विश्वास नहीं होता
यूँ तो इस दिल को कुछ भीअहसास नहीं होता
दुःख भी होता है लेकिन कुछ खास नहीं होता
सूरज पूरब में डूबा ये मान भी लूं लेकिन
तुम मुझसे मुंह मोड़ोगे विश्वास नहीं होता
Thursday, 17 January 2019
विश्वास नहीं होता
आभास
तुम्हारे साथ बीता वो हर इक पल खास होता है
हरदम तेरी यादों का वो साया पास होता है
मेरी आँखों से ये आँसूं न जाने क्यूं बरसते हैं
शायद रोती तुम हो पर हमें आभास होता है
Saturday, 12 January 2019
मिट्टी खुशबू भाग 3
कहानी : मिट्टी की खुशबू भाग - 3
जमनालाल अब अनमने से रहने लगे। दोनों बेटे देर रात घर आते और सुबह काम पर निकल जाते। आस पड़ौस के तथाकथित सभ्य लोगों के साथ भी जमनालाल अपना तालमेल बिठाने में नाकाम रहे। एक बार जमनालाल जब घर के बाहर बाहर टहल रहे थे तो देखा कि उनके सामने एक कार एक व्यक्ति को टक्कर मारकर चली जाती है। खून से लथपथ व्यक्ति सड़क पर पड़ा तड़प रहा होता है लेकिन आस पास से गुजरने वाले लोग उसे इस तरह अनदेखा कर देते हैं मानों कुछ हुआ ही नहीं हो। जमनालाल दौड़कर वहां जाते हैं लोगों से उस घायल व्यक्ति की मदद की अपील करते हैं लेकिन लोग बजाय उस व्यक्ति की मदद की न सिर्फ जमनालाल का मजाक उड़ाते हैं बल्कि उस व्यक्ति का विडियो बनाने लगते हैं। जमनालाल समझ जाते हैं कि अब उनकी मदद कोई नहीं करेगा। जमनालाल तुरन्त ऑटो करके घायल व्यक्ति को नजदीक के सरकारी अस्पताल में ले जाते हैं। डॉक्टर जमनालाल को धन्यवाद देते हुए कहता है - ‘‘गांव से आए लगते हो बाबाजी वरना इस शहर में तो कोई ऐसे घायल पड़े किसी व्यक्ति को अस्पताल नहीं लाता’’ जमनालाल को डॉक्टर के शब्द अन्दर तक बींध गए। जिस शहर में बसने के लिए जमनालाल ने इतने सपने देखे थे वो शहर ‘दूर का ढोल’ निकलेगा उन्होंने सोचा नहीं था। जमनालाल को अब शहर की चमचमाती सड़कों से गांव की धूल भरी कच्ची सड़कें कहीं बेहतर लग रही थी।
जमनालाल अपनी मानसिक दशा किसी पर जाहिर नहीं होने देना चाहते थे। यहां तक कि अपनी पत्नी पार्वती से भी इस बारे में कभी जिक्र नहीं करते। दरअसल जमनालाल नहीं चाहते थे कि उनके कारण उनके बेटों को कोई कष्ट हो। जमनालाल को शहर की ऊंची ऊंची ईमारतें भी आकर्षित नहीं करती थी। दरअसल जमनालाल ईमारतों के उस पार उस खुले आकाश को देखना चाहते थे जिसे उन ऊंची ऊंची ईमारतों ने ढक रखा था। घर के एयर कंडिशनर भी जमनालाल के भीतर की तपन को बुझा पाने में नाकाफी थे।
जमनालाल का मन अब शहर में नहीं लगता था, बेटों व पत्नी को इस बारे में बताकर कष्ट देना नहीं चाहते थे। ढंग से खाने - पीने का असर धीरे धीरे जमनालाल के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा। धीरे धीरे जमनालाल कमजोर पड़ते गए। ढंग से चल फिर नहीं पाने के कारण अब उनका सुबह का सैर सपाटा भी छूट गया। बेटों ने कई बार अस्पताल भी दिखाया लेकिन जमनालाल के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाने के बावजूद जमनालाल के स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ बल्कि लगातार कमजोर होते गए। दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते, किसी से अपनी पीड़ा नहीं कहते। पार्वती से जमनालाल की हालत देखी नहीं जाती। पार्वती को कहीं न कहीं जमनालाल की पीड़ा के कारण का आभास हो गया था। शाम को जब रमेश व राजेश काम से लौटे तो पार्वती ने कहा - ‘‘बेटा! मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी की बिमारी का ईलाज इस शहर में नही ं बल्कि गांव में है। दरअसल वो इस शहर के वातावरण से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे है। और तुम्हे तकलीफ नहीं हो इस कारण तुम्हे भी नहीं