Tuesday, 22 August 2023

टिकट

 'टिकट'

उसे किसी ने कह दिया है कि तुम्हारा टिकट पक्का है। ऊपर से बात हो गयी है। एक बारगी तो आदमी 'ऊपरवाले' को जान ले लेकिन यह जो राजनीति का 'ऊपरवाला' है इसके बारे में अभी तक शोध जारी है। आश्वासन मिलने के बाद से ही उसके रंग बदले हुए हैं। उसके बदले रंग देखकर गिरगिटों को अस्तित्व संकट अनुभव होने लगा। उसने तुरन्त दर्जन भर खादी के ​कुरते पायजामे सिलवा लिये। भावशून्य चेहरे पर अब सदैव बनावटी मुस्कान बिखरी रहती व हाथ हमेशा नमस्कार की मुद्रा में जुड़े रहते। रिश्तेदारों व मित्रों से पैसों का जुगाड़ कर लिया। बाकी कसर जमीन बेच कर पूरी कर ली। क्षेत्र के कुछ अति चतुर लोग उसकी महत्वाकांक्षा को ताड़ गये थे वे अब उसके साथ हो लिए। ये लोग अपने नेता की झूठी तारीफ (चालपूसी) से ऐसा माहौल बनाये रखते कि वह उससे आगे कुछ देख ही नहीं पाता। बदले में वह  उनके खाने — पीने सहित तमाम खर्चे उठाता। सभाओं का दौर शुरू हो गया। उसने क्षेत्र के विकास के लिए अपना घोषणा पत्र भी जारी कर दिया। क्षेत्र में चारों तरफ बैनर व होर्डिंग टंग गये जिसमें उसे 'गरीबों का मसीहा' 'जननायक' जैसे कई उपनामों से सम्बोधित किया गया था। वह अब अपने आपको 'विधायक' मान चुका था।

इसी बीच पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी जिसमें उसका कहीं नाम न था। जिस 'ऊपरवाले' ने आश्वासन दिया था वह अब सम्पर्क क्षेत्र से बाहर था। हमेशा वह जिन लोगों से गिरा रहता वे लोग अब असली उम्मीदवार के साथ थे। सपनों की इबारत ढह चुकी थी जिसके मलबे तले वह स्वयं दबा पड़ा था।

Saturday, 8 July 2023

लघुकथा : विचारधाराओं के शव


चुनावों की तारीखें तय हो चुकी है। कुछ दिनों बाद ही नयी सरकार चुनी जाएगी। बहुत सारी पार्टियां चुनावों में ताल ठोक रही है। पार्टियों के समर्थकों में भी जबरदस्त जोश है। दो प्रमुख पार्टियों में कड़ी टक्कर बतायी जा रही है। दोनों पक्षों की विचारधाराएं भी नदी के उन दो तटों की भांति हैं जो कभी मिल नहीं सकते। दोनों ही पक्षों के समर्थक मानों अपने — अपने नेता को ही ईश्वर मान बैठे थे।

चुनाव प्रचार के दौरान दोनों ओर से एक दूसरे के विरूद्ध जमकर आरोप प्रत्यारोप लगे जिनमें भाषायी मर्यादाएं सैंकड़ों बार  तार — तार हुई।

वाद — विवाद झगड़े व झगड़े बड़ी लड़ाईयों में बदल गये जिसने दंगों का रूप ले लिया। नेताओं के भाषणों ने इसमें आग में घी का काम किया। दोनों पार्टियों के कई समर्थक दंगों की भेंट चढ़ गये। मतदान के दिन भी भारी झड़पें हुई जिसमें दर्जनों लोग मारे गये। मारे गये लोगों में दोनों पक्षो के लोग शामिल थे। भारी सुरक्षा में मतदान सम्पन्न करवाया गया।

चंद दिनों में ही चुनावों के परिणाम घोषित किये गये। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। दोनों विरोधी पार्टियों ने एक दूसरे को समर्थन देकर मिली जुली सरकार बना ली। विचारधाराओं के शवों पर नयी सरकार का गठन हो गया। चुनावों के दौरान मारे गये लोगों के लिए मुआवजे की घोषणा कर दी गर्यी प्रदेश में अब पूरी तरह से शान्ति है।

