Tuesday, 16 December 2025

खाना और खिलाना

सुना है कुछ ‘पत्रकारों’ ने  ‘कुछ नेताओं’ का स्टिंग ऑपरेशन कर लिया है जिसमें दावा किया जा रहा है कि नेताजी ‘खाते’ हैं। तो इसमें कौनसी नई बात है। नेताजी अगर ‘खाते’ हैं तो चुनावों से पहले ‘खिलाते’ भी तो हैं। वैसे भी वो अकेले तो खाते नहीं।  नेताजी के खाने के बाद जो बच जाता है उसे प्रसाद मानकर बांट भी तो दिया जाता है। इस प्रकार से नेताजी खाते भी हैं और खिलाते भी हैं। और खाने खिलाने का दौर कोई नया तो है नहीं। पत्रकार महोदय ने जो विडियो बनाया है वो तो जनता को पहले से पता है नेताजी खाते हैं। दरअसल नेता बना ही इसीलिये जाता है कि ‘जमकर खाया’ जा सके। जो ‘खा’ नहीं सके उसको कभी चुनाव लड़वाया ही नहीं जाता है। ऐसे आदमी को चुनाव जितवाने में किसी का कोई फायदा भी नहीं है। क्योंकि जो खुद नहीं खा सकता वो दूसरों को क्या खिलायेगा। सच्चा नेता वही है जो ‘खाये और खिलाये ’ और इस प्रकार ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज पर ‘चमचैव कुटुम्बकम’ की परम्परा को जीवित बनाये रखे। इसलिये नेताजी के खाने पर इतना गम्भीर होने की आवश्यकता नहीं है। अब नेता कोई भगवान तो है नहीं कि मात्र भोग लगाने से काम चल जायेगा। खाने की मात्रा भी नेताओं के कद पर निर्भर करती है। ज्यों - ज्यों नेताजी का कद बढ़ता जोयगा त्यों - त्यों उनके खाने और पचाने की क्षमता भी बढ़ती जायेगा। जो जितना बड़ा नेता होगा वो उतना ही अधिक खायेगा। छोटा नेता कम खायेगा लेकिन खायेगा जरूर। क्योंकि बिना खाये जीवित नहीं रहा जा सकता है। वैसे खाने और खिलाने का दौर राजनीति तक ही सीमित नहीं है। सरकारी दफ्तरो में भी कुछ खिलाये बिना फाईल आगे नहीं सरकती। इतना ही नहीं। फलां आदमी  ने ‘खाया है’ इसका मुकदमा दर्ज करने के लिये कोर्ट में भी ‘खिलाना और पिलाना’ पड़ता ही है।  वैसे भी हमारे यहां यह ‘खिलाना और पिलाना’ इतना सामान्य हो चुका है कि हम इसे ‘अपराध’ मानते ही नहीं बल्कि खाने वाले का हक मानते हैं कि -‘इतना तो बिचारा खायेगा ही’ इसलिये खाने और खिलाने के छोटे मोटे विडियो पर इतनी हाय तौबा मचाने की आवश्यकता नहीं है। यह तो अब हमारी सभ्यता का हिस्सा बन गयी है। यदि कोई व्यक्ति नहीं खाता है तो एसे हीन दृष्टि से देखा जाता है। ‘खाने वाले ’ लोगों के बच्चों की शादिया भी जल्दी हो जाती है वहीं नहीं खाने वाले लोगों को घर वाले भी ताना देते हुए कहते हैं - ‘फलां को देखो कितना खाता है तुम क्यों नहीं खा लेते कुछ’ दरअसल आज के दौर में ‘खा लेना’ प्रतिष्ठा की बात बन गयी है इसलिये ‘खाने वाले’ नेताओं की प्रशंसा कीजिये वो वाकई प्रशंसा के लायक है।

