तस्वीरी खयाल
सखी अबकी सावन वो झूले नहीं है
जहां संग संग हम झूले कभी थे
बुन्दों से भीगी हुई मस्तियों को
बरसों बरस भी हम भूले नहीं हैं
वो नाम ‘उनका’ लेके हमें छेड़ देना
लज्जा से नयने हमने खोले नहीं थे
सखी कहने को तो अब भी है सावन
मगर पहले जैसे वो झूले नहीं हैं
स्वरचित

सखी अबकी सावन वो झूले नहीं है
जहां संग संग हम झूले कभी थे
बुन्दों से भीगी हुई मस्तियों को
बरसों बरस भी हम भूले नहीं हैं
वो नाम ‘उनका’ लेके हमें छेड़ देना
लज्जा से नयने हमने खोले नहीं थे
सखी कहने को तो अब भी है सावन
मगर पहले जैसे वो झूले नहीं हैं
स्वरचित
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