Tuesday, 3 January 2023

चारधाम यात्रा भाग 5

 बद्रीविशाल के दर्शन

सोनप्रयाग में रात्रि विश्राम के दूसरे दिन हमने अन्तिम पड़ाव अर्थात बद्रीविशाल के दर्शनार्थ प्रस्थान किया।  बद्रीविशाल धाम केदारनाथ से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर है।  रास्ते में हमने गुप्तकाशी में महादेव के दर्शन किये। मान्यता है कि पाण्डव भ्रातृहन्ता के पाप से मुक्त होने के लिये महादेव दर्शनों के लिये आये थे परन्तु महादेव उनसे रूष्ट थे एवं दर्शन देना नहीं चाहते थे और इसी स्थान पर अदृश्य अर्थात गुप्त हो गये थे उसी कारण इस स्थान का नाम गुप्तकाशी पड़ा। देखा जाए तो सम्पूर्ण चारधाम यात्रा में सर्वत्र पाण्डवों का इतिहास बिखरा पड़ा है। मुख्य मन्दिर के समक्ष एक कुण्ड में दो जलधाराएं बहती है जिन्हें गंगा व यमुना कहा जाता है। उस जल से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

गुप्तकाशी से निकलने के पश्चात् हम उखीमठ रूके। सर्दियों में जब केदारनाथ धाम के कपाट बन्द हो जाते हैं तो महादेव की उत्सव डोली को उखीमठ लाया जाता है और शीत काल में बाबा केदारनाथ की पूजा उखीमठ में ही होती है। उखी मठ का भी अपना इतिहास है। इसी स्थान पर बाणासुर की बेटी उषा का विवाह भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध से हुआ था। उषा के नाम पर इस स्थान का नाम उषा मठ पड़ा जिसे वर्तमान में उखीमठ के नाम से जानते हैं। राजा मान्धाता ने भी इसी स्थान पर भगवान शिव की तपस्या की थी।

उखीमठ में महादेव के दर्शनोपरान्त पुनः बद्रीविशाल की ओर प्रस्थान किया । केदारनाथ से बद्रीनाथ का मार्ग दूसरे मार्गों की अपेक्षा थोड़ा ठीक था सो शाम तक हम भगवान बद्रीविशाल की पावन धरा पर पहुंच गये।  मन्दिर से थोड़ी दूरी पर स्थित धर्मशाला में सभी यात्रियों के लिए कमरे बुक किये। यात्रा की थकान उतारने के पश्चात् हम मन्दिर की ओर चल दिये। धर्मशाला से मन्दिर की दूरी लगभग 500 मीटर है। मन्दिर के सामने बह रही अलकनन्दा का वेग अपने चरम पर था। अलकनन्दा पर बने पुल को पार कर हम मुख्य मन्दिर पहुंचे। 

यहां यह बताना चाहूंगा कि बद्रीविशाल भगवान विष्णु का मन्दिर है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने नर -नारायण का अवतार लिया और बाल रूप लेकर क्रन्दन करने लगे । उनको क्रन्दन करते देख माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होने बालक को मनाने का प्रयास किया तो भगवान विष्णु ने तपस्या के लिये इस स्थान को मांग लिया। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु जब तपस्या में लीन थे उस समय भारी हिमपात होने लगा और तपस्यारत भगवान विष्णु हिम में डूब गये तब माता लक्ष्मी ने बड़ (बदरी) के वृक्ष का रूप लेकर प्रभु पर छाया की। जब भगवान विष्णु की तपस्या पूर्ण हुई तो उन्होंने माता लक्ष्मी को हिम से आच्छादित पाया। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा कि ‘‘तुमने भी मेरे साथ ही तपस्या की है इसलिये आज से यह स्थान मेरे साथ तुम्हारे नाम से भी जाना जाएगा। तब से यह स्थान बदरी के नाथ अर्थात बद्रीनाथ के नाम से जाना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार पाण्डवों ने अपने पित्तरों का पिण्डदान इसी स्थान पर किया था।

