Monday, 12 March 2018

रूह ही है

लिखने के लिए उन्वान/विषय दिया गया है ''रूह''
उस पर लिखने में कितना सफल हो पाया हूं.
ये आप ही तय कर सकते हैं।

तोड़ के सांसों के बन्धन
उड़ चली वो रूह ही है
आग में तो देह जली है
ना जली वो रूह ही है

राख के इस ढेर में
तू ढूंढता क्या फिर रहा है
हाथ लगी वो अस्थियां है
ना लगी वो रूह ही है

ना मिलुं तो

चन्द लाईनें
यदि किसी रोज
लाख कोशिश करने
के बावजूद
मैं तुम्हें ना मिलुं
तलाश करने के बाद भी
जब मेरी खबर
ना मिले
अपनी सारी कोशिशें
करके
यदि थक जाओ
तो दो पल के लिए
बन्द कर लेना
अपनी नश्वर आँखें
और अपने अन्तर के झरोखे से
झांकना अपने हृदय में
कहीं न कहीं खड़ा
मुस्कुराता हुआ
मिल ही जाउंगा मैं
क्योंकि तुमसे दूर
तो नहीं हो सकता ना!

Friday, 9 March 2018

है मुश्किल रास्ता तो क्या




है मुश्किल रास्ता तो क्या, दिल में हौसला तो है
जमीं पे पैर हैं तो क्या, नजर में आसमां तो है
जमाने तू मुझे कब तक रखेगा यूं अंधेरे में
अंधेरी रातों के उस पार उम्मीदों के उजाले तो हैं

Thursday, 1 March 2018

अपराधबोध

‘‘अजी सुनते हो...आज होली है आप बच्चों के पिचकारियां लाना मत 
भूलना’’ शालिनी ने मयंक को याद दिलाते हुए कहा। ‘‘हां बाबा हां मुझे याद है सुबह से तुम चार बार मुझे याद दिला चुकी हो’’ ‘‘और सुनो वो रसोई का सामान मत भूलना अभी मुझे बहुत सी मिठाईयां बनानी है।’’ तभी बाहर से मेहुल दोड़ता हुआ आता है ‘‘पापा मैं भी चलूंगा आपके साथ बाजार में देखो ना मेरे सभी दोस्त कलर एवं पिचकारियां ले आए हैं. पापा मेरे लिए भी लाओ ना’’ मेहुल जिद करता हुआ कहता है ‘‘चलो बेटा तुम भी चलो जैसा मेरा राजा बेटा कहेगा वैसी पिचकारियां दिलाउंगा‘‘ मेहुल को गोद में उठाकर मयंक बाहर निकलने को ही होता है कि अचानक शालिनी को कुछ याद आता है ‘‘सुनो! कल मेहमान आएंगे मिलने के लिए आप एक काम करना ना, वृद्धाश्रम से मां और पिताजी को भी लेते आना ना। दो दिन मैं भी उनके साथ रह लुंगी और मेहमान आएंगे तो भी अच्छा लगेगा’’
इस बार मयंक ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी चुपचाप रवाना हो गया। लेकिन उसके चलने में कोई उत्साह नहीं था.. कदमों को मानो किसी अपराधबोध की बेड़ियों ने जकड़ रखा था।