बद्रीविशाल के दर्शन
सोनप्रयाग में रात्रि विश्राम के दूसरे दिन हमने अन्तिम पड़ाव अर्थात बद्रीविशाल के दर्शनार्थ प्रस्थान किया। बद्रीविशाल धाम केदारनाथ से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ते में हमने गुप्तकाशी में महादेव के दर्शन किये। मान्यता है कि पाण्डव भ्रातृहन्ता के पाप से मुक्त होने के लिये महादेव दर्शनों के लिये आये थे परन्तु महादेव उनसे रूष्ट थे एवं दर्शन देना नहीं चाहते थे और इसी स्थान पर अदृश्य अर्थात गुप्त हो गये थे उसी कारण इस स्थान का नाम गुप्तकाशी पड़ा। देखा जाए तो सम्पूर्ण चारधाम यात्रा में सर्वत्र पाण्डवों का इतिहास बिखरा पड़ा है। मुख्य मन्दिर के समक्ष एक कुण्ड में दो जलधाराएं बहती है जिन्हें गंगा व यमुना कहा जाता है। उस जल से महादेव का अभिषेक किया जाता है।
गुप्तकाशी से निकलने के पश्चात् हम उखीमठ रूके। सर्दियों में जब केदारनाथ धाम के कपाट बन्द हो जाते हैं तो महादेव की उत्सव डोली को उखीमठ लाया जाता है और शीत काल में बाबा केदारनाथ की पूजा उखीमठ में ही होती है। उखी मठ का भी अपना इतिहास है। इसी स्थान पर बाणासुर की बेटी उषा का विवाह भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध से हुआ था। उषा के नाम पर इस स्थान का नाम उषा मठ पड़ा जिसे वर्तमान में उखीमठ के नाम से जानते हैं। राजा मान्धाता ने भी इसी स्थान पर भगवान शिव की तपस्या की थी।
उखीमठ में महादेव के दर्शनोपरान्त पुनः बद्रीविशाल की ओर प्रस्थान किया । केदारनाथ से बद्रीनाथ का मार्ग दूसरे मार्गों की अपेक्षा थोड़ा ठीक था सो शाम तक हम भगवान बद्रीविशाल की पावन धरा पर पहुंच गये। मन्दिर से थोड़ी दूरी पर स्थित धर्मशाला में सभी यात्रियों के लिए कमरे बुक किये। यात्रा की थकान उतारने के पश्चात् हम मन्दिर की ओर चल दिये। धर्मशाला से मन्दिर की दूरी लगभग 500 मीटर है। मन्दिर के सामने बह रही अलकनन्दा का वेग अपने चरम पर था। अलकनन्दा पर बने पुल को पार कर हम मुख्य मन्दिर पहुंचे।
यहां यह बताना चाहूंगा कि बद्रीविशाल भगवान विष्णु का मन्दिर है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने नर -नारायण का अवतार लिया और बाल रूप लेकर क्रन्दन करने लगे । उनको क्रन्दन करते देख माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होने बालक को मनाने का प्रयास किया तो भगवान विष्णु ने तपस्या के लिये इस स्थान को मांग लिया। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु जब तपस्या में लीन थे उस समय भारी हिमपात होने लगा और तपस्यारत भगवान विष्णु हिम में डूब गये तब माता लक्ष्मी ने बड़ (बदरी) के वृक्ष का रूप लेकर प्रभु पर छाया की। जब भगवान विष्णु की तपस्या पूर्ण हुई तो उन्होंने माता लक्ष्मी को हिम से आच्छादित पाया। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा कि ‘‘तुमने भी मेरे साथ ही तपस्या की है इसलिये आज से यह स्थान मेरे साथ तुम्हारे नाम से भी जाना जाएगा। तब से यह स्थान बदरी के नाथ अर्थात बद्रीनाथ के नाम से जाना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार पाण्डवों ने अपने पित्तरों का पिण्डदान इसी स्थान पर किया था।
