कल तक जो दामिनी की खातिर शमा जलाए बैठे थे
वो आज कामिनी की बाहों में होश गंवाए बैठे हैं
क्या हुआ उन अंगारांें का जो सीने में धधका करते थे
वे अंगारे अब ठण्डे होकर क्यूं कोयले बन बैठे हैं
कल तक जो चैराहों पर बेबाक बोला करते थे
आज वे ही अपने होठों पर ताले लगाए बैठे हैं
ए दामिनी तेरा कसूर नहीं, कसूर सिर्फ हमारा है
हम भी जाने किन बुजदिलों से आस लगाए बैठे हैं
पवन प्रजापति ‘पथिक’
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