Friday, 22 February 2013

चिर युवा है प्रिये प्रेम

आज जो ये चेहरा तुम्हारा 
फूलों सा है खिला हुआ 
लेकिन समय के साथ 
इसको कल मुरझाना ही होगा 
गालों की लाली जो तेरी 
चहुं ओर रोशनी बिखेर रही 
कल को इस रोशनी में भी 
अंधेरा छाना ही होगा 
नाजुक से ये होठ जो तेरे 
जिस कदर मुस्काते हैं 
कल को इन होठों से भी 
मुस्कान को जाना ही होगा 
कजरारे कजरारे नैनों 
से तुम घायल करती हो 
कल को इन नैनों को भी 
खुद घायल होना ही होगा 
काले काले मेघों को 
लज्जित करते हैं केश आज 
कल को इन केशों को भी 
खुद लज्जित होना ही होगा 
ये रूप रंग मदमाता यौवन 
ये सब कुछ तो नश्वर है 
चिर युवा है प्रिये प्रेम मेरा 
जो सदा अजर और अमर है 

पवन प्रजापति ‘पथिक’

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