मन्दिर के मुख्य द्वार से पहले एक तत्पकुण्ड है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगा रहे हैं। मन्दिर की भव्यता अत्यन्त दर्शनीय है। परिसर के मध्य में मुख्य मन्दिर स्थित है एवं चारों तरफ माता लक्ष्मी, हनुमानजी एवं अन्य देवी - देवताअें के मन्दिर बने हुए हैं। परिसर में फोटोग्राफी एवं विडियोग्राफी पूर्णतया वर्जित है। सभी यात्रियों ने सर्वप्रथम मुख्य मन्दिर में भगवान नर नारायण के दर्शन किये तत्पश्चात् अन्य मन्दिरों के दर्शन किये। मन्दिर परिसर में ही एक ओर कीर्तन मण्डली बैठी है जिसकी मधुर धुन श्रद्धालुओं को बरबस अपनी ओर खींच लेती है। हम भी स्वयं को वहां जाने से नहीं रोक पाए। कीर्तन में डूबे भक्त भगवान बद्रीविशाल की भक्ति में बेसुध हुए जा रहे थे। कोई नाच रहा था तो को ध्यानस्थ मुद्रा में बैठा था। भक्ति के उस सरोवर में हर कोई डूब जाना चाहता था। इतने में आरती का समय भी हो चला था। सभी ने भगवाद बद्रीविशाल की आरती के दर्शन किये और मन्दिर से प्रस्थान किया। रात्रि विश्राम बद्रीनाथ में ही रहा। प्रातः सभी भक्तों ने पुनः भगवान बद्रीविशाल के दर्शन किये। महादेव की कृपा से चारधाम यात्रा का अन्तिम पड़ाव भी हमने सफलतापूर्वक निर्विघ्न पार कर लिया था।

बद्रीनाथ के निकट ही माना गांव है जो भारतीय सीमा का अन्तिम गांव है। सभी यात्रियों ने माना चलने का निश्चय किया। माना का इतिहास भी पाण्डवों के इर्द गिर्द ही घूमता है। यहां हिन्दुस्तान की अन्तिम दुकान के नाम से कई दुकानें है। सम्भवतया किसी एक दुकान ने यह नाम रखा होगा बाद में उसके देखा देखी उसी नाम से कई होटलें और खुल गई। यदि भारत की अन्तिम दुकान तक आएं और चाय ना पी जाए ऐसा कैसे हो सकता है। यात्रियों ने अपनी स्वेच्छानुसार चाय-कॉफी का स्वाद लिया। निकट ही भीम पुल के दर्शन भी किये। कहा जाता है कि स्वर्गारोहण के समय सरस्वती नदी का वेग अधिक था। तब महाबली भीम ने एक विशाल शिला उठाकर नदी पर रख दी जिससे पाण्डवों ने नदी सहज पार कर ली। उस स्थान को भीम पुल के नाम से जाना जाता है। इसी मार्ग पर आगे वह स्थान है जहां से पाण्डवों ने  स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था। उस स्थान को ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ के नाम से जाना जाता है कहा जाता है कि वहां आज भी सीढ़ीयां मौजूद है। 

माना भ्रमण के पश्चात् हमने हरिद्वार की ओर प्रस्थान किया। बद्रीनाथ से हरिद्वार की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है।  हरिद्वार से लगभग 90 किलोमीटर पहले देवप्रयाग में हमने रात्रि विश्राम किया। देवप्रयाग में विश्राम के पश्चात् सुबह जल्दी हरिद्वार के लिये निकल गये। लगभग 10 बजे तक हम हरिद्वार पहुंच चुके थे। हरिद्वार में सभी यात्रियों ने एक बार पुनः मां गंगा में डुबकी लगाई। यात्रा का प्रारम्भ भी हमने मां गंगा का आशीर्वाद लेकर ही किया था तो यात्रा के निर्विघ्न समापन पर माता को आभार प्रकट करना ही था। दोपहर तीन बजे की बस के टिकट हमने बुक कर रखे थे। कुछ प्रवासी साथी हरिद्वार से ही अपने - अपने गन्तव्य को निकल गये। 

