Friday, 30 October 2020

गांव दिखा दूँ

कैसे साहिल पे डूबी थी नाँव दिखा दूं
हारा सबकुछ कैसे वो दाँव दिखा दूं

कामयाबी पे यूँ ही तो पहुँचा नहीं
खून से ये सने मेरे पाँव दिखा दूं

जीतने पूरी दुनिया सिकन्दर चला
जो मिली उसको दो गज ठाँव दिखा दूं

भागते भागते थक गया है अगर
तुझको पीपल की ठंडी छाँव दिखा दूं

रात भर ही भटकता शहर ये तेरा
चैन से सो रहा मेरा गाँव दिखा दूं

Saturday, 17 October 2020

नवरात्रि और कन्यापूजन

नवरात्रि और कन्या पूजन
मोहनलाल सुबह से मोहल्ले के 10 घरों के चक्कर काट चुके हैं। लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी 9 कन्याएं नहीं मिल पायी। नवरात्रा के पावन दिन चल रहे हैं। शास्त्रों में भी नवरात्रा के दिनों में कन्या को भोजन करवाने का बड़ा महत्व माना गया है। एक तो मोहल्ले में वैसे भी लड़कियां नहीं है, जो है वो उन्होंने पहले ही कहीं से निमंत्रण ले रखा है। आखिर जब थक हार कर मोहनलाल खाली हाथ घर आ गये तो पत्नी मालती बोली — ''क्या हुआ, कोई लड़की नहीं मिली। ''

''कहां मिली? मोहल्ले में लड़कियां है कहां जो मिलेंगी। जिनके लड़कियां है उन्होंने पहले से निमंत्रण ले रखा है।''

''होगी भी कैसे? जब लड़कियों को पैदा होने दिया जायेगा तभी होंगी ना, खुद तुम्हारे घर में कितनी लड़कियां है? पता है जब मैं दूसरी बार गर्भवती हुई थी और तुम्हे पता चला कि पेट में लड़की है तो तुम्ही ने पैदा नहीं होने दिया। मैं लाख रोयगी, गिड़गिड़ायी लेकिन तुम नहीं पसीजे। अब आदमी जो बोयेगा वहीं तो काटेगा ना। अब आओ फिर से वहीं जहां पिछली बार गये थे।''

मोहनलाल पैर घिसटते हुए फिर शहर के अनाथ आश्रम की ओर चल दिये जहां उन लड़कियों को रखा जाता है जिन्हें जन्मते ही नाले या कूड़ेदान में फैंक दिया गया था।

Tuesday, 6 October 2020

लघु कथा : शहर का नंबर

शहर का नम्बर
टूटी—फूटी सड़क पर हिचकोले खाती सरकारी बस की हालत भी उस सरकार की तरह हो चुकी थी जो नाम मात्र के विधायकों के भरोसे चल रही थी। जिसके विधायक कई बार समर्थन वापस लेने की धमकी दे चुके थे लेकिन लेकिन सरकार किसी तरह हाथ — पांव जोड़कर चल रही थी। दरअसल बस शुरू से ऐसी नहीं थी लेकिन उस टूटी—फूटी सड़क पर चलते — चलते बस की हालत ऐसी हो चुकी थी।
उसी बस की फटी हुई सीट पर बांके बैठा था। उसमें सीट के नाम पर मात्र कवर ही बचा था, अन्दर का फोम शायद लोग सार्वजनिक सम्पत्ति समझकर अपना — अपना हिस्सा निकाल ले गये। बस के हिचकोलों से बिना फोम की सीट पर बैठे बांके राधे की तशरीफ बिल्कुल वैसी ही हो गयी थी जैसी 65 व 71 के युद्ध में भारत से पिटाई के बाद पाकिस्तान की हुई थी। बांके की सांस में सांस तब आई जब लम्बे संघर्ष के बाद बस स्टेशन पर सकुशल पहुंच ही गयी। बस से उतरकर बांके ने राहत की सांस ली। बरसात के पानी से झील बन चुकी सड़क को लांघ कर बांके उस पार बनी चाय की दुकान पर पहुंचा और
चाय वाले से चाय का कप लेते हुए पूछा
''क्यों भाई! यह शहर तो मंत्रीजी का शहर है! इस कम से कम शहर का विकास तो बहुत पहले हो जाना चाहिये थे लेकिन इसकी हालत तो बहुत ही खस्ता है। क्या मंत्रीजी शहर के विकास के लिये कुछ नहीं करते।''
चाय वाला बोला
''ऐसा नहीं है भाई साहब, आप नाहक हमारे मंत्रीजी को गलत समझ रहे हैं। दरअसल मंत्रीजी की आदत है कि कि हर शुभ काम की शुरूआत अपने घर से करते हैं। तो इसी कड़ी में उन्होंने विकास की शुरूआत भी अपने घर से ही की। अब जब उनके घर का पूरा विकास हो जायेगा तभी तो शहर का नम्बर आयेगा ना। और जब तक शहर के विकास का नम्बर आता है, सरकार बदल जाती है, फिर जो नया मंत्री आता है वो विकास की शुरूआत फिर अपने घर से ही आता है और यही क्रम चलता रहता है इस चक्कर में शहर के विकास का तो नम्बर ही नहीं आता, इसमें भला हमारे मंत्रीजी की क्या गलती है?''
बांके चाय वाले के तर्क से निरूत्तर हो गया। टूटी सड़कों को लांघता अपने गंतव्य की ओर निकल गया।