कहते है। एक बार मेरे कहने से उनको गांव ले चलो’’ दोनों बेटों को भी पार्वती की बात जंच गई । रमेश व राजेश ने जमनालाल व पार्वती सहित पूरे परिवार के लिए फ्लाईट के टिकट का इन्तजाम किया। कुछ ही घण्टों के सफर के बाद जमनालाल परिवार सहित नजदीकी शहर के एयरपोर्ट उतर चुके थे। एयरपोर्ट से गांव के लिए गाड़ी किराये पर कर ली। शहर से बाहर निकलते ही जमनालाल के शरीर में एक अलग ही ऊर्जा का संचार दिखाई दिया। अब तब उदास दिखने वाले जमनालाल के चेहरे पर धीरे धीरे चमक लौट रही थी। कोई दो घण्टे के सफर के बाद जमनालाल को गांव के कच्ची ईमारतें दिखने लग गई थी। जमनालाल को लग रहा था मानों बरसों बाद लौटो किसी बेटे के स्वागत में पिता बाहें पसार कर स्वागत में खड़ा हो। गाड़ी ज्यों ज्यों गांव के नजदीक जा रही थी जमनालाल के चेहरे की चमक बढ़ रही थी। दोनों बेटों को भी जमनालाल की बिमारी की वजह पता चल गई थी। कुछ ही देर में गाड़ी जमनालाल के घर के बाहर रूक गई। जिस जमनालाल को दोनों बेटों ने सहारा देकर गाड़ी में बिठाया वो जमनालाल बिना सहारे किसी छोटे बच्चे की तरह गाड़ी उतर अपने घर के दरवाजे की ओर भागे मानों कोई बालक अपनी मां के आंचल में छुपने को मचल रहा हो। जमनालाल ने वहां की मिट्टी को अपने माथे से लगा लिया। जो काम शहर के बड़े से बड़े डॉक्टर न कर से वो काम अपनी मिट्टी की खुशबु ने कर दिया था।
समाप्त
मिट्टी की खुशबू: भाग 2
कहानी : मिट्टी की खुशबू भाग - 2
गाड़ी अपने नियत समय पर थी सो सभी को ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। गाड़ी आते ही सभी अपनी अपनी बर्थ पर जाकर जम गए। गाड़ी जैसे ही स्टेशन छोड़कर रवाना हुई तो एक बारगी जमनालाल को लगा कि कहीं कुछ पीछे छूट रहा है लेकिन अपनी जमीन छोड़ने का गम नई जमीन पर बसने के उत्साह के नीचे दबकर रह गया। खिड़की के पास बैठे जमनालाल खिड़की से पेड़ों को पीछे की तरफ भागते देखते रहे। गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी। चाय, चना मसाला व अन्य सामान बेचने वालों की आवाजें ट्रेन में गूंजनी शुरु हो चुकी थी। जमनालाल भी पत्नी व बच्चों के साथ बातों में लग गए। बातें करते करते कब शाम हो गई पता हीनहीं चला। अन्धेरा अपनी चादर तान चुका था भोजनोपरान्त नीन्द ने भी नयन नगर में अपना डेरा जमा लिया था।
जमनालाल सुबह जल्दी उठ गए आखिर आज वो बैंगलोर पहुंचने वाले थे। चाय वालों का शोर गूंजना शुरू हो गया था। चाय पीकर जमनालाल खिड़की के पास जम गए। कुछ देर में परिवार के बाकी सदस्य भी उठ गए। दैनिक कर्म से निवृत हो सभी अपनी अपनी बर्थ पर जम गए। बातों के सिलसिले ने समय का पता नहीं चलने दिया और शाम होते होते गाड़ी बैंगलोर की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी। स्टेशन पर उतरते ही कुलियों व ऑटो वालों का शोर शुरु हो गया। राजेश उनको रीसीव करने स्टेशन पर पहले से ही खड़ा था। शहर के व्यस्त मार्गों से होते हुए राजेश सभी को घर लेकर आ गया। घर पर राजेश, उसकी पत्नी रेखा व बेटे प्रतीक ने सभी का भावभीना स्वागत किया। जमनालाल व पार्वती अपने बच्चों के इस प्रेम भरे बतार्व से अभिभूत हो गए।
