Saturday, 12 January 2019

मिट्टी खुशबू भाग 3

कहानी : मिट्टी की खुशबू भाग - 3
जमनालाल अब अनमने से रहने लगे। दोनों बेटे देर रात घर आते और सुबह काम पर निकल जाते। आस पड़ौस के तथाकथित सभ्य लोगों के साथ भी जमनालाल अपना तालमेल बिठाने में नाकाम रहे। एक बार जमनालाल जब घर के बाहर बाहर टहल रहे थे तो देखा कि उनके सामने एक कार एक व्यक्ति को टक्कर मारकर चली जाती है। खून से लथपथ व्यक्ति सड़क पर पड़ा तड़प रहा होता है लेकिन आस पास से गुजरने वाले लोग उसे इस तरह अनदेखा कर देते हैं मानों कुछ हुआ ही नहीं हो। जमनालाल दौड़कर वहां जाते हैं लोगों से उस घायल व्यक्ति की मदद की अपील करते हैं लेकिन लोग बजाय उस व्यक्ति की मदद की न सिर्फ जमनालाल का मजाक उड़ाते हैं बल्कि उस व्यक्ति का विडियो बनाने लगते हैं। जमनालाल समझ जाते हैं कि अब उनकी मदद कोई नहीं करेगा। जमनालाल तुरन्त ऑटो करके घायल व्यक्ति को नजदीक के सरकारी अस्पताल में ले जाते हैं। डॉक्टर जमनालाल को धन्यवाद देते हुए कहता है - ‘‘गांव से आए लगते हो बाबाजी वरना इस शहर में तो कोई ऐसे घायल पड़े किसी व्यक्ति को अस्पताल नहीं लाता’’ जमनालाल को डॉक्टर के शब्द अन्दर तक बींध गए। जिस शहर में बसने के लिए जमनालाल ने इतने सपने देखे थे वो शहर ‘दूर का ढोल’ निकलेगा उन्होंने सोचा नहीं था। जमनालाल को अब शहर की चमचमाती सड़कों से गांव की धूल भरी कच्ची सड़कें कहीं बेहतर लग रही थी।
जमनालाल अपनी मानसिक दशा किसी पर जाहिर नहीं होने देना चाहते थे। यहां तक कि अपनी पत्नी पार्वती से भी इस बारे में कभी जिक्र नहीं करते। दरअसल जमनालाल नहीं चाहते थे कि उनके कारण उनके बेटों को कोई कष्ट हो। जमनालाल को शहर की ऊंची ऊंची ईमारतें भी आकर्षित नहीं करती थी। दरअसल जमनालाल ईमारतों के उस पार उस खुले आकाश को देखना चाहते थे जिसे उन ऊंची ऊंची ईमारतों ने ढक रखा था। घर के एयर कंडिशनर भी जमनालाल के भीतर की तपन को बुझा पाने में नाकाफी थे।
जमनालाल का मन अब शहर में नहीं लगता था, बेटों व पत्नी को इस बारे में बताकर कष्ट देना नहीं चाहते थे। ढंग से खाने - पीने का असर धीरे धीरे जमनालाल के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा। धीरे धीरे जमनालाल कमजोर पड़ते गए। ढंग से चल फिर नहीं पाने के कारण अब उनका सुबह का सैर सपाटा भी छूट गया। बेटों ने कई बार अस्पताल भी दिखाया लेकिन जमनालाल के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाने के बावजूद जमनालाल के स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ बल्कि लगातार कमजोर होते गए। दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते, किसी से अपनी पीड़ा नहीं कहते। पार्वती से जमनालाल की हालत देखी नहीं जाती। पार्वती को कहीं न कहीं जमनालाल की पीड़ा के कारण का आभास हो गया था। शाम को जब रमेश व राजेश काम से लौटे तो पार्वती ने कहा - ‘‘बेटा!  मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी की बिमारी का ईलाज इस शहर में नही ं बल्कि गांव में है। दरअसल वो इस शहर के वातावरण से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे है। और तुम्हे तकलीफ नहीं हो इस कारण तुम्हे भी नहीं कहते है। एक बार मेरे कहने से उनको गांव ले चलो’’ दोनों बेटों को भी पार्वती की बात जंच गई । रमेश व राजेश ने जमनालाल व पार्वती सहित पूरे परिवार के लिए फ्लाईट के टिकट का इन्तजाम किया। कुछ ही घण्टों के सफर के बाद जमनालाल परिवार सहित नजदीकी शहर के एयरपोर्ट उतर चुके थे। एयरपोर्ट से गांव के लिए गाड़ी किराये पर कर ली। शहर से बाहर निकलते ही जमनालाल के शरीर में एक अलग ही ऊर्जा का संचार दिखाई दिया। अब तब उदास दिखने वाले जमनालाल के चेहरे पर धीरे धीरे चमक लौट रही थी। कोई दो घण्टे के सफर के बाद जमनालाल को गांव के कच्ची ईमारतें दिखने लग गई थी। जमनालाल को लग रहा था मानों बरसों बाद लौटो किसी बेटे के स्वागत में पिता बाहें पसार कर स्वागत में खड़ा हो। गाड़ी ज्यों ज्यों गांव के नजदीक जा रही थी जमनालाल के चेहरे की चमक बढ़ रही थी। दोनों बेटों को भी जमनालाल की बिमारी की वजह पता चल गई थी। कुछ ही देर में गाड़ी जमनालाल के घर के बाहर रूक गई। जिस जमनालाल को दोनों बेटों ने सहारा देकर गाड़ी में बिठाया वो जमनालाल बिना सहारे किसी छोटे बच्चे की तरह गाड़ी उतर अपने घर के दरवाजे की ओर भागे मानों कोई बालक अपनी मां के आंचल में छुपने को मचल रहा हो। जमनालाल ने वहां की मिट्टी को अपने माथे से लगा लिया। जो काम शहर के बड़े से बड़े डॉक्टर न कर से वो काम अपनी मिट्टी की खुशबु ने कर दिया था।
समाप्त

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