अब सभी को अपने घर पहुंचने की जल्दी थी। लगभग चार बजे हमने हरिद्वार से प्रस्थान किया। तीर्थराज के दर्शन बिना तीर्थयात्रा सम्पूर्ण हो ही नही सकती। प्रातः 5 बजे सभी यात्री पुष्कर पहुुंचे। सरोवर के घाट पर पहुंचकर डुबकी लगाई। तत्पश्चात् ब्रह्मा मन्दिर में जगतपिता ब्रह्माजी के दर्शन किये। लगभग तेरह दिनों की यात्रा अब अपनी पूर्णता की ओर थी। दस बजे तक सभी निमाज पहुंच गये। सर्वप्रथम रामद्वारा पहुंचकर शीश नवाया। सहयात्रियों से मिले विदा ली और अपने - अपने घरों की ओर प्रस्थान किया।

चारधाम यात्रा भाग 4

बाबा केदार के दर्शन


मां गंगा के दर्शनों के पश्चात् अब हमें उनके दर्शन करने थे जिन्होंने स्वर्ग से उतरती गंगा के प्रबल वेग को अपनी जटाओं में सहज ही धारण कर लिया था। जिनके शीश पर विराजमान होकर माँ गंगा भी कृतार्थ हो गयी थी। जो स्वयं विराट स्वरूप धारण कर देवभूमि में विराजित हैं। विशाल पर्वत और कुछ नहीं बल्कि उन्हीं का शरीर है और उस पर उगे लम्बे वृक्ष उन्हीं की रोमावली। विशाल गगन ही जिनका भाल है और दिखाएं ही जिनकी भुजाएं। जो आदि है, जो अनन्त हैं, सम्पूर्ण सृष्टि जिनके सम्मोहन में है, अर्थात् महादेव।


अब उन्हीं देवाधिदेव महादेव बाबा केदारनाथ के दर्शनार्थ हमने प्रस्थान किया। दर्शनों की उत्कंठा जितनी प्रबल थी रास्ता उतना ही दूर। गंगोत्री से केदारनाथ धाम की दूरी लगभग तीन सौ किलोमीटर से अधिक है जो इन पहाड़ी रास्तों पर एक दिन में सम्भव नहीं है। गंगोत्री से रवाना होते - होते 9 बज चुके थे, रास्ता भी लम्बा था। घाटियों के घुमावदार रास्तों पर यात्रियों को चक्कर व उल्टी आने की समस्या सामान्य थी ऐसे में रास्ते में रूकना भी पड़ता। चवाड़ गांव तक पहुंचते - पहुंचते हमें सन्ध्या हो चुकी थी। रात्रि की कालिमा भी अब पहाड़ियों को निगलने को आतुर थी। हमने भी अपना पड़ाव वहीं डाल दिया। भोजन से पहले सन्तों के सानिध्य में कीर्तन का दौर चला।  भोजन से निवृत होते - होते रात घिर चुकी थी। रात्रि की कालिमा घाटी को निगल चुकी थी और नीन्द हमें निगलने की तैयारी में थी।


रात भर के विश्राम के पश्चात् सूर्यदेव  अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़े और हम अपने लक्ष्य की ओर। घाटी में आज भी खेती परम्परागत तरीके से ही बैलों द्वारा होती है। रास्ते में विश्राम के दौरान एक किसान से इस बारे में बात करने पर उसने बताया कि वे लोग आज भी खेती के लिये पुराना तरीका ही अपनाते हैं। बैलों से खेती और गोबर का खाद काम में लेते हैं। पहाड़ों में भूमि कम होने के कारण बेचने लायक फसल नहीं हो पाती लेकिन घर चलने लायक हो जाती हैं। वैसे भी घाटी में कृषि एवं पर्यटन के सिवाय तीसरा रोजगार नहीं है। यहां के अधिकांश युवा सेना में है। इसी तरह विश्राम करते - करते, घाटी के मनोरम दृश्यों का आनन्द उठाते - उठाते शाम तक सोनप्रयाग पहुंच गये। घाटियों में जगह - जगह बिखरे वाहनों के मलबे 2013 में आई त्रासदी साक्षी दे रहे थे। गाड़ियों की अनुमति भी सोनप्रयाग तक ही है इसलिये हमने भी अपना डेरा सोनप्रयाग में ही डाल लिया। रात्रि विश्राम सोनप्रयाग में ही किया।


