हिन्दी दिवस
लोगों से खचाखच भरा सभागार, लगभग सभी वक्ता अपना उद्बोधन पुरा कर चुके हैं, सिर्फ मंत्रीजी की प्रतीक्षा है जो आज के हिन्दी दिवस समारोह के मुख्य अतिथि भी हैं। मंत्रीजी भी पद की प्रतिष्ठा रखते हुए घण्टे भर के विलम्ब से ही पहुंचे हैं। जो मंत्री समय पर पहुंच जाये वह मंत्री ही कैसा? मंत्रीजी यदि व्यस्त ना भी हो तो उन्हें व्यस्त होने का दिखावा करना ही पड़ता है। यह दिखाना ही पड़ता है कि उन्हें समय ही नहीं था इसके बावजूद उन्होंने कार्यक्रम में आकर आप पर उपकार ही किया है। मंत्रीजी के आते ही उनके स्वागत की औपचारिकता शुरू हो गयी। लगभग मंत्रीजी के बराबर वजन की विशाल माला से उनका स्वागत किया गया। माला इतनी बड़ी है कि उसमें मंत्रीजी सहित सारे अतिथि समा जाएं। स्वागत के उपरान्त मंत्रीजी ने अपना उद्बोधन शुरू किया।
''प्यारे भाईयों व बहिनों! हिन्दी हमारे लिये सिर्फ भाषा नहीं है बल्कि हमारी पहचान है। हिन्दी तो देश के माथे की बिन्दी है। ये वो धागा है जो देश के कोने — कोने में रहने वाले लोगों को एक सूत्र में बांधता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हिन्दी को वो सम्मान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिये। अभी तक हम इसे राष्ट्रीय भाषा का ही दर्जा नहीं दिलवा पाये हैं। पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के चलते अंग्रेजी बोलने वाले को सभ्य व आधुनिक मान लिया गया वहीं हिन्दी बोलने वाले को आज भी गंवार समझा जाता है। कितने आश्चर्य की बात है कि विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में गिनती होने के पश्चात भी हमारे देश में हिन्दी की स्थिति बहुत दयनीय है।''
मंत्रीजी का उद्बोधन जारी था। जनता मंत्रीजी के हिन्दी भाषा पर ज्ञान से मंत्रमुग्ध थी। अपने भाषायी कौशल से मंत्रीजी ने जनता को हिलने नहीं दिया। भाषण खत्म कर मंत्रीजी तुरन्त निकल गये। मंत्रीजी का अगला कार्यक्रम शहर के नामी अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में था जहां उन्हें अपने इकलौते पुत्र को प्रवेश दिलवाना था।
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