Monday, 30 July 2018

बकरी की व्यथा

वर्माजी कोर्ट के वरिष्ठ जज थे। समय पर आना उनकी आदत में शुमार था। सोमवार को कोर्ट पहुंचे तो न्यायालय परिसर के हालात देख सन्न रह गए। न्यायालय परिसर में हजारों की संख्या में बकरियां मौजूद थी। किसी को अन्दर नहीं घुसने नहीं दे रही थी। जज साहब को देखते ही युनियन की अध्यक्षा बकरी जज साहब के पैरों में लोट गई
''मांई बाप न्याय कीजीए हमारे साथ''
''अरे छोड़ो, ये कौनसा तरीका है'' पैर छुड़ाते हुए जज साहब बोले
''क्या परेशानी है तुम लोगों की''
बकरी सुबकते हुए बोली ''मांई बाप हम लोग तो पुरुषों के ही भरोसे पर हैं, हमेशा उनके जुल्म सहे हैं, कभी उफ तक न की, यहां तक कि हमारे बच्चे इनका निवाला बने लेकिन कभी कुछ नहीं की लेकिन अब तो हद ही हो गई''
''क्यों क्या हुआ?'' जज साहब बोले
''हमारी इज्जत के साथ खिलवाड़ हुआ है जज साहब, हमारी एक साथी जो कि गर्भवती थी, का 6—7 आदमियों ने मिलकर बलात्कार कर दिया, तड़प—तड़प के मर गई बिचारी''
''ओह! ये तो बहुत बुरी बात है''
''जी हां जज साहब, ये सब हमारी आंखों के सामने हुआ है इसलिए हम खुद कोर्ट आई है गवाही देने''
''वो ठीक है लेकिन कोर्ट तुम लोगों की गवाही नहीं मान सकता क्योंकि तुम जानवर हो और ये इन्सानों की कोर्ट है''
''यदि हम जानवर है जज साहब तो जिन्होंने बलात्कार किया वो कौन थे, माफ करें लेकिन हमने अपना जानवर पन नहीं छोड़ा, इन्सानों ने जरूर अपनी इन्सानियत छोड़ दी है''
जज साहब निरूत्तर थे
''जज साहब स्वाभिमान हमारा भी है, हो सके तो आपके संविधान के पन्नों के किसी कोने में हमारे लिए भी जगह ढूंढिये या अबकी ईद पर बकरों की जगह बकरियों को कटने दीजिए

Sunday, 29 July 2018

विकास

मंत्रीजी का जनता दरबार चल रहा था एक फटेहाल व्यक्ति भी पहुंच गया मंत्रीजी की ओर जा ही र​हा था कि मंत्रीजी के गार्ड ने टोका
''कहां जा रहे हो भाई? क्या काम है कोई एप्लीकेशन वगैरह लाए हो साथ''
''जी कुछ नहीं वो मंत्रीजी से पैसे लेने थे'' उस फटेहाल व्यक्ति ने कहा
''क्यों? मंत्रीजी को उधार दे रखे है क्या तुमने, जनता दरबार मतलब कुछ भी उल्टी सीधी मांग लेकर चले आओगे'' गार्ड ने झिड़कते हुए कहा
''जी वो मंत्रीजी ने ही एक दिन कहा था कि विकास के लिए पैसे की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी, दरअसल मेरा ही नाम विकास है मैं तो मंत्रीजी के कहे अनुसार ही आया हूँ''
'विकास' चीखता रह गया और गार्ड ने 'विकास' को धक्के देकर बाहर निकाल दिया