जमनालाल को जल्दी उठकर सैर करने की आदत थी सो तड़के पांच बजे उठकर निकल पड़े। आस - पास की उंची ईमारतों को निहारते जमनालाल मन ही मन खुश हो रहे थे कि चलो गांव की धूल मिट्टी से निजात मिली। यहां तो तड़के भी सड़क पर गाड़ियां दौड़ती है, गांव में एक गाड़ी तक देखने को नहीं मिलती। हालांकि इस दौरान उन्हें हवा में वो ताजगी महसूस नहीं हुई जो गांव में हुआ करती थी लेकिन इन सबको दरकिनार कर जमनालाल सैर करते रहे। वापस आकर नहा धोकर एक घण्टा पूजापाठ करते फिर भोजन करते। कभी बोर होते तो बेटों के साथ दुकान चले जाते। दोनां बेटे भी जमनालाल व पार्वती की सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। कुल मिलाकर जमनालाल को किसी बात की कमी नहीं थी लेकिन इसके बावजूद जमनालाल पता नहीं क्यों इस शहरी जिन्दगी से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे। उन्हें अब सुबह के सैर सपाटे में भी वो आनन्द नहीं रहा। धीरे - धीरे शहरी भागमभाग की जिन्दगी से जमनालाल का मन ऊब गया था। शुरु से गांव के खुले मैदानों में रहे जमनालाल को शहर की तंग गलियों में घुटन होने लगी थी।
क्रमशः
Friday, 11 January 2019
कहानी : मिट्टी की खुशबू
कहानी : मिट्टी की खुशबू
भाग - 1
जमनालाल को रिटायर हुए दो वर्ष हो चुके थे। घर में जमनालाल व पत्नी पार्वती के सिवा कोई था नहीं। रिटायरमेन्ट के बाद जमनालाल को अकेलापन काटने को दौड़ता था। दो बेटे थे रमेश व राजेश, दोनों व्यापार के सिलसिले में बैंगलोर में ही बस गए थे। दोनों बेटों का धन्धा भी अच्छा चल रहा था। लक्ष्मीजी की भरपूर कृपा थी। कमी किसी बात की थी नहीं बस अब ये अकेलापन जमनादासजी को काटने को दौड़ता था। ऐसा नहीं था कि बेटे जमनालाल को अपने साथ नहीं रखना चाहते थे बल्कि उन्होंने तो कई बार आग्रह भी किया था लेकिन जमनालाल अपनी सरकारी नौकरी को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे।
हमेशा बुझे बुझे से रहने वाले जमनालाल आज बहुत खुश थे। उनका बेटा रमेश उन्हें लेने आ रहा था। जमनालाल व पार्वती दोनों ही उत्साहित थे। अब वे भी हमेशा बैंगलोर में रहेंगे, शहर की चमक दमक देखेंगे। आखिर उनके बेटों के शहर में बस जाने के बाद अब उनके लिए गांव में बचा ही क्या था। वैसे भी गांव में कोई सुविधा तो है नहीं, ना सड़क, ना बिजली। पांचवी के बाद पढ़ाई के लिए भी जमनालाल को पास के कस्बे में जाना पड़ा था जिसकी बदौलत ही वो सरकारी मुलाजिम बन सके। पार्वती ने भी रमेश के स्वागत के लिए तैयारियां कर रखी थी, उसकी मनपसन्द खीर, गोभी की सब्जी, पुरियां जो रमेश को पसन्द था सब बनाकर रखा था। जमनालाल की उत्सुकता चरम पर थी। कभी घड़ी की ओर देखते तो कभी दरवाजे की ओर। ये घड़ी भी ना हमेशा तो पांच बहुत जल्दी बजा देती है लेकिन आज जब उनके बेटे को पांच बजे आना है तो जानबूझकर धीरे चल रही है मानो जमनालाल का मुंह चिढ़ा रही हो। पौने पांच बजे जमनालाल कुर्सी लेकर दरवाजे के पास बैठ गए। लगभग आधे घण्टे बाद दूर से उनको गाड़ी आती हुई दिखाई देती है। गांव में वैसे तो कोई आता नहीं सो जमनालाल को पक्का भरोसा हो जाता है कि गाड़ी में उनका बेटा रमेश ही है। जमनालाल स्वागत के लिए बाहर जाते हैं। गाड़ी रूकते ही बेटा रमेश, बहु रमा व पोते-पोती उतरते हैं। सभी एक साथ जब जमनालाल को प्रणाम करने के लिए झुकते हैं तो जमनालाल को लगता है कि वहीं दुनिया के सबसे भाग्यशाली इन्सान हैं। पार्वती भी बेटे, बहु व पोते-पोतियों को देखकर फूली न समाती है।
रमेश को आए दो दिन हो गए थे। रमेश तीन दिन बाद की ही टिकटें कन्फर्म करवाकर आया था सो सभी को सुबह ही निकलना था। जमनालाल व पार्वती ने भी अपना सामान पैक कर लिया था आखिर उनको गांव की धूल - मिट्टी से अब निजात मिलने वाली थी। रेल्वे स्टेशन गांव से 20 किलोमीटर दूर था और 10 बजे की गाड़ी थी। पार्वती व बहु ने सुबह उठकर खाने का सामान पैक कर लिया था। टैक्सीवाला भी निश्चित समय पर आ गया था। जमनालाल व पार्वती हाथों में सामान व आंखों में सपने लिए गाड़ी में बैठ गए। घर को छोड़ते हुए एक बारगी जमनालाल की आंखे नम हो गई। गाड़ी के पिछले शीशे से जमनालाल अपने घर व गाँव को अपनी नजरों से ओझल होते हुए देखते रहे।