बाबा केदार के दर्शन
मां गंगा के दर्शनों के पश्चात् अब हमें उनके दर्शन करने थे जिन्होंने स्वर्ग से उतरती गंगा के प्रबल वेग को अपनी जटाओं में सहज ही धारण कर लिया था। जिनके शीश पर विराजमान होकर माँ गंगा भी कृतार्थ हो गयी थी। जो स्वयं विराट स्वरूप धारण कर देवभूमि में विराजित हैं। विशाल पर्वत और कुछ नहीं बल्कि उन्हीं का शरीर है और उस पर उगे लम्बे वृक्ष उन्हीं की रोमावली। विशाल गगन ही जिनका भाल है और दिखाएं ही जिनकी भुजाएं। जो आदि है, जो अनन्त हैं, सम्पूर्ण सृष्टि जिनके सम्मोहन में है, अर्थात् महादेव।
अब उन्हीं देवाधिदेव महादेव बाबा केदारनाथ के दर्शनार्थ हमने प्रस्थान किया। दर्शनों की उत्कंठा जितनी प्रबल थी रास्ता उतना ही दूर। गंगोत्री से केदारनाथ धाम की दूरी लगभग तीन सौ किलोमीटर से अधिक है जो इन पहाड़ी रास्तों पर एक दिन में सम्भव नहीं है। गंगोत्री से रवाना होते - होते 9 बज चुके थे, रास्ता भी लम्बा था। घाटियों के घुमावदार रास्तों पर यात्रियों को चक्कर व उल्टी आने की समस्या सामान्य थी ऐसे में रास्ते में रूकना भी पड़ता। चवाड़ गांव तक पहुंचते - पहुंचते हमें सन्ध्या हो चुकी थी। रात्रि की कालिमा भी अब पहाड़ियों को निगलने को आतुर थी। हमने भी अपना पड़ाव वहीं डाल दिया। भोजन से पहले सन्तों के सानिध्य में कीर्तन का दौर चला। भोजन से निवृत होते - होते रात घिर चुकी थी। रात्रि की कालिमा घाटी को निगल चुकी थी और नीन्द हमें निगलने की तैयारी में थी।
रात भर के विश्राम के पश्चात् सूर्यदेव अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़े और हम अपने लक्ष्य की ओर। घाटी में आज भी खेती परम्परागत तरीके से ही बैलों द्वारा होती है। रास्ते में विश्राम के दौरान एक किसान से इस बारे में बात करने पर उसने बताया कि वे लोग आज भी खेती के लिये पुराना तरीका ही अपनाते हैं। बैलों से खेती और गोबर का खाद काम में लेते हैं। पहाड़ों में भूमि कम होने के कारण बेचने लायक फसल नहीं हो पाती लेकिन घर चलने लायक हो जाती हैं। वैसे भी घाटी में कृषि एवं पर्यटन के सिवाय तीसरा रोजगार नहीं है। यहां के अधिकांश युवा सेना में है। इसी तरह विश्राम करते - करते, घाटी के मनोरम दृश्यों का आनन्द उठाते - उठाते शाम तक सोनप्रयाग पहुंच गये। घाटियों में जगह - जगह बिखरे वाहनों के मलबे 2013 में आई त्रासदी साक्षी दे रहे थे। गाड़ियों की अनुमति भी सोनप्रयाग तक ही है इसलिये हमने भी अपना डेरा सोनप्रयाग में ही डाल लिया। रात्रि विश्राम सोनप्रयाग में ही किया।
सुबह जल्दी दैनिक कार्यों से निवृत होकर सभी भक्त यात्रा के लिये निकल पड़े। केदार नाथ धाम की पैदल यात्रा गौरी कुण्ड से शुरू होती है। सोनप्रयाग से गौरीकुण्ड तक पांच किलोमीटर की यात्रा स्थानीय टेक्सियों से करनी पड़ती है। हम भी अपनी- अपनी बसों के माध्यम से टेक्सी स्टैण्ड तक पहुंचे। वहां से टेक्सियों में सवार होकर गौरीकुण्ड पहुंचे। गौरीकुण्ड से केदारनाथ धाम का पैदल पथ 16 किलोमीटर का है जो अच्छानुसार खच्चर, पालकी या पैदल तय किया जा सकता है। कुछ यात्री घोड़ों से निकले, अधिकांश यात्रियों ने पैदल ही चढ़ने का निश्चय किया। गौरीकुण्ड में भी तप्त कुण्ड है। यात्रा प्रारम्भ से पूर्व यात्रियों ने कुण्ड में स्नान किया और यात्रा प्रारम्भ की। गौरीकुण्ड की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 1950 मीटर है तो वहीं केदारनाथ लगभग 3600 मीटर की उंचाई पर है अर्थात हमें 16 किलोमीटर में लगभग 1700 मीटर की चढ़ाई करनी थी।
