Thursday, 1 July 2021

व्यंग्य : बढ़ता तापमान

पिछले कुछ वर्षों से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। पारा लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहा है। वैज्ञानिक हतप्रभ है कि आखिर क्या कारण हो गया कि कुछ वर्षों में ही धरती का तापमान इतना बढ़ गया। आनन — फानन में वैज्ञानिकों टीम बिठाई गई लेकिन जिसे इसका कारण जानने की जिम्मेदारी सौंप गयी।
बहुत से शोध और प्रयोंगों के बाद भी यह टीम किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने में नाकाम रही। सभी विशेषज्ञ परेशान थे कि आखिर क्या कारण है कि पृथ्वी का तापमान एकदम से इतना बढ़ गया है। चन्द महीनों में हीं कोरोना की वैक्सीन खोज निकालने वाले वैज्ञानिक इस मामले में खाली हाथ ही थे। 
एक दिन ऐसे ही एक हताश भारतीय वैज्ञानिक इन्टरनेट खंगाल रहा था। भटकते — भटकते वो एक न्यूज चैनल की वेबसाईट पर पहुंच जाता है। वेबसाईट पर प्रकाशित एक न्यूज से वो शॉक हो जाता है। कहते हैं ना कि कई बार जो काम बड़े — बड़े नामधारी विशेषज्ञ नहीं कर पाते उसे एक छोटा सा अनाम व्यक्ति कर देता है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वैज्ञानिक जिसे नहीं खोज पाये वो कारण इस न्यूज चैनल ने खोज निकाला। न्यूज चैनल पर कई खबरें पटी जिनके शीर्षक लगभग इस प्रकार थे 'फलां अभिनेत्री ने लगाई आग' 'फलां अभिनेत्री ने अपनी अदाओं से बढ़ाया तापमान' 'इस हसीन अभिनेत्री ने बरपाया कहर''फलां मशहूर अभिनेत्री ने बढ़ाई गर्मी'
खबरें देखकर वैज्ञानिक चकित रह गया। उसका बरसों का ज्ञान आज इन न्यूज चैनलों के आगे नतमस्तक था। उसने वैज्ञानिकों की टीम को तुरन्त इस बात की जानकारी दी गयी जो इस बारे में शोध कर रही थी। वे लोग गरमी के कारण को जानकर जितने आश्चर्यचकित थे उतने ही विवश भी क्योंकि सूर्य के कारण बढ़ते तापमान का उपाय तो उनके पास था लेकिन इस तापमान का उपाय उनके पास भी नहीं था।

Wednesday, 9 June 2021

शवयात्रा

शवयात्रा
महामारी को लेकर पूरे प्रदेश में 'तालाबन्दी' कर दी गयी थी। बाजार बन्द कर दिये गये थे। कुछ धनवान इसे उचित अवसर समझ अन्य देशों में भ्रमण के लिये निकल गये। जो कहीं घूमने न जा सके उन्होंने घर पर ही रहना उचित समझा।
दिहाड़ी मजदूरों व गरीबों के लिये सरकार ने फैक्ट्रियों में काम सुचारू रखा गया था ताकि मजदूरों के पलायन को रोका जा सके। मंगलू भी अपनी पत्नी के साथ एक फैक्ट्री में काम करता था। पेट की भूख मौत के डर से कहीं भयानक होती है। अगर मंगलू काम न करता तो अपना व बच्चों का पेट कैसे पालता। पिछली तालाबन्दी में फैक्ट्रियां बन्द होने के कारण मंगलू को अपने गांव हजारों किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ा था। रोटी के भी लाले थे। इस बार गनीमत थी कि फैक्ट्रियों में काम सुचारू था। कम से भूखो तो नहीं मरना पड़ेगा। बिमारी अमीर — गरीब का भेद नहीं देखती। आखिरकार मंगलू की पत्नी भी महामारी की चपेट में आ गयी। लाख कोशिश करके भी मंगलू उसे बचा नहीं पाया। चाँद पर पहुंच चुका व्यक्ति आज भी सामाजिक कुरीतियों के बन्धन से बाहर नहीं निकल पाया था। पत्नी की मृत्यु पर मंगलू को भी सामाजिक रीति रिवाज के चलते या यूं कहें कि समाज के तानों से बचने के लिये छोटा ही सही मृत्युभोज का आयोजन करना ही पड़ा। मंगलू ने कर्ज लेकर लगभग सौ— डेढ़सो आदमियों के भोजन का आयोजन किया। भोजन के दौरान ही पुलिस ने छापा मार दिया। लोग डर के मारे भोजन छोड़ कर ही भाग गये। सारा भोजन जब्त कर लिया गया। मंगलू पर महामारी के दौरान 'मृत्युभोज' का आयोजन कर महामारी फैलाने के अपराध में दस हजार का जुर्माना लगाया गया।
बिमारी सचमुच अमीर—गरीब का भेद नहीं देखती। दूसरे दिन शहर में प्रदेश के बड़े नेता की पत्नी की महामारी के चलते मृत्यु हो गयी थी। हजारों लोग मंत्रीजी की पत्नी की शवयात्रा में सम्मिलित हुए जिनमें मंगलू भी शामिल था। कल मंगलू पर जुर्माना लगाने वाले अधिकारी आज इस शवयात्रा की सुरक्षा में तैनात थे।

