Sunday, 23 July 2017

जरा खुल के इसे उड़ लेने दो

जरा खुल के इसे उड़ लेने दो 
कल को ये परिंदा हो न हो
थक के जरा सो जाओ यहाँ
कल को ये कंधा हो न हो

तस्वीरी खयाल सखी अबकी सावन वो झूले नहीं है

तस्वीरी खयाल

सखी अबकी सावन वो झूले नहीं है
जहां संग संग हम झूले कभी थे
बुन्दों से भीगी हुई मस्तियों को
बरसों बरस भी हम भूले नहीं हैं

वो नाम ‘उनका’ लेके हमें छेड़ देना
लज्जा से नयने हमने खोले नहीं थे
सखी कहने को तो अब भी है सावन
मगर पहले जैसे वो झूले नहीं हैं

स्वरचित

Sunday, 9 July 2017

चाह न थी

मैंने तुमसे कब प्रश्न किया कि तुम कैसी हो
मेरे मन में जो मूरत थी बस तुम वैसी हो
मैंने कब चाहा मृगनयनी की बाहों का हार मिले
मैंने बस इतना चाहा उसके नयनों में प्यार मिले
नायिका सम रूप रंग हो ऐसी मुझको चाह न थी
मन का रूप सदा चाहा है तन की कभी परवाह न की
उसके प्रेम की बूंदे मुझ पर बनकर बादल यूं बरस पड़े
मानो कोई प्रेम विवश नदिया सागर से मिलन को तरस पड़े

स्वरचित