विकास या विनाश
पृथ्वी पर मानव ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। चन्द्रमा और मंगल पर भी अपने झण्डे वह गाड़ चुका है। अब उसकी दृष्टि एक ऐसे ग्रह पर है जहां जीवन की काफी सम्भावना हो। उसने वह ग्रह ढूंढ भी लिया है। उस ग्रह तक पहुुंचने के लिये वह दिन रात प्रयास रत है। बरसों की मेहनत से मानव ने अब वो विमान भी बना लिया है जिसमें सवार होकर वह उस ग्रह की यात्रा कर सकता है। कहा जाता है कि वह ग्रह बिल्कुल पृथ्वी जैसा ही है। उस ग्रह का भी अपना वायुमण्डल और गुरूत्व बल है। यदि वहां वास्तव में जीवन सम्भव है तो भविष्य में मानव को वहां भी बसाया जा सकता है। इन्हीं बातों का पता लगाने के लिये मानव अपने नवनिर्मित विमान में सवार होकर उस ग्रह की यात्रा पर निकल पड़ा। लम्बी यात्रा के पश्चात् जब वो उस ग्रह पर उतरा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। यह ग्रह तो बिल्कुल पृथ्वी की तरह ही था। बल्कि यह कहना उचित होगा कि इस ग्रह के प्राकृतिक सौन्दर्य के सामने पृथ्वी का सौन्दर्य कुछ नहीं था। उसने सोचा कि धर्मग्रन्थों में जिस स्वर्ग का उल्लेख है कहीं यह वही तो नहीं। वह इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ था कि अचानक विचित्र से दिखने वाले जीवों ने चारों ओर से आकर उसे घेर लिया और आश्चर्य से देखने लगे। अपने आपको उन लोगों से गिरा पाकर वह मानव घबरा गया। उस जीवोें ने उसे पकड़ लिया और अपने ही जैसे एक जीव के समक्ष ले गये जो कदाचित उनका राजा या नायक था। अचानक वह जीव बोला - ‘‘कौन हो तुम? और किस प्रयोजन से यहां आये हो?’’
मानव के आश्चर्य का ठिकाना न रहा यह जीव तो उसके ग्रह की भाषा जानता है।
‘‘चैंको मत, मैं तुम्हारे ग्रह की भाषा ही नहीं बल्कि तुम्हारे ग्रह के बारे में सबकुछ जानता हूं, बताओ किस प्रयोजन से यहां आये हो?’’
मानव बोला - ‘‘मैं जीवन की सम्भावनाओं को तलाशने इस ग्रह पर आया हूँ, पृथ्वी पर स्थितियां मानव के लिये अधिक अनुकूल नहीं रह गयी हैं, वहां अब मानव भारी संकट में है। ऐसे में मानवों को अन्यत्र बसाने के लिये किसी ऐसे ग्रह की आवश्यकता है जिस पर जीवन सम्भव हो, इसी कारण यहां आया हूं।’’
-‘‘तो क्या अब तुम इस ग्रह पर बसना चाहते हो?’’
- ‘‘जी हां, यदि आप अनुमति दें तो’’
- ‘‘तुम्हें अनुमति क्यों दी जाये?’’
- ‘‘क्योंकि हम संकट में है और किसी संकटग्रस्त की सहायता करना ही धर्म है?’’
- ‘‘किन्तु तुम्हारी सहायता करके हम किसी संकट में नहीं पड़ना चाहते’’
- ‘‘हमारी सहायता करके भला आप कैसे संकट में पड़ जायेंगे?’’
- ‘‘तुमने देखा होगा कि हमारा ग्रह तुम्हारी पृथ्वी से कहीं अधिक सुन्दर और मनोरम है, और इसकी तुलना में पृथ्वी कहीं नहीं ठहरती’’
- ‘‘जी हां वो तो है’’
-‘‘जब मानव ने पहली बार पृथ्वी पर जन्म लिया या तो पृथ्वी इससे कहीं अधिक सुन्दर थी। हमारा ग्रह पृथ्वी की तुलना में कहीं नहीं था। पृथ्वी पर मानव को उपभोग के लिये ईश्वर ने अकूत प्राकृतिक सम्पदा सौंपी। इसके साथ ही मानव को बुद्धि बल दिया जिससे वह अपने ग्रह पर रहने वाले सभी जीवों की रक्षा कर सके। ईश्वर द्वारा दिये गये बुद्धि बल से मानव ने बहुत प्रगति भी की। अपनी बुद्धि व प्रगति के मद में चूर मानव अपने ही ग्रह की प्राकृतिक सम्पदा को लूटने लगा। अहंकार में चूर मानव विकास व विनाश में भी भेद भूल बैठा। तुमने अपने ग्रह पर दूसरे जीवों का रहना मुश्किल कर दिया।’’
मानव बोला -‘‘किन्तु मैंने तो विज्ञान में प्रगति की है आज चन्द्रमा और मंगल तक अपना झण्डा गाड़ आया हूं क्या ये विकास नहीं है?’’
जीव - ‘‘निःसन्देह विकास है, किन्तु एक सत्य यह भी है कि तुमने इसी विकास के तहत अपनी ही जाति का सर्वनाश हो सके इतने आयुध बना लिये हैं। न सिर्फ अपनी जाति का बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी निर्जन बन सके इतने आयुध तुमने इकट्ठा कर रखे हैं। अपने इसी तथाकथित विकास में तुमने अपने ग्रह का प्राकृतिक सन्तुलन बिगाड़ दिया है। स्वर्ग से भी सुन्दर पृथ्वी को तुमने बर्बाद कर दिया। आज जो तुम्हारी स्थिति है उसके उत्तरदायी तुम स्वयं हो? आज यदि तुम्हारा ग्रह तुम्हारे ही रहने लायक नहीं बचा तो इसका जिम्मेदार कौन है? कौन है जिसने तुम्हारे ग्रह को इस स्थिति में पहुंचा दिया?’’
इस बार मानव निरूत्तर था
-‘‘अब जब तुम्हारा ग्रह तुम्हारे ही रहने लायक नहीं बचा या यूं कहो कि अपने ग्रह का पूरा सर्वनाश करके तुम इस ग्रह पर बसना चाहते हो, तो ऐसे में तुम्हे अनुमति क्यों दी जाये? इसलिये ताकि तुम अपने ग्रह के ही समान इस ग्रह को भी बर्बाद कर दो? इसका भी सर्वनाश कर दो? नहीं ऐसा नहीं हो सकता? तुम जैसे हिंसक और खतरनाक जीव को हम इस ग्रह पर रहने की अनुमति नहीं दे सकते?, इसी समय लौट जाओ अपने ग्रह पर और हो सके तो अपने किये का पश्चाताप करो और अपने लिये दूसरे ग्रह को ढूंढने की बजाय अपने ग्रह को अपने रहने योग्य बनाओ, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब यह विनाश रूपी विकास का पहिया तुम्हे ही कुचल देगा’’
और मानव निरूत्तर और निराश होकर वहां से लौट आया