Thursday, 6 May 2021

लोकडाउन का प्रेम पत्र

लॉकडाउन में फंस गये प्रेमी/पति का अपनी प्रेमिका/पत्नी को कोरोना संक्रमित प्रेम पत्र

प्रिये!
आज तुमसे दूर हुए एक माह से अधिक हो गया है। सत्यानाश हो इस महामारी का जिसने मुझे तुमसे इतना दूर कर दिया। इतने लम्बे समय तुमसे दूर रहने के बाद मेरी हालत ऐसी हो गयी है जैसी बिना 'आॅक्सीजन सिलेण्डर' के कोरोना मरीज की हो जाती है। उठते - बैठते तुम्हारा ही चेहरा दिखाई देता है।  तुम्हारी यादों से दिलो-दिमाग की हालत बिल्कुल वैसी ही हो गयी है जैसी 'कोरोना' संक्रमिक फेफड़ों' की हो जाया करती है। तुम्हारे बिना सांस लेना भी दूभर हो गया है, ऐसा लगता है मानों मेरा 'आॅक्सीजन लेवल' गिर रहा हो। 
बहुत प्रयास करता हूँ कि कुछ 'पाॅजिटिव' ही सोचूं लेकिन फिर भी मन में 'नेगेटिव' विचार ही आते हैं। कहीं मन नहीं लगता। यदि पंख होते तो उड़कर तुम्हारे पास पहुंच जाता लेकिन यहां तो बाहर निकलना भी मुश्किल है। दरवाजे के बाहर ही हवलदार लाठी लेकर बैठा रहता है।
काश उस दिन तुम्हारी बात मान लेता और एक दिन रूक जाता तो यहां ना फंसता। 'दो गज दूरी' की जगह तुमसे मीलों दूर आ बैठा।  कितना अजीब है ना? जब मैं एक ही छत के नीचे तुम्हारे साथ था तो भी लगता था जैसे 'क्वारंटाईन' हो रखा हूँ, पास होकर भी लगता था जैसे 'आईसोलेशन' में हूँ, लेकिन आज तुमसे इतनी दूर होकर महसूस होता है कि तुम मेरे लिये उतनी ही जरूरी हो जितने की मास्क और सेनेटाईजर होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि तुममें ही मुझे मेरी जीवन रक्षक 'वैक्सीन' नजर आती है। 
कहते हैं ना कि कितना ही कठिन समय हो गुजर ही जाता है, इसी प्रकार यह मुश्किल समय भी गुजर ही जायेगा और हम फिर से मिल जायेंगे। हमारे बीच का भी 'क्वारंटाईन' जल्द ही खत्म हो जायेगा। और हां, अबकी बार तुम अपने प्रेम से मुझे 'सेनेटाईज' करके  दिल में हीं कैद कर देना और आजीवन 'लाॅकडाउन' घोषित कर देना।