Saturday, 28 July 2018

भूख

गोलू भागते हुए शर्माजी की दुकान पहुंचा
''अरे गोलू आज इतनी जल्दी में कैसे? तनिक सांस तो लेलो''
गोलू हांफते हुए बोला — ''अरे शर्माजी आज थोड़ी जल्दी में हूं जरा 2 किलो नाश्ता पैक करदो जल्दी''
शर्माजी बोले — ''क्या बात है गोलू आज कोई खास बात है क्या, या कोई लड़के वाले देखने आ रहे हैं तुम्हे''
गोलू बोला — ''अरे ऐसी कोई बात नहीं है शर्माजी वो पड़ौस में तीन बच्चों की मौत हो गई है ना भूख से, नेताजी आ रहे हैं वहां परिवार को ढाढस बंधाने बस उनके लिए नाश्ता ले जा रहा हूँ''

शर्माजी वापस गोलू से कोई सवाल न पूछ सके

इंसानियत की लाशें

क्षितिज आॅफिस से निकलने को ही होता है कि शालिनी का फोन आ जाता है
''सुनो थोड़ा जल्दी आना आपका स्पेशल गाजर का हलवा बनाया है''
''हां बाबा मालूम है कल मैंने ही तो गाजर लाकर दी थी बस निकल ही रहा हूॅं''
कहकर क्षितिज ने फोन काट दिया और अपनी बाईक लेकर निकल गया।
आॅफिस से थोड़ी दूर निकला ही था कि एक ट्रक काल बनकर आया और सारे अरमानों को रौंदकर चला गया
थोड़ी देर बाद वहां क्षितिज के साथ और भी कई लाशें बिखरी पड़ी थी
क्षितिज के साथ जो लाशें बिखरी पड़ी थी वो उन लोगों की इंसानियत की थी जो उसे बचाने के बजाय अपने मोबाईल में उसकी अन्तिम सांस निकलने तक उसका विडियो बनाते रहे
पोस्ट मार्टम में क्षितिज की मौत का कारण अधिक रक्त बह जाना बताया गया
वहीं इन्सानियत की मौत का कारण पता नहीं लग सका

Monday, 16 July 2018

मेरा पुराना घर

कल गली से गुजरते वक्त अचानक किसी ने पीछे से आवाज दी''कहां जा रहे हो'' मैं रूककर पीछे मुड़ा तो कोई नहीं था। जैसे ही वापस घूमा फिर वहीं आवाज आई, लेकिन पीछे कोई नहीं था। इतने में आवाज वापस गूंजती है ''क्या हुआ भूल गए मुझे? मेरे साथ तो तुमने 30 साल गुजारे हैं इतनी जल्दी कैसे भूल गए?'' मेरा पुराना घर ही मुझसे बतिया रहा था। मैं भी तपाक से बोला
''अरे नहीं तुम्हे कैसे भूल सकता हूँ''
''भूले नहीं तो कभी सम्भालने तो नहीं आते। अब आओगे भी क्यूं मैं तुम्हारे नए घर जैसा खूबसूरत जो नहीं हूं'' मुझे उलाहना देते हुए बोला।
''अरे नहीं वो बात नहीं है''
''और नहीं तो क्या बात है? तुम तो नए घर में जाकर सब कुछ भूल गए, क्या तुम्हे मेरे आंगन में खेलना और उधम मचाना भी याद नहीं। छोटे थे तो कितनी बार मेरी दीवारों को अपनी चित्रकारी से गन्दा किया करते थे। तुम्हारे साथ भीगकर मैं भी तो होली खेला करता था, दीवाली मनाया करता था। वो चित्रकारियां, होली, दीवाली मेरे जेहन में अब भी ताजा है, मगर तुम भूल चुके हो, सच में तुम बहुत भुलक्कड़ हो गए हो''
उसके उलाहने जारी थे?
''मैंने सोचा तुम जाते हुए एक बार मुझे मुड़कर तो देखोगे लेकिन तुम तो सच में बहुत निष्ठुर निकले, हमेशा मेरे पास से निकल जाते हो कभी मेरी तरफ देखते तक नहीं''
मैं यादों के दरिया में डूबता उतराता उसके किसी उलाहने का जवाब तक न दे सका। बस वो बोलता गया और मैं नि:शब्द सा बस सुनता गया