कहानी : दरकते रिश्ते
‘‘कितनी देर तक पढ़ोगे बेटा’’. चाय का ग्लास पकड़ाते हुए रूक्मिणी ने विवेक से पूछा ‘‘माॅं अभी दस बजे हैं, बारह बजे तक तो पढूंगा’’। विवेक रूक्मिणी व राधेश्याम का इकलौता लड़का था। एक लड़की थी जिसका विवाह कर दिया था। अब राधेश्याम का बस एक ही सपना था, किसी तरह विवेक की नौकरी लग जाये तो एक अच्छी सी लड़की देखकर उसका विवाह कर दें। विवेक भी स्नातक की परीक्षा पास कर चुका था। दो - तीन कम्पीटीशन एक्जाम भी दिये लेकिन अभी सफलता हाथ नहीं लगी । कल उसका रेलवे का पेपर है उसी की तैयारी में लगा हुआ था। पढ़ते पढ़ते जब पलकों पर नीन्द का बोझ बढ़ने लगा तो किताबें समेट कर सो गया।
सुबह विवेक को नाश्ता करवाकर रूक्मिणी ने अपने हाथों से दही और गुड़ खिलाया। दरअसल इस ‘अन्धविश्वास ’ में भी एक माँ का ‘विश्वास’ था। माता-पिता को प्रणाम कर विवेक शहर के लिये निकल गया। रूक्मिणी विवेक को दूर तलक जाते हुए देखती रही जब तक कि वो उसकी आंखों से ओझल न हो गया। विवेक के जाने के बाद वो अपने काम में लग गयी। काम करती जाती साथ ही ईश्वर से विवेक की सफलता की प्रार्थना भी।
शाम को विवेक लौटा तो उसका चेहरा खिला हुआ था। घर आते ही मां को बाहों में भरकर झूम उठा ‘‘माँ, आज तो पूछ मत, पेपर इतना शानदार गया कि अबकी बार तेरे बेटे की नौकरी पक्की है।’’ विवेक को इतना खुश देख रूक्मिणी भी प्रसन्न थी और राधेश्याम भी। विवेक को इस बार पूरा विश्वास था कि उसका चयन अवश्य होगा अब उसे इन्तजार था तो परिणाम का।
लगभग महीने भर बाद जब परिणाम आये तो विवेक की आशाओं के अनुरूप ही आये। विवेक का रेलवे में चयन हो गया था। जल्द ही नियुक्ति पत्र भी मिल जायेगा। रूक्मिणी व राधेश्याम की खुशी का पारावार न था। इससे बढ़कर उनके लिये और खुशी क्या बात हो सकती थी। बधाई सन्देश आने लग गये। मित्रों ने राधेश्याम से बेटे की नौकरी की खुशी में स्नेहभोज की मांग की जिसे राधेश्याम ने सहर्ष स्वीकारा भी।
नौकरी लगते ही विवेक के लिये रिश्ते भी आने लग गये। पड़ौस के गांव के रामधनजी की पुत्री लीला से विवेक का विवाह भी तय हो गया। अगले महीने विवेक का विवाह था। विवाह की तैयारियां होने लगी। निमंत्रण पत्र छपवाकर मित्रों व रिश्तेदारों को भेजे गये। घर में नया रंग रोगन हुआ। राधेश्याम विवाह बड़ी धूमधाम से करना चाहते थे जिससे रिश्तेदारों में उनका कद और ऊंचा हो। और करें भी क्यों नहीं इकलौता बेटा वो भी अब सरकारी मुलाजिम था। नियुक्ति पत्र न मिला तो क्या? वो तो आज कल में मिल ही जायेगा। अब किसी बात की चिन्ता न थी। विवाह की भव्यता देख मित्र व रिश्तेदार प्रशंसा करते न थकते थे। राधेश्याम ने जैसा सोचा था वैसे ही ठाट बाट से विवेक का विवाह हुआ और नव वधू का आगमन हो गया।
लीला के आने से घर में रौनक आ गयी थी। रूक्मिणी लीला का माँ की तरह ध्यान रखती। लीला भी सास - ससुर की अपने माता-पिता समझकर सेवा करती। विवेक भी लीला के व्यवहार से प्रसन्न था। इसी दौरान विवेक का नियुक्ति पत्र आ गया । उसे अहमदाबाद में नियुक्ति मिली थी और एक हफ्ते में उसे उपस्थिति देनी थी। नया शहर था सो ये तय हुआ कि विवेक फिलहाल अकेला ही जायेगा। कुछ माह में जब सब व्यवस्थित हो जायेगा और रहने की जगह भी मिल जायेगी तो वो लीला को भी ले जायेगा। नियुक्ति पत्र मिलने के दो दिन बाद ही विवेक अहमदाबाद के लिये निकल गया। वहां अस्थायी रूप से कमरा किराये पर ले लिया। दो महीने में एकाध बार घर आ जाता।
