ऐ कान्हा! वैसे तो तुम अजन्मा हो, चराचर जगत तुम्ही से जन्म पाता है और फिर तुम्ही में मिल जाता है। फिर भी सांसारिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए तुम्हे जन्मदिन की शुभकामनाएं तो देनी बनती ही है। पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिये तुमने मानव देह धारी, पापियों का नाश किया, धर्म की रक्षा की। समरांगण में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को गीता का दिव्य ज्ञान दिया जो हजारों वर्षों बाद भी मानवों का मार्गदर्शन कर रहा है। किन्तु अपने धाम जाने के बाद शायद इस पृथ्वी लोक की सुध लेना भूल गये हो। तुम्हे पता है जिस धर्म की तुम स्थापना करके गये थे वो धर्म अब मृत्युशैया सांसों की डोर को सिर्फ तुम्हारी प्रतीक्षा में पकड़े हुए है, क्यूंकि तुम्ही तो कहकर गये थे कि मैं हर युग मैं आउंगा, जब — जब धर्म की हानि होगी तब — तब आउंगा। धर्म को बस उसी बात का भरोसा है। तुम्हारे जन्म लेते ही कारागार के ताले स्वयं ही खुल गये थे, तो अब क्यों नहीं खोल देते लोगों के हृदयों पर पड़े ताले, जिनके चलते वे भावना शून्य हो चुके हैं। तुम तो चोरी में कुशल हो, बचपन में लोगों के घरों का माखन चुरा लेते थे, किशोर हुए तो गोपियों का हृदय चुरा लिया, फिर क्यों नहीं चुरा लेते लोगों के मन में भरा पाप, घृणा, द्वेष, अहंकार, और उनके स्थान पर अपनी मुरली की तान से उसमें प्रेम क्यों नहीं भर देते। हे गिरधर! गोकुल को इन्द्र के कोप से बचाने के लिये तुमने गोवर्धन को उठा लिया था, इन्द्र को अहंकार त्याग तुम्हारे आगे नतमस्तक होना पड़ा था। फिर क्यों इन्द्र को आदेश नहीं देते कि उसके बादल बाढ़ वाले क्षेत्र पर थोड़ा कम बरसे और उन मरूस्थलों में जमकर बरसें जहां उनका इन्तजार करते — करते लाखों करोड़ों आंखें पथरा गयी है। सुदामा को तो तुमने दो मुट्ठी चावल के बदले अपना सब कुछ लुटा दिया था। तुम तो स्वयं लक्ष्मी पति हो, फिर ये जो तुम्हारे द्वार खड़े हैं इनकी झोलियां खाली क्यों है? हे कान्हा! शिशुपाल को तुमने 100 अपराध होते ही मृत्युदण्ड देकर यह सन्देश दे दिया था कि तुम दुष्टों को कभी क्षमा नहीं करते, फिर तुम्हारी ही पृथ्वी पर ये हजारों शिशुपाल गलतियों की सीमाएं कब की पार कर चुके हैं, तुम क्यों उन्हें दण्डित नहीं करते। तुम्हारे सिवा कौन है जो इन शिशुपालों का सिर धड़ से अलग करेगा। द्रोपदी की एक आर्त पुकार सुनकर तुम्हारा हृदय इतना द्रवित हो उठा कि तुम उसकी लाज बचाने खुद दौड़े चले आये। आज तो हर नुक्कड़ पर द्रुपदसुताएं लुट रही है, क्या उनकी आर्त पुकार तुम तक नहीं पहुंच रही है। अधर्म के विरूद्ध जब अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हो धनुष छोड़कर बैठ गया तो तुम्ही ने उसे गीता का दिव्य ज्ञान दिया जिससे अर्जुन अधर्म के विरूद्ध युद्ध करने को तैयार हुआ। हे मुरलीधर! तुम्हारे पार्थ तो अब भी किंकर्तव्यविमूढ़ है तुम्हारे अतिरिक्त कौन है जो सारथी बन पार्थ का मार्गदर्शन कर सके। युद्ध भूमि में अपने विराटरूप का दर्शन करवा तुमने ये बता दिया कि तुम्ही सर्वेश्वर हो, तुम्ही सृष्टि का आदि, मध्य एवं अन्त हो। तुम्हारे विस्तार की तो कोई सीमा ही नहीं है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तुम्ही में समाया हुआ है। तो हे गिरधर! अब तो अपनी शेष शैया से उठो, तुम्हारी पृथ्वी को तुम्हारे सुदर्शन और तुम्हारी मुरली दोनों की आवश्यकता है। सुदर्शन से समस्त शिशुपालों एवं कौरवों नाश कर दो और अपनी मुरली से समस्त विश्व को प्रेम मय कर दो।
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