मन्दिर के मुख्य द्वार से पहले एक तत्पकुण्ड है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगा रहे हैं। मन्दिर की भव्यता अत्यन्त दर्शनीय है। परिसर के मध्य में मुख्य मन्दिर स्थित है एवं चारों तरफ माता लक्ष्मी, हनुमानजी एवं अन्य देवी - देवताअें के मन्दिर बने हुए हैं। परिसर में फोटोग्राफी एवं विडियोग्राफी पूर्णतया वर्जित है। सभी यात्रियों ने सर्वप्रथम मुख्य मन्दिर में भगवान नर नारायण के दर्शन किये तत्पश्चात् अन्य मन्दिरों के दर्शन किये। मन्दिर परिसर में ही एक ओर कीर्तन मण्डली बैठी है जिसकी मधुर धुन श्रद्धालुओं को बरबस अपनी ओर खींच लेती है। हम भी स्वयं को वहां जाने से नहीं रोक पाए। कीर्तन में डूबे भक्त भगवान बद्रीविशाल की भक्ति में बेसुध हुए जा रहे थे। कोई नाच रहा था तो को ध्यानस्थ मुद्रा में बैठा था। भक्ति के उस सरोवर में हर कोई डूब जाना चाहता था। इतने में आरती का समय भी हो चला था। सभी ने भगवाद बद्रीविशाल की आरती के दर्शन किये और मन्दिर से प्रस्थान किया। रात्रि विश्राम बद्रीनाथ में ही रहा। प्रातः सभी भक्तों ने पुनः भगवान बद्रीविशाल के दर्शन किये। महादेव की कृपा से चारधाम यात्रा का अन्तिम पड़ाव भी हमने सफलतापूर्वक निर्विघ्न पार कर लिया था।
बद्रीनाथ के निकट ही माना गांव है जो भारतीय सीमा का अन्तिम गांव है। सभी यात्रियों ने माना चलने का निश्चय किया। माना का इतिहास भी पाण्डवों के इर्द गिर्द ही घूमता है। यहां हिन्दुस्तान की अन्तिम दुकान के नाम से कई दुकानें है। सम्भवतया किसी एक दुकान ने यह नाम रखा होगा बाद में उसके देखा देखी उसी नाम से कई होटलें और खुल गई। यदि भारत की अन्तिम दुकान तक आएं और चाय ना पी जाए ऐसा कैसे हो सकता है। यात्रियों ने अपनी स्वेच्छानुसार चाय-कॉफी का स्वाद लिया। निकट ही भीम पुल के दर्शन भी किये। कहा जाता है कि स्वर्गारोहण के समय सरस्वती नदी का वेग अधिक था। तब महाबली भीम ने एक विशाल शिला उठाकर नदी पर रख दी जिससे पाण्डवों ने नदी सहज पार कर ली। उस स्थान को भीम पुल के नाम से जाना जाता है। इसी मार्ग पर आगे वह स्थान है जहां से पाण्डवों ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था। उस स्थान को ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ के नाम से जाना जाता है कहा जाता है कि वहां आज भी सीढ़ीयां मौजूद है।
माना भ्रमण के पश्चात् हमने हरिद्वार की ओर प्रस्थान किया। बद्रीनाथ से हरिद्वार की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है। हरिद्वार से लगभग 90 किलोमीटर पहले देवप्रयाग में हमने रात्रि विश्राम किया। देवप्रयाग में विश्राम के पश्चात् सुबह जल्दी हरिद्वार के लिये निकल गये। लगभग 10 बजे तक हम हरिद्वार पहुंच चुके थे। हरिद्वार में सभी यात्रियों ने एक बार पुनः मां गंगा में डुबकी लगाई। यात्रा का प्रारम्भ भी हमने मां गंगा का आशीर्वाद लेकर ही किया था तो यात्रा के निर्विघ्न समापन पर माता को आभार प्रकट करना ही था। दोपहर तीन बजे की बस के टिकट हमने बुक कर रखे थे। कुछ प्रवासी साथी हरिद्वार से ही अपने - अपने गन्तव्य को निकल गये।
अब सभी को अपने घर पहुंचने की जल्दी थी। लगभग चार बजे हमने हरिद्वार से प्रस्थान किया। तीर्थराज के दर्शन बिना तीर्थयात्रा सम्पूर्ण हो ही नही सकती। प्रातः 5 बजे सभी यात्री पुष्कर पहुुंचे। सरोवर के घाट पर पहुंचकर डुबकी लगाई। तत्पश्चात् ब्रह्मा मन्दिर में जगतपिता ब्रह्माजी के दर्शन किये। लगभग तेरह दिनों की यात्रा अब अपनी पूर्णता की ओर थी। दस बजे तक सभी निमाज पहुंच गये। सर्वप्रथम रामद्वारा पहुंचकर शीश नवाया। सहयात्रियों से मिले विदा ली और अपने - अपने घरों की ओर प्रस्थान किया।