शहर का नम्बर
टूटी—फूटी सड़क पर हिचकोले खाती सरकारी बस की हालत भी उस सरकार की तरह हो चुकी थी जो नाम मात्र के विधायकों के भरोसे चल रही थी। जिसके विधायक कई बार समर्थन वापस लेने की धमकी दे चुके थे लेकिन लेकिन सरकार किसी तरह हाथ — पांव जोड़कर चल रही थी। दरअसल बस शुरू से ऐसी नहीं थी लेकिन उस टूटी—फूटी सड़क पर चलते — चलते बस की हालत ऐसी हो चुकी थी।
उसी बस की फटी हुई सीट पर बांके बैठा था। उसमें सीट के नाम पर मात्र कवर ही बचा था, अन्दर का फोम शायद लोग सार्वजनिक सम्पत्ति समझकर अपना — अपना हिस्सा निकाल ले गये। बस के हिचकोलों से बिना फोम की सीट पर बैठे बांके राधे की तशरीफ बिल्कुल वैसी ही हो गयी थी जैसी 65 व 71 के युद्ध में भारत से पिटाई के बाद पाकिस्तान की हुई थी। बांके की सांस में सांस तब आई जब लम्बे संघर्ष के बाद बस स्टेशन पर सकुशल पहुंच ही गयी। बस से उतरकर बांके ने राहत की सांस ली। बरसात के पानी से झील बन चुकी सड़क को लांघ कर बांके उस पार बनी चाय की दुकान पर पहुंचा और
चाय वाले से चाय का कप लेते हुए पूछा
''क्यों भाई! यह शहर तो मंत्रीजी का शहर है! इस कम से कम शहर का विकास तो बहुत पहले हो जाना चाहिये थे लेकिन इसकी हालत तो बहुत ही खस्ता है। क्या मंत्रीजी शहर के विकास के लिये कुछ नहीं करते।''
चाय वाला बोला
''ऐसा नहीं है भाई साहब, आप नाहक हमारे मंत्रीजी को गलत समझ रहे हैं। दरअसल मंत्रीजी की आदत है कि कि हर शुभ काम की शुरूआत अपने घर से करते हैं। तो इसी कड़ी में उन्होंने विकास की शुरूआत भी अपने घर से ही की। अब जब उनके घर का पूरा विकास हो जायेगा तभी तो शहर का नम्बर आयेगा ना। और जब तक शहर के विकास का नम्बर आता है, सरकार बदल जाती है, फिर जो नया मंत्री आता है वो विकास की शुरूआत फिर अपने घर से ही आता है और यही क्रम चलता रहता है इस चक्कर में शहर के विकास का तो नम्बर ही नहीं आता, इसमें भला हमारे मंत्रीजी की क्या गलती है?''
बांके चाय वाले के तर्क से निरूत्तर हो गया। टूटी सड़कों को लांघता अपने गंतव्य की ओर निकल गया।