कहानी : मिट्टी की खुशबू
भाग - 1
जमनालाल को रिटायर हुए दो वर्ष हो चुके थे। घर में जमनालाल व पत्नी पार्वती के सिवा कोई था नहीं। रिटायरमेन्ट के बाद जमनालाल को अकेलापन काटने को दौड़ता था। दो बेटे थे रमेश व राजेश, दोनों व्यापार के सिलसिले में बैंगलोर में ही बस गए थे। दोनों बेटों का धन्धा भी अच्छा चल रहा था। लक्ष्मीजी की भरपूर कृपा थी। कमी किसी बात की थी नहीं बस अब ये अकेलापन जमनादासजी को काटने को दौड़ता था। ऐसा नहीं था कि बेटे जमनालाल को अपने साथ नहीं रखना चाहते थे बल्कि उन्होंने तो कई बार आग्रह भी किया था लेकिन जमनालाल अपनी सरकारी नौकरी को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे।
हमेशा बुझे बुझे से रहने वाले जमनालाल आज बहुत खुश थे। उनका बेटा रमेश उन्हें लेने आ रहा था। जमनालाल व पार्वती दोनों ही उत्साहित थे। अब वे भी हमेशा बैंगलोर में रहेंगे, शहर की चमक दमक देखेंगे। आखिर उनके बेटों के शहर में बस जाने के बाद अब उनके लिए गांव में बचा ही क्या था। वैसे भी गांव में कोई सुविधा तो है नहीं, ना सड़क, ना बिजली। पांचवी के बाद पढ़ाई के लिए भी जमनालाल को पास के कस्बे में जाना पड़ा था जिसकी बदौलत ही वो सरकारी मुलाजिम बन सके। पार्वती ने भी रमेश के स्वागत के लिए तैयारियां कर रखी थी, उसकी मनपसन्द खीर, गोभी की सब्जी, पुरियां जो रमेश को पसन्द था सब बनाकर रखा था। जमनालाल की उत्सुकता चरम पर थी। कभी घड़ी की ओर देखते तो कभी दरवाजे की ओर। ये घड़ी भी ना हमेशा तो पांच बहुत जल्दी बजा देती है लेकिन आज जब उनके बेटे को पांच बजे आना है तो जानबूझकर धीरे चल रही है मानो जमनालाल का मुंह चिढ़ा रही हो। पौने पांच बजे जमनालाल कुर्सी लेकर दरवाजे के पास बैठ गए। लगभग आधे घण्टे बाद दूर से उनको गाड़ी आती हुई दिखाई देती है। गांव में वैसे तो कोई आता नहीं सो जमनालाल को पक्का भरोसा हो जाता है कि गाड़ी में उनका बेटा रमेश ही है। जमनालाल स्वागत के लिए बाहर जाते हैं। गाड़ी रूकते ही बेटा रमेश, बहु रमा व पोते-पोती उतरते हैं। सभी एक साथ जब जमनालाल को प्रणाम करने के लिए झुकते हैं तो जमनालाल को लगता है कि वहीं दुनिया के सबसे भाग्यशाली इन्सान हैं। पार्वती भी बेटे, बहु व पोते-पोतियों को देखकर फूली न समाती है।
रमेश को आए दो दिन हो गए थे। रमेश तीन दिन बाद की ही टिकटें कन्फर्म करवाकर आया था सो सभी को सुबह ही निकलना था। जमनालाल व पार्वती ने भी अपना सामान पैक कर लिया था आखिर उनको गांव की धूल - मिट्टी से अब निजात मिलने वाली थी। रेल्वे स्टेशन गांव से 20 किलोमीटर दूर था और 10 बजे की गाड़ी थी। पार्वती व बहु ने सुबह उठकर खाने का सामान पैक कर लिया था। टैक्सीवाला भी निश्चित समय पर आ गया था। जमनालाल व पार्वती हाथों में सामान व आंखों में सपने लिए गाड़ी में बैठ गए। घर को छोड़ते हुए एक बारगी जमनालाल की आंखे नम हो गई। गाड़ी के पिछले शीशे से जमनालाल अपने घर व गाँव को अपनी नजरों से ओझल होते हुए देखते रहे।
Friday, 11 January 2019
कहानी : मिट्टी की खुशबू
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