़ी काली आंखें, रेशमी पूंछ कुल मिलाकर वह सबसे अलग नजर आ रही थी। मैंने अपने डॉग फार्म जहां पहले रहता था वहां भी इतनी खूबसूरत कुतिया नहीं देखी थी। मैं एक टक उसे देखे जा रहा था, तभी अचानक बच्चों ने मेरे पट्टे से बंधी रस्सी खींच घर चलने का आदेश दिया। मैंने जाते जाते मुड़कर उसकी ओर देखा, उसने भी मेरी ओर देखा। फिर मैं भारी कदमों से घर की ओर चल दिया।
आज घर में बिल्कुल मन नहीं लगा रहा था। हमेशा स्वादिष्ट लगने वाले पेडिग्री व बिस्किट में भी वो स्वाद नहीं आ रहा था। मन कर रहा था कि भाग कर वापस पार्क में चला जाउं लेकिन अपनी मजबूरियों से बंधा था। आखिर जब बोर हो गया तो ऊपर जाकर बालकनी में बैठ गया। दिमाग में बस उसी कुतिया की तस्वीर घूम रही थी। थोड़ी देर बाद सामने वाले मकान की बालकनी का दरवाजा खुलता है। एक महिला बालकनी में आती है जिसके साथ एक कुतिया होती है। अरे ये क्या ये तो वही कुतिया है जो मुझे पार्क में मिली थी। उसे देखते ही शरीर में स्फूर्ति सी आ गयी। दोनों की नजरें एक दूसरे से टकरायी और पूंछ हिलाकर हम दोनों एक दूसरे का अभिवादन किया......
क्रमश:
