Friday, 25 January 2013

चल मुसाफिर चल

चल मुसाफिर चल तेरा सफर हुआ अब पूरा कोई स्वप्न रहा ना अधूरा नहीं दूर अब मंजिल तेरी साँस बंधी जिस डोर वो डोर हुई कमजोर अब रहना ना इक भी पल चल मुसाफिर चल हो पिता पुत्र या भाई ना साथ चलेगा कोई ना आज चले ना कल चल मुसाफिर चल ये जीवन तो है इक डेरा अब दूर देश है बसेरा वो बुला रहा तुझे चल चल मुसाफिर चल बहुत चल चुका अब रूक तू अब चुका है थक अब थकान मिटाले चल चल मुसाफिर चल पवन प्रजापति ‘पथिक’

No comments:

Post a Comment