Tuesday, 3 January 2023

चारधाम यात्रा भाग 3

गंगोत्री यात्रा

चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव हम पार कर चुके थे। आज दुसरे पड़ाव अर्थात गंगोत्री की ओर प्रस्थान था। कल दिन भर नदारद रहे सूर्यदेव आज गगन में मुस्कुरा रहे थे। धूप भी पहाड़ियों से नीचे उतर कर सड़कों पर फैल चुकी थी।  हमने भी गंगोत्री की ओर प्रस्थान कर लिया। पर्वतों में यत्र तत्र सर्वत्र रूई के फाहे बिखरे हुए हैं। झरनों से गिरकर घाटियों में बहता पानी ऊंचाई से देखने पर बिल्कुल सफेद दिखाई देता है, ऐसा लगता है मानो किसी ने पर्वत श्रृंखला में कोई बड़ा दूध का कलश उंडेल दिया हो।

गंगोत्री के रास्ते पर ही हम महरगांव में रूके जहां प्रकटेश्वर महादेव मन्दिर है जिसमें एक गुफा में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है। गुफा में ही एक जलकुण्ड है जिसमें लगातार जल की धारा बहती रहती है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार क्षेत्र में पानी की कमी हो गयी थी। लोग पानी की खोज में इस तरफ आए तो उन्हें जल की धारा बहने की ध्वनि सुनाई दी। जब वे ध्वनि की दिशा में आए तो गुफा में महादेव के पंचमुखी शिवलिंग के दर्शन हुए।

महरगांव में दर्शनोपरान्त पुनः गंगोत्री की ओर प्रस्थान किया। गंगोत्री के रास्ते में ही उत्तरकाशी पड़ता है जो पहाड़ियों की तलहटी में बसा बहुत ही सुन्दर शहर है। शहर के बीच में से बहती गंगा नदी की धारा से इसका सौन्दर्य और निखर जाता है। उत्तरकाशी में काशी विश्वनाथ का भव्य मन्दिर है।

गंगोत्री से थोड़ा पहले हरसिल पहुंचते - पहुंचते पहाड़ियां अंधेरे में डूब चुकी थी। अब आगे की यात्रा सम्भव न थी सो सभी ने रात्रि विश्राम हरसिल में ही करने का निर्णय लिया। लगभग पूरे रास्ते ठहरने की उत्तम व्यवस्था है।

रात्रि विश्राम कर प्रातः लगभग 6 बजे हम हरसिल से गंगोत्री के लिये निकल गये। लगभग आधे घण्टे की यात्रा के पश्चात् हम गंगोत्री पहुंच गये। बसों की पार्किंग मन्दिर से लगभग आधा किलोमीटर पहले है। गंगोत्री की उंचाई भी लगभग यमुनोत्री जितनी ही है। सर्दी यहां भी तेज थी।  यहां राहत की बात यह थी कि पार्किंग से मन्दिर तक का रास्ता सिर्फ आधा किलोमीटर है और वह भी बिल्कुल समतल। रास्ते के दोनों तरफ भोजन की होटलें व अन्य दुकानें सजी है। गंगोत्री ही वह स्थल है जहां राजा भगीरथ ने तपस्या कर माँ गंगा को उतारा था। गँगा का मूल उद्गम स्थल गंगोत्री से भी पन्द्रह किलोमीटर ऊपर गौमुख है जहां सिर्फ पैदल ही जाया जा सकता है। गंगा की मूल तीन धाराएं है गौमुख से निकलने वाली धारा को भागीरथी कहा जाता है। वहीं केदारनाथ से मंदाकिनी तो बद्रीनाथ से अलकनन्दा निकलती है। रूद्रप्रयाग में मंदाकिनी नदी अलकनन्दा में मिल जाती है और देवप्रयाग में अलकनन्दा और भागीरथी का संगम होकर गंगा कहलाती है। तीनों ही नदियां गंगा की ही धाराएं हैं।

गंगोत्री के घाटों से प्रबल वेग से बहती भागीरथी का दृश्य अत्यन्त मनोहर है। सूर्यदेव को बादलों ने ढक रखा था। ठण्ड भी अपने चरम पर थी। घाट पर पहुंच कर सर्वप्रथम माँ गंगा को प्रणाम किया। गंगा का जल बर्फ की तरह ठण्डा था। कुछ अत्यन्त साहसी भक्त बर्फ की तरह ठण्डे पानी में भी डुबकी लगा रहे थे और जो हिम्मत नहीं जुटा पाए उन्होंने सिर्फ हाथ धोकर व आचमन कर इतिश्री कर ली।स्मृतियों को मोबाईल के कैमरों में सहेजने का दौर भी साथ ही चल रहा था। स्नानोपरान्त पण्डितजी ने विधिवत रूप से मां गंगा की पूजा करवाई। घाटों के पास ही वह स्थल है जहां राजा भगीरथ ने तपस्या की थी। एक छोटा मन्दिर भी बना हुआ है जिसमें राजा भगीरथ की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति को शीश नवाकर सभी यात्रियों ने मुख्य मन्दिर में माँ गंगा के दर्शन किये। मन्दिर के निकट ही एक अत्यन्त सुन्दर झांकी बनी हुई है जिसमें महादेव माँ गंगा का आह्वान कर रहे हैं। निकट ही राजा भगीरथ हाथ जोड़ कर खड़े है। ऐसे स्थानों पर नेत्रों का तृप्त हो पाना सम्भव नहीं है। मनोहारी दृश्य नेत्रों की लालसा और बढ़ा देते हैं।

 बिना भोजन किये निकलने के कारण सभी को भूख का अनुभव भी हो रहा था। दर्शनोपरान्त सभी यात्रियों ने गंगोत्री स्थित होटलों में ही  भोजन किया और मॉं गंगा को नमन कर अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े। सूर्यदेव ने भी बादलों की चादर उतार फैंकी थी और वे अब आसमान में मुस्कुरा रहे थे। महादेव की कृपा से दूसरा पड़ाव भी बिना किसी बाधा के पार कर लिया था।


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