सुबह जल्दी दैनिक कार्यों से निवृत होकर सभी भक्त यात्रा के लिये निकल पड़े। केदार नाथ धाम की पैदल यात्रा गौरी कुण्ड से शुरू होती है। सोनप्रयाग से गौरीकुण्ड तक पांच किलोमीटर की यात्रा स्थानीय टेक्सियों से करनी पड़ती है। हम भी अपनी- अपनी बसों  के माध्यम से टेक्सी स्टैण्ड तक पहुंचे। वहां से टेक्सियों में सवार होकर गौरीकुण्ड पहुंचे। गौरीकुण्ड से केदारनाथ धाम का पैदल पथ 16 किलोमीटर का है जो अच्छानुसार खच्चर, पालकी या पैदल तय किया जा सकता है। कुछ यात्री घोड़ों से निकले, अधिकांश यात्रियों ने पैदल ही चढ़ने का निश्चय किया। गौरीकुण्ड में भी तप्त कुण्ड है। यात्रा प्रारम्भ से पूर्व यात्रियों ने कुण्ड में स्नान किया और यात्रा प्रारम्भ की। गौरीकुण्ड की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 1950 मीटर है तो वहीं केदारनाथ लगभग 3600 मीटर की उंचाई पर है अर्थात हमें 16 किलोमीटर में लगभग 1700 मीटर की चढ़ाई करनी थी।


कांधों पर बैग और हाथों में लकड़ी थामे हमने चढ़ाई शुरू कर दी। यह पैदल यात्रा यमुनोत्री की अपेक्षा तीन गुना से भी अधिक थी किन्तु महादेव के दर्शनों हेतु जा रहे थे और महादेव के भरोसे ही जा रहे थे तो तो शक्ति भी महादेव को ही देनी थी। पूरे रास्ते महादेव के जयकारे लगाते और विश्राम करते व एक दूसरे का उत्साहवर्धन करते हुए  लगभग दस घंटों की कठिन व दुष्कर यात्रा पूर्ण कर हम बाबा के निकट पहुंच गये। दूर से दिखाई देरहे श्वेत हिम चादर ओढ़े पर्वत मानों अपनी भुजाएं फैला कर हमारा स्वागत कर रहे थे। ज्यों ज्यों निकट जाते त्यों - त्यों मन की उत्कंठा बढ़ती जाती। यदि सम्भव होता तो उड़ कर पहुंच जाते।


खच्चरों के स्टेण्ड से मन्दिर परिसर लगभग आधा किलोमीटर दूर है। दर्शनों की उत्कंठा यात्रा की थकान पर हावी थी। अब और प्रतीक्षा न होती थी। मन्दिर परिसर की सीढ़ियों पर चढ़ते - चढ़ते सर्वप्रथम मन्दिर शिखर के दर्शन हुए। ज्यों - ज्यों आगे बढ़ते, त्यों - त्यों मन्दिर अपने पूर्ण स्वरूप में आ रहा था। मन्दिर के दर्शनमात्र से ही मानो यात्रा की थकान जाती रही। मन्दिर के पृष्ठ भाग में सूर्य की किरणों से चमकते हिमशिखर मन्दिर की आभा को और दिव्य बना रहे थे। मन्दिर परिसर में सब कुछ दिव्य था जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। शब्द उसे अपनी सीमाओं में बांध ही नहीं सकते। महादेव के दर्शन कर भक्त पागल हुए जा रहे थे। हम भी उन्हीं पागलों में से थे। मन्दिर के चारों ओर विशाल परिसर है जिसमें साधु बैठे हैं। स्थान — स्थान पर समूहों में भक्त भोले की भक्ति में नाच रहे हैं। सभी यात्रियों ने सर्वप्रथम  बाबा के दर्शन किये। मन्दिर में भगवान कृष्ण, पांचों पाण्डव, माता कुन्ती एवं माता द्रौपदी की मूर्तियां स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना पाण्डवों द्वारा की गयी थी।


