Friday, 28 August 2020

एक चिड़िया की कहानी

 एक चिड़िया की कहानी


एक बार अपनी बगिया में

मैं चुप बैठा सोच रहा था

क्यूं बगिया के फूल ना खिलते

मन चिन्ता में डोल रहा था


तब मैंने देखा इक नन्ही

चिड़िया पास में आ बैठी थी

मन के ठहरे सागर में ज्यू

कोई ऊँची लहर उठी थी


चिड़िया को दाने डाले तो

चिड़िया चहक चहक उठी थी

चिड़िया की चहकन से मेरी

पूरी बगिया महक उठी थी


चिड़िया के आने से मानो

मेरी बगिया भी हर्षाई

मुरझाये सब फूल खिले थे

मानों बसन्त ऋतु हो आई


बगिया के इक पेड़ की डाली

उस चिड़िया ने किया बसेरा

पेड़ भी उसको पाकर झूमा

उसको चूमा खूब दुलारा


अब चिन्ता की सारी बातें

बीते जीवन का हिस्सा थी

चिड़िया से मेरा जीवन था

वो जीवन का इक हिस्सा थी


दाना लेकर उसे मनाता

कभी रूठ जब वो जाती थी

पहले तो थोड़ा इतराती

फिर गोदी में आ जाती थी


कभी दौड़ती आगे - आगे

और मैं पीछे - पीछे जाता

कभी ढूंढने मुझको आती

मैं जब कोने में छिप जाता 


ऐसे ही हंसते गाते से

मेरे भी दिन बीत रहे थे

लेकिन इतना पता नहीं था

दिन खुशियों के रीत रहे हैं


मेरी चिड़िया हुई सयानी

यौवन ने आ डाला डेरा 

मेरी चिड़िया के दिल में भी

एक चिड़े ने किया बसेरा


अपने सपनों का साथी पा

वो चिड़िया भी अब खुश रहती 

लेकिन जब भी मिलती मुझसे

जाने क्यूं चुप चुप सी रहती


एक बार मैंने उन दोनों

चिड़े चिड़ी को बुलावाया था

चिड़िया शरमाती सी आयी

और चिड़ा था घबराया सा


दोनों को फिर पास बिठाकर

चिड़िया को सीने से लगाया

बोला साथ चिड़े के रहना

मैं अब तुमसे हुआ पराया


चिड़िया बोली बाबुल तुमसे

दूर कभी ना मैं जाउंगी

तेरे आंगन में चहकूंगी

तेरे आंगन में गाउंगी


मैं बोला सुन पगली ये तो

रीत सदा से चलती आई

छोड़ के आंगन उड़ जाना है

जिस आंगन है पलती आई


छलक उठे नयनों के सागर 

फिर बिदाई की बेला आई

मेरी बगिया में भी फिर से

पतझड़ सी मायूसी छाई


आँखों में आँसूं ले चिड़िया

साथ चिड़े के उड़ती जाती

मेरी बगिया में भी पल - पल

एक उदासी बढ़ती जाती


चिड़िया के जाने से मेरी

बगिया का हर फूल था रोया

ओढ़ निशा की काली चादर

सूरज भी गुमसुम था सोया 

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