Sunday, 14 November 2021
Thursday, 1 July 2021
व्यंग्य : बढ़ता तापमान
Wednesday, 9 June 2021
शवयात्रा
Thursday, 6 May 2021
लोकडाउन का प्रेम पत्र
Sunday, 25 April 2021
विकास या विनाश
Saturday, 10 April 2021
मित्र राजेश को श्रद्धांजलि
Saturday, 3 April 2021
सच मे बहुत कंजूस हो तुम
Friday, 12 March 2021
आओ म्हारो गांव देखो
Tuesday, 9 February 2021
बाबु बनाम बाबु
बाबु बनाम बाबु
एक दौर था जब ‘बाबु’ शब्द कान में पड़ते ही आॅफिस के किसी कोने में कागजों के ढेर के बीच बैठे किसी व्यक्ति की छवि दिमाग में उभरती थी जो मोटा सा चश्मा आँखों पर चढ़ाये रखता था। वो काम के बोझ से इतना झंुंझलाया रहता था कि शाम को घर जाते समय बीवी द्वारा बतायी गयी सब्जी खरीद कर ले जाना भी भूल जाया करता था। वो आॅफिस में अफसर की डांट खाता तो घर पर अपनी बीवी की। वह काम में इतना डूबा रहता कि उसे अपने कपड़ों पर इस्तरी करने तक का समय नहीं मिलता था। लेकिन वर्तमान समय में ‘बाबु’ शब्द के मायने बिल्कुल बदल गये हैं या यूं कहें कि बदल दिये गये हैं। और ये बदलाव किया है वर्तमान समय की नवयुवतियों ने। इन युवतियों को स्वयं नहीं मालूम कि उन्होंने कितना बड़ा कान्तिकारी परिवर्तन कर दिया है। इस युग का ‘बाबु’ अब अत्याधुनिक परिधान पहनता है। उसकी आँखों पर पुराने बड़ी फ्रेम वाले नजर के चश्मे की जगह आधुनिक फैशनेबल चश्मा चढ़ा रहता है। जेब में ‘एप्पल’ या किसी ब्राण्डेड कम्पनी का लेटेस्ट स्मार्टफोन रहता हैं अब वो अपनी तशरीफ किसी पुरानी टूटी-फूटी कुर्सी की बजाय भैंसे जैसी किसी मोटरसाईकिल की सीट पर टिकाये रखता है। उसकी मोटरसाइकिल की पिछली सीट उसकी प्रेयसी बैठी रहती है जो अपने ‘बाबु’ को इस तरह कसकर पकड़े रखती है मानो दोनों के बीच में फेविकोल का मजबूत जोड़ हो। युवती उसे हमेशा ‘बाबु’ के सम्बोधन से ही पुकारती है। आप अपने आस - पास नजर दौड़ायेंगे तो आपको ऐसे कई ‘बाबु’ अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर मिल जायेंगे। यह ‘बाबु’ अपनी प्रेयसी के मोबाईल रिचार्ज से लेकर हर खर्चे हंसते - हंसते उठाता है। पहले के ‘बाबु’ और इस ‘बाबु’ में एक फर्क है कि यह आधुनिक ‘बाबु’ विवाहित नहीं होता। पहले का ‘बाबु’ बाजार में अपनी पत्नी के साथ चलने में भी संकोच का अनुभव करता था वहीं ‘आधुनिक बाबु’ ‘प्यार किया तो डरना क्या’ की मूल भावना को अपने चरित्र में उतार लेता है और बस, आॅटो, मेट्रो या किसी सावर्जनिक पार्क में भी 'शुरू' हो जाता है। हालांकि कई बार उसे इसका खामियाजा भी भुगतान पड़ता है और एंटी रोमियो स्क्वायड द्वारा सरे आम ‘मुर्गा’ भी बनाया जाता है परन्तु इसके बावजूद दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी इस ‘बाबु’ हरकतों में कोई कमी नहीं आती है। सूर्योदय होते ही वह फिर अपने काम पर लग जाता है। सही मायने में ‘बाबु’ का यह नया रूप अपने पुराने रूप की तुलना में कहीं बेहतर है, और ‘बाबु’ के इस नये रूप के लिये उनकी प्रेयसियों को यदि पद्मश्री भी दिया जाये तो यह पद्मश्री का सम्मान होगा।