Sunday, 9 July 2017

चाह न थी

मैंने तुमसे कब प्रश्न किया कि तुम कैसी हो
मेरे मन में जो मूरत थी बस तुम वैसी हो
मैंने कब चाहा मृगनयनी की बाहों का हार मिले
मैंने बस इतना चाहा उसके नयनों में प्यार मिले
नायिका सम रूप रंग हो ऐसी मुझको चाह न थी
मन का रूप सदा चाहा है तन की कभी परवाह न की
उसके प्रेम की बूंदे मुझ पर बनकर बादल यूं बरस पड़े
मानो कोई प्रेम विवश नदिया सागर से मिलन को तरस पड़े

स्वरचित

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