अयोध्या के युवराज राम को राज्याभिषेक के स्थान पर चौदह वर्ष का कठोर वनवास मिल चुका था। और राम ने वनवास को भी उसी प्रसन्नता और सहजता से स्वीकार कर लिया जैसे वे राज्य का वैभव स्वीकार कर रहे थे। यही तो ‘राम’ होना है। राम ने बिना एक क्षण गंवाए राजसी वेश त्याग तपस्वी वेश धारण वन के लिये प्रस्थान किया तो परछाई की भांति सीता और लक्ष्मण भी पीछे - पीछे रवाना हो गये। सीता के लिये जहां राम वहीं अयोध्या थी तो लक्ष्मण के लिये राम मानो आता जाता श्वांस थे। तीनों जब तपस्वी वेश में रथ पर बैठकर अयोध्या की विथियों से निकले तो हजारों हृदय मानों फट पड़े और उनके उद्गार आंखों से निकल पड़े। अयोध्या में केवल कैकई व मंथरा प्रसन्न थी तो नभ में देवता बहुत उत्साहित थे आखिर जिस कार्य के लिये राम ने अवतार लिया था वे उसकी ओर कदम बढ़ा चुके थे। किन्तु इनके अतिरिक्त भी कोई और प्रसन्न था। वे थे ‘वन’ जहां राम को चौदह वर्ष बिताने थे। सम्पूर्ण वन प्रदेश उल्लासित था। हजारों वर्षों की घोर तपस्या के बाद भी जिनका ‘क्षण मात्र’ का ही सानिध्य मिलता है वे राम पूरे चौदह वर्षों के लिये वन में रहने के लिये आ रहे थे इस बात से वन फूले नहीं समा रहे थे। वृक्ष अपनी डालियों पर मधुर फल लेकर मानों राम की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। पौधों पर नये फूल आ गये थे। नदियों का जल पहले से अधिक स्वच्छ और मीठा हो चुका था। वायु अद्भुत सुगंध लेकर बह रही थी जो आज से पहले किसी ने अनुभव नहीं की थी। पर्वतों ने नया श्रृंगार कर लिया था। कंद - मूल मानों करबद्ध सेवा में खड़े थे कि कब राम अपने हाथों से स्पर्श कर उन्हें कृतार्थ करें। वन की धरती अपनी कठोरता त्याग फूलों की तरह कोमल हो चुकी थी कि कब राम अपने ‘पावन’ चरणों से उन्हें कृतार्थ करें। घास तो मानों महलों के रशमी गद्दों का भी तिरस्कार कर रही थी। शबरी के बरसों से बिछ रहे फूलों को पावन चरणों का स्पर्श मिलने वाला था। ‘शरभंग’ ऋषि अपनी सांसों की डोर केवल ‘राम’ के दर्शन के लिये ही पकड़े हुए थे और उनके दर्शनों के लिये कई बार इन्द्र को भी खाली लौटा दिया था जो उन्हें सशरीर स्वर्ग ले जाने के लिये अपना विमान लेकर आये थे। हनुमान को अपने स्वामी के तो सुग्रीव को ‘परमसखा’ मिलने वाले थे।
राम चौदह वर्षों तक वन में रहे तो उस समय वह वन प्रदेश इन्द्र की ‘अमरावती’ का भी तिरस्कार करता सा प्रतीत होता था। देवताओं को मन ही मन ईर्ष्या होती कि काश वो उस वन प्रदेश का कोई वृक्ष ही रहे होते ।
आज चौदह वर्षों बाद जब राम अयोध्या लौट रहे रहे हैं तो तीनों लोक प्रसन्न है। देवताओं का कार्य पूरा हो चुका है। अयोध्या का अपूर्व श्रृंगार किया गया है। अट्टालिकाओं पर नवीन ध्वज लगाये गये हैं। विथियों के दोनों ओर दीपक जलाये गये हैं। भवनों पर नवीन रंग - रोगन किया गया है। सभी आंखों एक टक नभ की ओर ही लगी है न जाने कौन से क्षण राम आएंगे। एक क्षण भी अब एक वर्ष सा प्रतीत हो रहा है।
एक ओर जहां अयोध्या में नवीन उल्लास का संचार है वहीं वनों में मायूसी छायी है। राम अब वनों को त्याग देंगे इस बात से वन बहुत ही दु:खी हैं। नदियां अपना स्वाभाविक बहाव भूल चुकी है। पुष्प मुरझा चुके हैं। वृक्ष सूख चुके हैं। घास कुम्हला चुकी है। पर्वत मानों वीरान हो चुके हैं। वन्यजीवों ने भोजन करना छोड़ दिया है। तीनों लोक प्रसन्न है किन्तु वन बहुत दु:खी हैं। अब उन्हें राम के दर्शन नहीं हो पाएंगे। अयोध्या की प्रसन्नता पर सबकी दृष्टि है किन्तु वनों का दु:ख किसी को दिखाई नहीं दिया।
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