कांधों पर बैग और हाथों में लकड़ी थामे हमने चढ़ाई शुरू कर दी। यह पैदल यात्रा यमुनोत्री की अपेक्षा तीन गुना से भी अधिक थी किन्तु महादेव के दर्शनों हेतु जा रहे थे और महादेव के भरोसे ही जा रहे थे तो तो शक्ति भी महादेव को ही देनी थी। पूरे रास्ते महादेव के जयकारे लगाते और विश्राम करते व एक दूसरे का उत्साहवर्धन करते हुए लगभग दस घंटों की कठिन व दुष्कर यात्रा पूर्ण कर हम बाबा के निकट पहुंच गये। दूर से दिखाई देरहे श्वेत हिम चादर ओढ़े पर्वत मानों अपनी भुजाएं फैला कर हमारा स्वागत कर रहे थे। ज्यों ज्यों निकट जाते त्यों - त्यों मन की उत्कंठा बढ़ती जाती। यदि सम्भव होता तो उड़ कर पहुंच जाते।
खच्चरों के स्टेण्ड से मन्दिर परिसर लगभग आधा किलोमीटर दूर है। दर्शनों की उत्कंठा यात्रा की थकान पर हावी थी। अब और प्रतीक्षा न होती थी। मन्दिर परिसर की सीढ़ियों पर चढ़ते - चढ़ते सर्वप्रथम मन्दिर शिखर के दर्शन हुए। ज्यों - ज्यों आगे बढ़ते, त्यों - त्यों मन्दिर अपने पूर्ण स्वरूप में आ रहा था। मन्दिर के दर्शनमात्र से ही मानो यात्रा की थकान जाती रही। मन्दिर के पृष्ठ भाग में सूर्य की किरणों से चमकते हिमशिखर मन्दिर की आभा को और दिव्य बना रहे थे। मन्दिर परिसर में सब कुछ दिव्य था जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। शब्द उसे अपनी सीमाओं में बांध ही नहीं सकते। महादेव के दर्शन कर भक्त पागल हुए जा रहे थे। हम भी उन्हीं पागलों में से थे। मन्दिर के चारों ओर विशाल परिसर है जिसमें साधु बैठे हैं। स्थान — स्थान पर समूहों में भक्त भोले की भक्ति में नाच रहे हैं। सभी यात्रियों ने सर्वप्रथम बाबा के दर्शन किये। मन्दिर में भगवान कृष्ण, पांचों पाण्डव, माता कुन्ती एवं माता द्रौपदी की मूर्तियां स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना पाण्डवों द्वारा की गयी थी।
बाबा के दर्शनों के पश्चात् हमने उस चमत्कारिक शिला के दर्शन किये जो त्रासदी के समय लुढक कर मन्दिर के पीछे आ गयी थी। उसी शिला के कारण जल की धारा दो भागों में बंट गयी और मन्दिर परिसर को तनिक भी क्षति नहीं हुई। उस शिला को अब ‘भीम शिला’ के नाम से जाना जाता है। शिला की ऊँचाई लगभग नौ फिट से अधिक ही होगी और चौड़ाई लगभग मन्दिर के बराबर। हजारों टन वजनी उस शिला का पूरे वेग से लुढ़क कर आना और मन्दिर से कुछ दूरी पर ही रूक जाना यह हमारे लिए चमत्कार हो सकता है लेकिन महादेव के लिए नही। शिला के दर्शनों के पश्चात् मन्दिर परिसर में बैठे साधुओं से अपने माथों पर तिलक बनवाए। सभी ने फोन पर स्वजनों को मन्दिर व शिला के दिव्य दर्शन करवाए। सभी यात्रि उन पावन पलों को अपने मोबाईल के कैमरों में सहेजने में लग गये। अब तक आरती का समय भी हो चला था। श्रद्धालुओं की भीड़ मन्दिर के द्वार पर आ जमी। कुछ ही क्षणों में बाबा की भव्य आरती प्रारम्भ हुई। आरती की ध्वनि वातावरण को और भी दिव्य बना रही थी। हम भी इस आरती के साक्षी बनकर स्वयं केा धन्य समझ रहे थे। सब कुछ अद्भुत था, अवर्णनीय था। मन्दिर के दर्शनों के पश्चात् रात्रि विश्राम केदारनाथ में ही रहा। सुबह नहा धोकर सभी यात्री मन्दिर परिसर में पहुंचे। अभिषेक हेतु घृत व प्रसाद खरीदे व पंक्ति में लग गये सभी श्रद्धालुओं ने गर्भगृह में स्थापित मूल शिवलिंग पर घृत व गंगाजल से अभिषेक किया।
बाबा के परिसर में सबकुछ इतना दिव्य था कि छोड़ कर जाने का मन ही नहीं हो रहा था। फिर भी भारी मन से सभी यात्रियों ने प्रस्थान किया। लगभग साढ़े पांच घण्टे की यात्रा के पश्चात् हम गौरीकुण्ड उतर गये। कुछ यात्री देर से पहुंचे थे। आगे की यात्रा सम्भव न थी सो विश्राम सोनप्रयाग में ही किया।