Thursday, 1 March 2018

अपराधबोध

‘‘अजी सुनते हो...आज होली है आप बच्चों के पिचकारियां लाना मत 
भूलना’’ शालिनी ने मयंक को याद दिलाते हुए कहा। ‘‘हां बाबा हां मुझे याद है सुबह से तुम चार बार मुझे याद दिला चुकी हो’’ ‘‘और सुनो वो रसोई का सामान मत भूलना अभी मुझे बहुत सी मिठाईयां बनानी है।’’ तभी बाहर से मेहुल दोड़ता हुआ आता है ‘‘पापा मैं भी चलूंगा आपके साथ बाजार में देखो ना मेरे सभी दोस्त कलर एवं पिचकारियां ले आए हैं. पापा मेरे लिए भी लाओ ना’’ मेहुल जिद करता हुआ कहता है ‘‘चलो बेटा तुम भी चलो जैसा मेरा राजा बेटा कहेगा वैसी पिचकारियां दिलाउंगा‘‘ मेहुल को गोद में उठाकर मयंक बाहर निकलने को ही होता है कि अचानक शालिनी को कुछ याद आता है ‘‘सुनो! कल मेहमान आएंगे मिलने के लिए आप एक काम करना ना, वृद्धाश्रम से मां और पिताजी को भी लेते आना ना। दो दिन मैं भी उनके साथ रह लुंगी और मेहमान आएंगे तो भी अच्छा लगेगा’’
इस बार मयंक ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी चुपचाप रवाना हो गया। लेकिन उसके चलने में कोई उत्साह नहीं था.. कदमों को मानो किसी अपराधबोध की बेड़ियों ने जकड़ रखा था।

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