बाबा के दर्शनों के पश्चात् हमने उस चमत्कारिक शिला के दर्शन किये जो त्रासदी के समय लुढक कर मन्दिर के पीछे  आ गयी थी। उसी शिला के कारण जल की धारा दो भागों में बंट गयी और मन्दिर परिसर को तनिक भी क्षति नहीं हुई। उस शिला को अब ‘भीम शिला’ के नाम से जाना जाता है। शिला की ऊँचाई लगभग नौ फिट से अधिक ही होगी और चौड़ाई लगभग मन्दिर के बराबर। हजारों टन वजनी उस शिला का पूरे वेग से लुढ़क कर आना और मन्दिर से कुछ दूरी पर ही रूक जाना यह हमारे लिए चमत्कार हो सकता है लेकिन महादेव के लिए नही। शिला के दर्शनों के पश्चात् मन्दिर परिसर में बैठे साधुओं से अपने माथों पर तिलक बनवाए। सभी ने फोन पर स्वजनों को मन्दिर व शिला के दिव्य दर्शन करवाए।  सभी यात्रि उन पावन पलों को अपने मोबाईल के कैमरों में सहेजने में लग गये। अब तक आरती का समय भी हो चला था। श्रद्धालुओं की भीड़ मन्दिर के द्वार पर आ जमी। कुछ ही क्षणों में बाबा की भव्य आरती प्रारम्भ हुई। आरती की ध्वनि वातावरण को और भी दिव्य बना रही थी। हम भी इस आरती के साक्षी बनकर स्वयं केा धन्य समझ रहे थे। सब कुछ अद्भुत था, अवर्णनीय था। मन्दिर के दर्शनों के पश्चात् रात्रि विश्राम केदारनाथ में ही रहा। सुबह नहा धोकर सभी यात्री मन्दिर परिसर में पहुंचे। अभिषेक हेतु घृत व प्रसाद खरीदे व पंक्ति में लग गये सभी श्रद्धालुओं ने गर्भगृह में स्थापित मूल शिवलिंग पर घृत व गंगाजल से अभिषेक किया। 


बाबा के परिसर में सबकुछ इतना दिव्य था कि छोड़ कर जाने का मन ही नहीं हो रहा था। फिर भी भारी मन से सभी यात्रियों ने प्रस्थान किया। लगभग साढ़े पांच घण्टे की यात्रा के पश्चात् हम गौरीकुण्ड उतर गये। कुछ यात्री देर से पहुंचे थे। आगे की यात्रा सम्भव न थी सो विश्राम सोनप्रयाग में ही किया।

चारधाम यात्रा भाग 3

गंगोत्री यात्रा

चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव हम पार कर चुके थे। आज दुसरे पड़ाव अर्थात गंगोत्री की ओर प्रस्थान था। कल दिन भर नदारद रहे सूर्यदेव आज गगन में मुस्कुरा रहे थे। धूप भी पहाड़ियों से नीचे उतर कर सड़कों पर फैल चुकी थी।  हमने भी गंगोत्री की ओर प्रस्थान कर लिया। पर्वतों में यत्र तत्र सर्वत्र रूई के फाहे बिखरे हुए हैं। झरनों से गिरकर घाटियों में बहता पानी ऊंचाई से देखने पर बिल्कुल सफेद दिखाई देता है, ऐसा लगता है मानो किसी ने पर्वत श्रृंखला में कोई बड़ा दूध का कलश उंडेल दिया हो।

गंगोत्री के रास्ते पर ही हम महरगांव में रूके जहां प्रकटेश्वर महादेव मन्दिर है जिसमें एक गुफा में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है। गुफा में ही एक जलकुण्ड है जिसमें लगातार जल की धारा बहती रहती है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार क्षेत्र में पानी की कमी हो गयी थी। लोग पानी की खोज में इस तरफ आए तो उन्हें जल की धारा बहने की ध्वनि सुनाई दी। जब वे ध्वनि की दिशा में आए तो गुफा में महादेव के पंचमुखी शिवलिंग के दर्शन हुए।

महरगांव में दर्शनोपरान्त पुनः गंगोत्री की ओर प्रस्थान किया। गंगोत्री के रास्ते में ही उत्तरकाशी पड़ता है जो पहाड़ियों की तलहटी में बसा बहुत ही सुन्दर शहर है। शहर के बीच में से बहती गंगा नदी की धारा से इसका सौन्दर्य और निखर जाता है। उत्तरकाशी में काशी विश्वनाथ का भव्य मन्दिर है।