Sunday, 25 April 2021

विकास या विनाश

विकास या विनाश
पृथ्वी पर मानव ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। चन्द्रमा और मंगल पर भी अपने झण्डे वह गाड़ चुका है। अब उसकी दृष्टि एक ऐसे ग्रह पर है जहां जीवन की काफी सम्भावना हो। उसने वह ग्रह ढूंढ भी लिया है। उस ग्रह तक पहुुंचने के लिये वह दिन रात प्रयास रत है। बरसों की मेहनत से मानव ने अब वो विमान भी बना लिया है जिसमें सवार होकर वह उस ग्रह की यात्रा कर सकता है। कहा जाता है कि वह ग्रह बिल्कुल पृथ्वी जैसा ही है। उस ग्रह का भी अपना वायुमण्डल  और गुरूत्व बल है। यदि वहां वास्तव में जीवन सम्भव है तो भविष्य में मानव को वहां भी बसाया जा सकता है। इन्हीं बातों का पता लगाने के लिये मानव अपने नवनिर्मित विमान में सवार होकर उस ग्रह की यात्रा पर निकल पड़ा। लम्बी यात्रा के पश्चात् जब वो उस ग्रह पर उतरा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। यह ग्रह तो बिल्कुल पृथ्वी की तरह ही था। बल्कि यह कहना उचित होगा कि इस ग्रह के प्राकृतिक सौन्दर्य के सामने पृथ्वी का सौन्दर्य कुछ नहीं था। उसने सोचा कि धर्मग्रन्थों में जिस स्वर्ग का उल्लेख है कहीं यह वही तो नहीं। वह इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ था कि अचानक विचित्र से दिखने वाले जीवों ने चारों ओर से आकर उसे घेर लिया और आश्चर्य से देखने लगे। अपने आपको उन लोगों से गिरा पाकर वह मानव घबरा गया। उस जीवोें ने उसे पकड़ लिया और अपने ही जैसे एक जीव के समक्ष ले गये जो कदाचित उनका राजा या नायक था। अचानक वह जीव बोला - ‘‘कौन हो तुम? और किस प्रयोजन से यहां आये हो?’’
मानव के आश्चर्य का ठिकाना न रहा यह जीव तो उसके ग्रह की भाषा जानता है।
‘‘चैंको मत, मैं तुम्हारे ग्रह की भाषा ही नहीं बल्कि तुम्हारे ग्रह के बारे में सबकुछ जानता हूं, बताओ किस प्रयोजन से यहां आये हो?’’
मानव बोला - ‘‘मैं जीवन की सम्भावनाओं को तलाशने इस ग्रह पर आया हूँ, पृथ्वी पर स्थितियां मानव के लिये अधिक अनुकूल नहीं रह गयी हैं, वहां अब मानव भारी संकट में है। ऐसे में मानवों को अन्यत्र बसाने के लिये किसी ऐसे ग्रह की आवश्यकता है जिस पर जीवन सम्भव हो, इसी कारण यहां आया हूं।’’
-‘‘तो क्या अब तुम इस ग्रह पर बसना चाहते हो?’’
- ‘‘जी हां, यदि आप अनुमति दें तो’’
- ‘‘तुम्हें अनुमति क्यों दी जाये?’’
- ‘‘क्योंकि हम संकट में है और किसी संकटग्रस्त की सहायता करना ही धर्म है?’’
- ‘‘किन्तु तुम्हारी सहायता करके हम किसी संकट में नहीं पड़ना चाहते’’
- ‘‘हमारी सहायता करके भला आप कैसे संकट में पड़ जायेंगे?’’
- ‘‘तुमने देखा होगा कि हमारा ग्रह तुम्हारी पृथ्वी से कहीं अधिक सुन्दर और मनोरम है, और इसकी तुलना में पृथ्वी कहीं नहीं ठहरती’’
- ‘‘जी हां वो तो है’’
-‘‘जब मानव ने पहली बार पृथ्वी पर जन्म लिया या तो पृथ्वी इससे कहीं अधिक सुन्दर थी।  हमारा ग्रह पृथ्वी की तुलना में कहीं नहीं था।  पृथ्वी पर मानव को उपभोग के लिये ईश्वर ने अकूत प्राकृतिक सम्पदा सौंपी। इसके साथ ही मानव को बुद्धि बल दिया जिससे वह अपने ग्रह पर रहने वाले सभी जीवों की रक्षा कर सके। ईश्वर द्वारा दिये गये बुद्धि बल से मानव ने बहुत प्रगति भी की। अपनी बुद्धि व प्रगति के मद में चूर मानव अपने ही ग्रह की प्राकृतिक सम्पदा को लूटने लगा। अहंकार में चूर मानव विकास व विनाश में भी भेद भूल बैठा। तुमने अपने ग्रह पर दूसरे जीवों का रहना मुश्किल कर दिया।’’
मानव बोला -‘‘किन्तु मैंने तो विज्ञान में प्रगति की है आज चन्द्रमा और मंगल तक अपना झण्डा गाड़ आया हूं क्या ये विकास नहीं है?’’
जीव - ‘‘निःसन्देह विकास है, किन्तु एक सत्य यह भी है कि तुमने इसी विकास के तहत अपनी ही जाति का सर्वनाश हो सके इतने आयुध बना लिये हैं। न सिर्फ अपनी जाति का बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी निर्जन बन सके इतने आयुध तुमने इकट्ठा कर रखे हैं।  अपने इसी तथाकथित विकास में तुमने अपने ग्रह का प्राकृतिक सन्तुलन बिगाड़ दिया है। स्वर्ग से भी सुन्दर पृथ्वी को तुमने बर्बाद कर दिया। आज जो तुम्हारी स्थिति है उसके उत्तरदायी तुम स्वयं हो? आज यदि तुम्हारा ग्रह तुम्हारे ही रहने लायक नहीं बचा तो इसका जिम्मेदार कौन है? कौन है जिसने तुम्हारे ग्रह को इस स्थिति में पहुंचा दिया?’’
इस बार मानव निरूत्तर था
-‘‘अब जब तुम्हारा ग्रह तुम्हारे ही रहने लायक नहीं बचा या यूं कहो कि अपने ग्रह का पूरा सर्वनाश करके तुम इस ग्रह पर बसना चाहते हो, तो ऐसे में तुम्हे अनुमति क्यों दी जाये? इसलिये ताकि तुम अपने ग्रह के ही समान इस ग्रह को भी बर्बाद कर दो? इसका भी सर्वनाश कर दो? नहीं ऐसा नहीं हो सकता? तुम जैसे हिंसक और खतरनाक जीव को हम इस ग्रह पर रहने की अनुमति नहीं दे सकते?, इसी समय लौट जाओ अपने ग्रह पर और हो सके तो अपने किये का पश्चाताप करो और अपने लिये दूसरे ग्रह को ढूंढने की बजाय अपने ग्रह को अपने रहने योग्य बनाओ, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब यह विनाश रूपी विकास का पहिया तुम्हे ही कुचल देगा’’

