लिखने के लिए उन्वान/विषय दिया गया है ''रूह''
उस पर लिखने में कितना सफल हो पाया हूं.
ये आप ही तय कर सकते हैं।
तोड़ के सांसों के बन्धन
उड़ चली वो रूह ही है
आग में तो देह जली है
ना जली वो रूह ही है
राख के इस ढेर में
तू ढूंढता क्या फिर रहा है
हाथ लगी वो अस्थियां है
ना लगी वो रूह ही है
उस पर लिखने में कितना सफल हो पाया हूं.
ये आप ही तय कर सकते हैं।
तोड़ के सांसों के बन्धन
उड़ चली वो रूह ही है
आग में तो देह जली है
ना जली वो रूह ही है
राख के इस ढेर में
तू ढूंढता क्या फिर रहा है
हाथ लगी वो अस्थियां है
ना लगी वो रूह ही है