थोड़े दिनों बाद विवेक को सरकार की तरफ से क्वार्टर मिल गया। स्थायी व्यवस्था होते ही विवेक लीला को भी अपने साथ ले गया। अब राधेश्याम व रूक्मिणी फिर से अकेले हो गये। विवेक व लीला महीने भर में एकाध बार आ जाते। राधेश्याम व रूक्मिणी भी अब खुश थे कि चलो उनके बेटे के भविष्य को लेकर अब किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रही।
समय बीतता गया। विवेक शुरूआत में महीने में एकाध बार आने वाला विवेक अब पांच - छह माह में ही आ पाता वो भी रूक्मिणी व राधेश्याम के जोर देने पर। शायद शहर की चकाचैंध छोड़कर गांव जाने का मन अब विवेक का भी नहीं होता था। रूक्मिणी से ज्यादा राधेश्याम को अब घर का सन्नाटा काटने को दौड़ता लेकिन कभी इसे जाहिर नहीं करता। विवेक का आना जाना अब बेहद कम हो गया। कभी कभार फोन पर ही बात होती थी।
इसी दौरान एक दिन विवेक का फोन आया कि राधेश्याम अब दादा बन गया है, उसके पोता हुआ है । राधेश्याम का मुरझाया चेहरा खिल उठा मानों बरसों से प्यासे मरुस्थल पर पहली बार बारीश की बून्दें पड़ी हो। रूक्मिणी व राधेश्याम की खुशी का पारावार न रहा। वे खुश भी क्यों न हो आखिरकार ‘ब्याज हमेशा मूलधन से अधिक प्रिय जो होता है’। रूक्मिणी व राधेश्याम अब दिन भर पोते की ही बातें करते, सपने बुनते, ‘‘लीला कह रही थी कि बिल्कुल अपने पिता पर गया है। पोते का नाम भी रख दिया था ‘वैभव’ ’। राधेश्याम से जब रहा न गया तो एक दिन विवेक से फोन पर कह ही दिया कि वो अहमदाबाद आ जाये क्या? लेकिन विवेक ने ये कहकर मना कर दिया कि लीला की तबियत थोड़ी ठीक हो जाये तो वो खुद ही गांव आ जायेगा।
ऐसे ही छह माह बीत गये, विवेक कभी छुट्टी का बहाना बनाता तो कभी तबियत ठीक नहीं होने का। पोते को देखने की लालसा में राधेश्याम उदास रहने लगा। उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा लेकिन रूक्मिणी ने विवेक को बताना उचित नहीं समझा। दिन - ब - दिन राधेश्याम की तबियत बिगड़ने होने लगी। एक रात राधेश्याम को अचानक खून की उल्टियां होने लगी। पड़ौसियों की मदद से रूक्मिणी राधेश्याम को तुरन्त अस्पताल ले गयी। राधेश्याम को अस्पताल में भर्ती करवाकर विवेक को फोन किया।
पिता की ऐसी हालत सुन विवेक को अपने किये पर बहुत पश्चाताप हुआ, फोन पर रोने लगा उसके बस में होता तो तुरन्त पंख लगाकर अपने पिता के पास पहुंच जाता लेकिन ऐसा सम्भव न था। वो रात की ट्रेन पकड़कर लीला व बच्चे को साथ लेकर गांव के लिये निकल गया। सफर का एक - एक घण्टा उस पर दिन के समान बीतता। दूसरे दिन दोपहर तक वो अपने गांव पहुंच गया । ट्रेन से उतरते ही तुरन्त अस्पताल पहुंचा जहां राधेश्याम भर्ती था।
विवेक व लीला को देखते ही राधेश्याम के उदास चेहरे पर चमक लौट आयी। लगभग निर्जीव पैरों में जान लौट आयी और खड़ा होकर बांहें फैला दी। विवेक ने तुरन्त ‘वैभव’ को राधेश्याम के हाथों में दे दिया और राधेश्याम ने उसे अपने सीने से लगा लिया। चारों की आंखों से आंसूओं की धार बह निकली जिसमें सारे गिले - शिकवे बह गये।
जो काम और डाॅक्टरों की दवाईयां न कर सकी वो काम उस बच्चे के आलिंगन ने कर दिया था।
....समाप्त
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