  और मानव निरूत्तर और निराश होकर वहां से लौट आया

Saturday, 10 April 2021

मित्र राजेश को श्रद्धांजलि

मेरे प्रिय मित्र राजेश को श्रद्धांजलि स्वरूप 
शब्द पुष्प

दिन अभी ढला न था
अभी तमस हुआ न था
उठ के तुम यूं चल दिये
यूं कोई गया न था

जो तुम्हे ना कह सका
कई बातें वो बाकी थी
तुम अभी कहां चले
मुलाकातें तो बाकी थी

अभी अभी तो कानों में 
घुली थी मीठी बोलियां
अभी तो बाकी थी कई
होली और दिवालियां

अभी हंसी ठिठोली का
दौर बस चला ही था
अभी तो मित्र—प्रेम का
दीप बस जला ही था

पोटली ले भात की
अभी तो मैं चला न था
अभी तलक सुदामा को
कृष्ण भी मिला न था

मिले विधाता गर कहीं
मैं पूछूंगा उसे यहीं
क्यूं तोड़ते इस पुष्प को
कर तेरे कांपे नहीं

क्यूं सफर के बीच ही
छोड़ तुम चले गये
हाय विधि के क्रूरतम
हाथों से छले गये

साथ मेरा छोड़ तुम
कौनसी डगर गये
मैं अकेला रह गया
कूच तुम कर गये

Saturday, 3 April 2021

सच मे बहुत कंजूस हो तुम

सच ही तो कहते हैं
तुम्हारे मित्र
कि तुम
बहुत कन्जूस हो 
तभी तो
मुझसे 
इतना प्रेम
होने के बाद भी
जताते 
बहुत कम हो

सच में
तुम
बहुत कन्जूस हो
तभी तो
यदि मुझे
जरा सी तकलीफ 
हो जाये
तो तुम 
तड़प उठते हो
लेकिन मेरे सामने
कभी ये फिक्र
जताते नहीं हो

सच में
तुम
बहुत कन्जूस हो
तभी तो
अपने अन्दर
न जाने 
कितने अरमान
दबा रखे हैं
तुमने
जो मेरे लिये
कम नहीं है
किसी खजाने से
किन्तु तुम
जाने क्यों
उन्हें 
लुटाते ही नहीं हो
क्योंकि
सच में
तुम
बहुत कन्जूस हो

Friday, 12 March 2021

आओ म्हारो गांव देखो

आओ म्हारो गांव देखो
निरालो निम्बाज देखो
गांव री गलियां में थांने
आज मैं घुमाउं देखो

निम्बाज री महीमा उंची
जिला री है शान देखो
गांव मांही घुसां जणे
कुबाजी रो थान देखो

