कहानी : मिट्टी की खुशबू भाग - 2
गाड़ी अपने नियत समय पर थी सो सभी को ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। गाड़ी आते ही सभी अपनी अपनी बर्थ पर जाकर जम गए। गाड़ी जैसे ही स्टेशन छोड़कर रवाना हुई तो एक बारगी जमनालाल को लगा कि कहीं कुछ पीछे छूट रहा है लेकिन अपनी जमीन छोड़ने का गम नई जमीन पर बसने के उत्साह के नीचे दबकर रह गया। खिड़की के पास बैठे जमनालाल खिड़की से पेड़ों को पीछे की तरफ भागते देखते रहे। गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी। चाय, चना मसाला व अन्य सामान बेचने वालों की आवाजें ट्रेन में गूंजनी शुरु हो चुकी थी। जमनालाल भी पत्नी व बच्चों के साथ बातों में लग गए। बातें करते करते कब शाम हो गई पता हीनहीं चला। अन्धेरा अपनी चादर तान चुका था भोजनोपरान्त नीन्द ने भी नयन नगर में अपना डेरा जमा लिया था।
जमनालाल सुबह जल्दी उठ गए आखिर आज वो बैंगलोर पहुंचने वाले थे। चाय वालों का शोर गूंजना शुरू हो गया था। चाय पीकर जमनालाल खिड़की के पास जम गए। कुछ देर में परिवार के बाकी सदस्य भी उठ गए। दैनिक कर्म से निवृत हो सभी अपनी अपनी बर्थ पर जम गए। बातों के सिलसिले ने समय का पता नहीं चलने दिया और शाम होते होते गाड़ी बैंगलोर की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी। स्टेशन पर उतरते ही कुलियों व ऑटो वालों का शोर शुरु हो गया। राजेश उनको रीसीव करने स्टेशन पर पहले से ही खड़ा था। शहर के व्यस्त मार्गों से होते हुए राजेश सभी को घर लेकर आ गया। घर पर राजेश, उसकी पत्नी रेखा व बेटे प्रतीक ने सभी का भावभीना स्वागत किया। जमनालाल व पार्वती अपने बच्चों के इस प्रेम भरे बतार्व से अभिभूत हो गए।
जमनालाल को जल्दी उठकर सैर करने की आदत थी सो तड़के पांच बजे उठकर निकल पड़े। आस - पास की उंची ईमारतों को निहारते जमनालाल मन ही मन खुश हो रहे थे कि चलो गांव की धूल मिट्टी से निजात मिली। यहां तो तड़के भी सड़क पर गाड़ियां दौड़ती है, गांव में एक गाड़ी तक देखने को नहीं मिलती। हालांकि इस दौरान उन्हें हवा में वो ताजगी महसूस नहीं हुई जो गांव में हुआ करती थी लेकिन इन सबको दरकिनार कर जमनालाल सैर करते रहे। वापस आकर नहा धोकर एक घण्टा पूजापाठ करते फिर भोजन करते। कभी बोर होते तो बेटों के साथ दुकान चले जाते। दोनां बेटे भी जमनालाल व पार्वती की सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। कुल मिलाकर जमनालाल को किसी बात की कमी नहीं थी लेकिन इसके बावजूद जमनालाल पता नहीं क्यों इस शहरी जिन्दगी से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे। उन्हें अब सुबह के सैर सपाटे में भी वो आनन्द नहीं रहा। धीरे - धीरे शहरी भागमभाग की जिन्दगी से जमनालाल का मन ऊब गया था। शुरु से गांव के खुले मैदानों में रहे जमनालाल को शहर की तंग गलियों में घुटन होने लगी थी।
क्रमशः
Saturday, 12 January 2019
मिट्टी की खुशबू: भाग 2
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