Thursday, 28 February 2013

माँ मेरी कमजोर मैं


ये कविता एक ऐसे बच्चे के लिए लिखी गई है जो ना
हंस संकता है न बोल सकता है ना बैठ सकता है,
ना उठ सकता है ना चल सकता है ना खा पाता है
जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ
वो अपनी लाचारी अपनी माँ को किन शब्दों में बयां करेगा
वा शब्द मैंने देने की कोशिश की है,
यदि आपके दिल पर चोट करे तो कमेन्ट करें

माँ मेरी कमजोर नहीं पर
हालत से मजबूर हूँ मैं
तुमको क्या मालूम कि दिल से
कितना दुःखी लाचार हूँ मैंु
यूँ पैरो ंपे सबको चलते
देख दुःखी हो जाता हूँ
तेरी अंगुली पकड़ के माँ
क्यूं मैं चल नहीं पाता हूँ
तू मुझे देख मुस्काती है
पर दिल में दर्द छुपाती है
जब मैं मुस्कुरा ना पाता हूँ
तू फिर से दुःखी हो जाती है
माँ मैं तेरी आँखों में देख
तुमसे बतियाना चाहता हूँ
तुम मुझे ढूँढो और मैं
किसी काने में छिप जाना चाहता हूँ
माँ तेरे आँचल की छाया
मैं तो भूला ना पाऊँगा
लेकिन अफसोस की दुःख के सिवा
मैं तुम्हे कुछ दे ना पाऊँगा
काश कि मैं कुछ कह पाता
दुःख अपना तुम्हें बता देता
या फिर बस तो होता तो
ईशारों से ही समझा देता
माँ भैया के अरमानों को
मैं पूरा ना कर पाऊँगा
और उसकी अँगुली पकड़ के कभी
स्कूल नहीं जा पाऊँगा
उम्मीद थी तुमको सुख की मगर
मैं तुम्हे दुःखी कर बैठा माँ
देनी तो थी खुशियां मगर
मैं तुम्हे तकलीफ दे बैठा माँ
अब और तकलीफ न दूँगा माँ
अब तुमसे विदा ले जाऊँगा
लेकिन वादा है जगले जनम
मैं लौट के जल्दी आऊँगा

पवन प्रजापति ‘पथिक’
 

Friday, 22 February 2013

चिर युवा है प्रिये प्रेम

आज जो ये चेहरा तुम्हारा 
फूलों सा है खिला हुआ 
लेकिन समय के साथ 
इसको कल मुरझाना ही होगा 
गालों की लाली जो तेरी 
चहुं ओर रोशनी बिखेर रही 
कल को इस रोशनी में भी 
अंधेरा छाना ही होगा 
नाजुक से ये होठ जो तेरे 
जिस कदर मुस्काते हैं 
कल को इन होठों से भी 
मुस्कान को जाना ही होगा 
कजरारे कजरारे नैनों 
से तुम घायल करती हो 
कल को इन नैनों को भी 
खुद घायल होना ही होगा 
काले काले मेघों को 
लज्जित करते हैं केश आज 
कल को इन केशों को भी 
खुद लज्जित होना ही होगा 
ये रूप रंग मदमाता यौवन 
ये सब कुछ तो नश्वर है 
चिर युवा है प्रिये प्रेम मेरा 
जो सदा अजर और अमर है 

पवन प्रजापति ‘पथिक’

Sunday, 3 February 2013

बेदम सा तन उखड़ी साँसें
प्यासी आँखें मौत तलाशे
सूखीं आंतें मुरझा चेहरा
नंगा बदन बस भरता आहें

लम्हा लम्हा टूटती सांसें
रेत ज्यूं फिसले मुट्ठी से
पल पल बढ़ता घोर अंधेरा
रोशनी अब लाऊं कहां से

हर पल मद्धि़म होती धड़कन
दिल भी अब आराम तलाशे
हर पल दूर भागती जिन्दगी
मौत है अब नजदीक यहां से

भूख के आगे हारी जिन्दगी
मौत का आगोश तलाशे
रह गया अब हड्डियों का ढांचा
जलने को शमशान तलाशे