मीठा मीठा लोग अठे
मीठी मीठी वाणी देखो
गंगाजल सो पावन अठे
मीठो मीठो पाणी देखो

चैराया रे माथे अठे
आसरलाई गेट देखो
बाजारां रे मांही अठै
मोटा मोटा सेठ देखो

गाडा माथे घूमे अठे
विदेशी सैलानी देखो
कैमरो में कैद कर वे
ले जावे निशानी देखो

एतिहासिक मन्दिर अठे
मगरमण्डी थान देखो
बाबा रा देवरा अठे तो
बायासा रा थान देखो

संतां री तो धरती आ तो
मोटो रामद्वारो देखो
अेकर अठे दरसण कर
जीवन तो संवारो देखो

गांव रे तो जोड़े अठे
मोटो ध्यान केन्द्र देखो
मोटा मोटा संत अठे
करे जय जिनेन्द्र देखो

आओ म्हारो गांव देखो
निरालो निम्बाज देखो
गांव री गलियां में थांने
आज मैं घुमाउं देखो

‘पथिक’

Tuesday, 9 February 2021

बाबु बनाम बाबु

बाबु बनाम बाबु

एक दौर था जब ‘बाबु’ शब्द कान में पड़ते ही आॅफिस के किसी कोने में कागजों के ढेर के बीच बैठे किसी व्यक्ति की छवि दिमाग में उभरती थी जो मोटा सा चश्मा आँखों पर चढ़ाये रखता था। वो काम के बोझ से इतना झंुंझलाया रहता था कि शाम को घर जाते समय बीवी द्वारा बतायी गयी सब्जी खरीद कर ले जाना भी भूल जाया करता था। वो आॅफिस में अफसर की डांट खाता तो घर पर अपनी बीवी की। वह काम में इतना डूबा रहता कि उसे अपने कपड़ों पर इस्तरी करने तक का समय नहीं मिलता था। लेकिन वर्तमान समय में ‘बाबु’ शब्द के मायने बिल्कुल बदल गये हैं या यूं कहें कि बदल दिये गये हैं। और ये बदलाव किया है वर्तमान समय की नवयुवतियों ने। इन युवतियों को स्वयं नहीं मालूम कि उन्होंने कितना बड़ा कान्तिकारी परिवर्तन कर दिया है। इस युग का ‘बाबु’ अब अत्याधुनिक परिधान पहनता है। उसकी आँखों पर पुराने बड़ी फ्रेम वाले नजर के चश्मे की जगह आधुनिक फैशनेबल चश्मा चढ़ा रहता है। जेब में ‘एप्पल’ या किसी ब्राण्डेड कम्पनी का लेटेस्ट स्मार्टफोन रहता हैं अब वो अपनी तशरीफ किसी पुरानी टूटी-फूटी कुर्सी की बजाय भैंसे जैसी किसी मोटरसाईकिल की सीट पर टिकाये रखता है। उसकी मोटरसाइकिल की पिछली सीट उसकी प्रेयसी बैठी रहती है जो अपने ‘बाबु’ को इस तरह कसकर पकड़े रखती है मानो दोनों के बीच में फेविकोल का मजबूत जोड़ हो। युवती उसे हमेशा ‘बाबु’ के सम्बोधन से ही पुकारती है।  आप अपने आस - पास नजर दौड़ायेंगे तो आपको ऐसे कई ‘बाबु’ अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर मिल जायेंगे। यह ‘बाबु’ अपनी प्रेयसी के मोबाईल रिचार्ज से लेकर हर खर्चे हंसते - हंसते उठाता है। पहले के ‘बाबु’ और इस ‘बाबु’ में एक फर्क है कि यह आधुनिक ‘बाबु’ विवाहित नहीं होता।  पहले का ‘बाबु’ बाजार में अपनी पत्नी के साथ चलने में भी संकोच का अनुभव करता था वहीं ‘आधुनिक बाबु’ ‘प्यार किया तो डरना क्या’ की मूल भावना को अपने चरित्र में उतार लेता है और बस, आॅटो, मेट्रो या किसी सावर्जनिक पार्क में भी 'शुरू' हो जाता है। हालांकि कई बार उसे इसका खामियाजा भी भुगतान पड़ता है और  एंटी रोमियो स्क्वायड द्वारा सरे आम ‘मुर्गा’ भी बनाया जाता है परन्तु इसके बावजूद दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी इस ‘बाबु’ हरकतों में कोई कमी नहीं आती है। सूर्योदय होते ही वह फिर अपने काम पर लग जाता है। सही मायने में ‘बाबु’ का यह नया रूप अपने पुराने रूप की तुलना में कहीं बेहतर है, और ‘बाबु’ के इस नये रूप के लिये उनकी प्रेयसियों को यदि पद्मश्री भी दिया जाये तो यह पद्मश्री का सम्मान होगा।