गंगोत्री से थोड़ा पहले हरसिल पहुंचते - पहुंचते पहाड़ियां अंधेरे में डूब चुकी थी। अब आगे की यात्रा सम्भव न थी सो सभी ने रात्रि विश्राम हरसिल में ही करने का निर्णय लिया। लगभग पूरे रास्ते ठहरने की उत्तम व्यवस्था है।

रात्रि विश्राम कर प्रातः लगभग 6 बजे हम हरसिल से गंगोत्री के लिये निकल गये। लगभग आधे घण्टे की यात्रा के पश्चात् हम गंगोत्री पहुंच गये। बसों की पार्किंग मन्दिर से लगभग आधा किलोमीटर पहले है। गंगोत्री की उंचाई भी लगभग यमुनोत्री जितनी ही है। सर्दी यहां भी तेज थी।  यहां राहत की बात यह थी कि पार्किंग से मन्दिर तक का रास्ता सिर्फ आधा किलोमीटर है और वह भी बिल्कुल समतल। रास्ते के दोनों तरफ भोजन की होटलें व अन्य दुकानें सजी है। गंगोत्री ही वह स्थल है जहां राजा भगीरथ ने तपस्या कर माँ गंगा को उतारा था। गँगा का मूल उद्गम स्थल गंगोत्री से भी पन्द्रह किलोमीटर ऊपर गौमुख है जहां सिर्फ पैदल ही जाया जा सकता है। गंगा की मूल तीन धाराएं है गौमुख से निकलने वाली धारा को भागीरथी कहा जाता है। वहीं केदारनाथ से मंदाकिनी तो बद्रीनाथ से अलकनन्दा निकलती है। रूद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी अलकनन्दा में मिल जाती है और देवप्रयाग में अलकनन्दा और भागीरथी का संगम होकर गंगा कहलाती है। तीनों ही नदियां गंगा की ही धाराएं हैं।

गंगोत्री के घाटों से प्रबल वेग से बहती भागीरथी का दृश्य अत्यन्त मनोहर है। सूर्यदेव को बादलों ने ढक रखा था। ठण्ड भी अपने चरम पर थी। घाट पर पहुंच कर सर्वप्रथम माँ गंगा को प्रणाम किया। गंगा का जल बर्फ की तरह ठण्डा था। कुछ अत्यन्त साहसी भक्त बर्फ की तरह ठण्डे पानी में भी डुबकी लगा रहे थे और जो हिम्मत नहीं जुटा पाए उन्होंने सिर्फ हाथ धोकर व आचमन कर इतिश्री कर ली।स्मृतियों को मोबाईल के कैमरों में सहेजने का दौर भी साथ ही चल रहा था। स्नानोपरान्त पण्डितजी ने विधिवत रूप से मां गंगा की पूजा करवाई। घाटों के पास ही वह स्थल है जहां राजा भगीरथ ने तपस्या की थी। एक छोटा मन्दिर भी बना हुआ है जिसमें राजा भगीरथ की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति को शीश नवाकर सभी यात्रियों ने मुख्य मन्दिर में माँ गंगा के दर्शन किये। मन्दिर के निकट ही एक अत्यन्त सुन्दर झांकी बनी हुई है जिसमें महादेव माँ गंगा का आह्वान कर रहे हैं। निकट ही राजा भगीरथ हाथ जोड़ कर खड़े है। ऐसे स्थानों पर नेत्रों का तृप्त हो पाना सम्भव नहीं है। मनोहारी दृश्य नेत्रों की लालसा और बढ़ा देते हैं।

 बिना भोजन किये निकलने के कारण सभी को भूख का अनुभव भी हो रहा था। दर्शनोपरान्त सभी यात्रियों ने गंगोत्री स्थित होटलों में ही  भोजन किया और मॉं गंगा को नमन कर अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े। सूर्यदेव ने भी बादलों की चादर उतार फैंकी थी और वे अब आसमान में मुस्कुरा रहे थे। महादेव की कृपा से दूसरा पड़ाव भी बिना किसी बाधा के पार कर लिया था।