ये कविता एक ऐसे बच्चे के लिए लिखी गई है जो ना
हंस संकता है न बोल सकता है ना बैठ सकता है,
ना उठ सकता है ना चल सकता है ना खा पाता है
जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ
वो अपनी लाचारी अपनी माँ को किन शब्दों में बयां करेगा
वा शब्द मैंने देने की कोशिश की है,
यदि आपके दिल पर चोट करे तो कमेन्ट करें
माँ मेरी कमजोर नहीं पर
हालत से मजबूर हूँ मैं
तुमको क्या मालूम कि दिल से
कितना दुःखी लाचार हूँ मैंु
यूँ पैरो ंपे सबको चलते
देख दुःखी हो जाता हूँ
तेरी अंगुली पकड़ के माँ
क्यूं मैं चल नहीं पाता हूँ
तू मुझे देख मुस्काती है
पर दिल में दर्द छुपाती है
जब मैं मुस्कुरा ना पाता हूँ
तू फिर से दुःखी हो जाती है
माँ मैं तेरी आँखों में देख
तुमसे बतियाना चाहता हूँ
तुम मुझे ढूँढो और मैं
किसी काने में छिप जाना चाहता हूँ
माँ तेरे आँचल की छाया
मैं तो भूला ना पाऊँगा
लेकिन अफसोस की दुःख के सिवा
मैं तुम्हे कुछ दे ना पाऊँगा
काश कि मैं कुछ कह पाता
दुःख अपना तुम्हें बता देता
या फिर बस तो होता तो
ईशारों से ही समझा देता
माँ भैया के अरमानों को
मैं पूरा ना कर पाऊँगा
और उसकी अँगुली पकड़ के कभी
स्कूल नहीं जा पाऊँगा
उम्मीद थी तुमको सुख की मगर
मैं तुम्हे दुःखी कर बैठा माँ
देनी तो थी खुशियां मगर
मैं तुम्हे तकलीफ दे बैठा माँ
अब और तकलीफ न दूँगा माँ
अब तुमसे विदा ले जाऊँगा
लेकिन वादा है जगले जनम
मैं लौट के जल्दी आऊँगा
पवन प्रजापति ‘पथिक’
हंस संकता है न बोल सकता है ना बैठ सकता है,
ना उठ सकता है ना चल सकता है ना खा पाता है
जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ
वो अपनी लाचारी अपनी माँ को किन शब्दों में बयां करेगा
वा शब्द मैंने देने की कोशिश की है,
यदि आपके दिल पर चोट करे तो कमेन्ट करें
माँ मेरी कमजोर नहीं पर
हालत से मजबूर हूँ मैं
तुमको क्या मालूम कि दिल से
कितना दुःखी लाचार हूँ मैंु
यूँ पैरो ंपे सबको चलते
देख दुःखी हो जाता हूँ
तेरी अंगुली पकड़ के माँ
क्यूं मैं चल नहीं पाता हूँ
तू मुझे देख मुस्काती है
पर दिल में दर्द छुपाती है
जब मैं मुस्कुरा ना पाता हूँ
तू फिर से दुःखी हो जाती है
माँ मैं तेरी आँखों में देख
तुमसे बतियाना चाहता हूँ
तुम मुझे ढूँढो और मैं
किसी काने में छिप जाना चाहता हूँ
माँ तेरे आँचल की छाया
मैं तो भूला ना पाऊँगा
लेकिन अफसोस की दुःख के सिवा
मैं तुम्हे कुछ दे ना पाऊँगा
काश कि मैं कुछ कह पाता
दुःख अपना तुम्हें बता देता
या फिर बस तो होता तो
ईशारों से ही समझा देता
माँ भैया के अरमानों को
मैं पूरा ना कर पाऊँगा
और उसकी अँगुली पकड़ के कभी
स्कूल नहीं जा पाऊँगा
उम्मीद थी तुमको सुख की मगर
मैं तुम्हे दुःखी कर बैठा माँ
देनी तो थी खुशियां मगर
मैं तुम्हे तकलीफ दे बैठा माँ
अब और तकलीफ न दूँगा माँ
अब तुमसे विदा ले जाऊँगा
लेकिन वादा है जगले जनम
मैं लौट के जल्दी आऊँगा
पवन प्रजापति ‘पथिक’