सुना है कुछ ‘पत्रकारों’ ने ‘कुछ नेताओं’ का स्टिंग ऑपरेशन कर लिया है जिसमें दावा किया जा रहा है कि नेताजी ‘खाते’ हैं। तो इसमें कौनसी नई बात है। नेताजी अगर ‘खाते’ हैं तो चुनावों से पहले ‘खिलाते’ भी तो हैं। वैसे भी वो अकेले तो खाते नहीं। नेताजी के खाने के बाद जो बच जाता है उसे प्रसाद मानकर बांट भी तो दिया जाता है। इस प्रकार से नेताजी खाते भी हैं और खिलाते भी हैं। और खाने खिलाने का दौर कोई नया तो है नहीं। पत्रकार महोदय ने जो विडियो बनाया है वो तो जनता को पहले से पता है नेताजी खाते हैं। दरअसल नेता बना ही इसीलिये जाता है कि ‘जमकर खाया’ जा सके। जो ‘खा’ नहीं सके उसको कभी चुनाव लड़वाया ही नहीं जाता है। ऐसे आदमी को चुनाव जितवाने में किसी का कोई फायदा भी नहीं है। क्योंकि जो खुद नहीं खा सकता वो दूसरों को क्या खिलायेगा। सच्चा नेता वही है जो ‘खाये और खिलाये ’ और इस प्रकार ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज पर ‘चमचैव कुटुम्बकम’ की परम्परा को जीवित बनाये रखे। इसलिये नेताजी के खाने पर इतना गम्भीर होने की आवश्यकता नहीं है। अब नेता कोई भगवान तो है नहीं कि मात्र भोग लगाने से काम चल जायेगा। खाने की मात्रा भी नेताओं के कद पर निर्भर करती है। ज्यों - ज्यों नेताजी का कद बढ़ता जोयगा त्यों - त्यों उनके खाने और पचाने की क्षमता भी बढ़ती जायेगा। जो जितना बड़ा नेता होगा वो उतना ही अधिक खायेगा। छोटा नेता कम खायेगा लेकिन खायेगा जरूर। क्योंकि बिना खाये जीवित नहीं रहा जा सकता है। वैसे खाने और खिलाने का दौर राजनीति तक ही सीमित नहीं है। सरकारी दफ्तरो में भी कुछ खिलाये बिना फाईल आगे नहीं सरकती। इतना ही नहीं। फलां आदमी ने ‘खाया है’ इसका मुकदमा दर्ज करने के लिये कोर्ट में भी ‘खिलाना और पिलाना’ पड़ता ही है। वैसे भी हमारे यहां यह ‘खिलाना और पिलाना’ इतना सामान्य हो चुका है कि हम इसे ‘अपराध’ मानते ही नहीं बल्कि खाने वाले का हक मानते हैं कि -‘इतना तो बिचारा खायेगा ही’ इसलिये खाने और खिलाने के छोटे मोटे विडियो पर इतनी हाय तौबा मचाने की आवश्यकता नहीं है। यह तो अब हमारी सभ्यता का हिस्सा बन गयी है। यदि कोई व्यक्ति नहीं खाता है तो एसे हीन दृष्टि से देखा जाता है। ‘खाने वाले ’ लोगों के बच्चों की शादिया भी जल्दी हो जाती है वहीं नहीं खाने वाले लोगों को घर वाले भी ताना देते हुए कहते हैं - ‘फलां को देखो कितना खाता है तुम क्यों नहीं खा लेते कुछ’ दरअसल आज के दौर में ‘खा लेना’ प्रतिष्ठा की बात बन गयी है इसलिये ‘खाने वाले’ नेताओं की प्रशंसा कीजिये वो वाकई प्रशंसा के लायक है।
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