Monday, 20 October 2025

वनों का दुख

अयोध्या के युवराज राम को राज्याभिषेक के स्थान पर चौदह वर्ष का कठोर वनवास मिल चुका था। और राम ने वनवास को भी उसी प्रसन्नता और सहजता से स्वीकार कर लिया जैसे वे राज्य का वैभव स्वीकार कर रहे थे। यही तो ‘राम’ होना है। राम ने बिना एक क्षण गंवाए राजसी वेश त्याग तपस्वी वेश धारण वन के लिये प्रस्थान किया तो परछाई की भांति सीता और लक्ष्मण भी पीछे - पीछे रवाना हो गये। सीता के लिये जहां राम वहीं अयोध्या थी तो लक्ष्मण के लिये राम मानो आता जाता श्वांस थे। तीनों जब तपस्वी वेश में रथ पर बैठकर अयोध्या की विथियों से निकले तो हजारों हृदय मानों फट पड़े और उनके उद्गार आंखों से निकल पड़े। अयोध्या में केवल कैकई व मंथरा प्रसन्न थी तो नभ में देवता बहुत उत्साहित थे आखिर जिस कार्य के लिये राम ने अवतार लिया था वे उसकी ओर कदम बढ़ा चुके थे। किन्तु इनके अतिरिक्त भी कोई और प्रसन्न था। वे थे ‘वन’ जहां राम को चौदह वर्ष बिताने थे। सम्पूर्ण वन प्रदेश उल्लासित था। हजारों वर्षों की घोर तपस्या के बाद भी जिनका ‘क्षण मात्र’ का ही सानिध्य मिलता है वे राम पूरे चौदह वर्षों के लिये वन में रहने के लिये आ रहे थे इस बात से वन फूले नहीं समा रहे थे। वृक्ष अपनी डालियों पर मधुर फल लेकर मानों राम की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। पौधों पर नये फूल आ गये थे। नदियों का जल पहले से अधिक स्वच्छ और मीठा हो चुका था। वायु अद्भुत सुगंध लेकर बह रही थी जो आज से पहले किसी ने अनुभव नहीं की थी। पर्वतों ने नया श्रृंगार कर लिया था। कंद - मूल मानों करबद्ध सेवा में खड़े थे कि कब राम अपने हाथों से स्पर्श कर उन्हें कृतार्थ करें। वन की धरती अपनी कठोरता त्याग फूलों की तरह कोमल हो चुकी थी कि कब राम अपने ‘पावन’ चरणों से उन्हें कृतार्थ करें। घास तो मानों महलों के रशमी गद्दों का भी तिरस्कार कर रही थी। शबरी के बरसों से बिछ रहे फूलों को पावन चरणों का स्पर्श मिलने वाला था। ‘शरभंग’ ऋषि अपनी सांसों की डोर केवल ‘राम’ के दर्शन के लिये ही पकड़े हुए थे और उनके दर्शनों के लिये कई बार इन्द्र को भी खाली लौटा दिया था जो उन्हें सशरीर स्वर्ग ले जाने के लिये अपना विमान लेकर आये थे। हनुमान को अपने स्वामी के तो सुग्रीव को ‘परमसखा’ मिलने वाले थे। 
राम चौदह वर्षों तक वन में रहे तो उस समय वह वन प्रदेश इन्द्र की ‘अमरावती’ का भी तिरस्कार करता सा प्रतीत होता था। देवताओं को मन ही मन ईर्ष्या होती कि काश वो उस वन प्रदेश का कोई वृक्ष ही रहे होते । 
आज चौदह वर्षों बाद जब राम अयोध्या लौट रहे रहे हैं तो तीनों लोक प्रसन्न है। देवताओं का कार्य पूरा हो चुका है। अयोध्या का अपूर्व श्रृंगार किया गया है। अट्टालिकाओं पर नवीन ध्वज लगाये गये हैं। विथियों के दोनों ओर दीपक जलाये गये हैं। भवनों पर नवीन रंग - रोगन किया गया है। सभी आंखों एक टक नभ की ओर ही लगी है न जाने कौन से क्षण राम आएंगे। एक क्षण भी अब एक वर्ष सा प्रतीत हो रहा है। 
 एक ओर जहां अयोध्या में नवीन उल्लास का संचार है वहीं वनों में मायूसी छायी है। राम अब वनों को त्याग देंगे इस बात से वन बहुत ही दु:खी हैं। नदियां अपना स्वाभाविक बहाव भूल चुकी है। पुष्प मुरझा चुके हैं। वृक्ष सूख चुके हैं। घास कुम्हला चुकी है। पर्वत मानों वीरान हो चुके हैं। वन्यजीवों ने भोजन करना छोड़ दिया है। तीनों लोक प्रसन्न है किन्तु वन बहुत दु:खी हैं। अब उन्हें राम के दर्शन नहीं हो पाएंगे। अयोध्या की प्रसन्नता पर सबकी दृष्टि है किन्तु वनों का दु:ख किसी को दिखाई नहीं दिया।

Sunday, 10 August 2025

आधुनिक पुरुष की समय यात्रा

अपने अद्भुत बुद्धिबल व विज्ञान के नित नये आविष्कारोंं से मानव उस स्थिति में आ पहुंचा जहां उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं रह गया। वह अब आकाश में उन्मुक्त विचरण कर सकता था तो समुद्र की अथाह गहराईयों को नाप सकता था। चन्द्रमा पर भी उसने अपने चरण चिन्ह छोड़ दिये थे। कुछ ही घण्टों में पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा सकता था। अत्याधुनिक मशीनों से पहाड़ के पहाड़ काट सकता था। अपने बुद्धिबल के अहंकार में मानव ‘बुद्धि के परम स्त्रोत’के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लगाने लग गया। लम्बे समय के पश्चात उसने समय के आर - पार जाने वाली मशीन भी आविष्कृत कर ली। एक दिन बैठे - बैठे उसने सोचा आखिरकार अपने पूर्वजों से मिलकर उन्हें अपनी प्रगति के बारे में बताउं तो उन्हें कितनी खुशी होगी? यह सोचकर वह एक महिला के साथ उस विशेष यन्त्र की सहायता से उस दौर में पहुंच गया जब मानव वनों में या नदियों के किनारे प्रकृति के बीच ही रहा करता था। जहां तक दृष्टि जाती वहां तक उसे हरे - भरे वृक्ष या हरियाली ही नजर आती। उसे यह देखकर बहुत दु:ख हुआ कि उनके पूर्वज गगनचुम्बी अट्टालिकाओं व भव्य भवनों के स्थान पर घास - फूस की झौंपड़ियों में रहते थे। किन्तु इस दौर की पृथ्वी बहुत मनोहारी थी। स्वच्छ जल से भरी कल - कल बहती नदियां व हरे भरे वृक्ष उन्हें बर - बस मोह लेते थे। 
ऐसे ही विचरण करते हुए वे एक झौंपड़ी में पहुंच गये जहां किसी विवाहित जोड़े से भेंट हो गयी। पहले तो व‍ह विवाहित जोड़ा उन्हें देखकर घबरा गया किन्तु समझाने पर भरोसा हुआ कि वह उन्हीं के भविष्य से आया है।
आधुनिक पुरुष अहंकार पूर्वक बोला - ‘‘देखो तुम्हारे दौर से होते हुए आधुनिक दौर तक मैंने कितनी प्रगति कर ली है। अब मैं न केवल जल - थल - नभ में स्वच्छन्द विचरण कर सकता हुं बल्कि भविष्य से अतीत में आ पहुंचा हूँ आप लोगों को बताने कि मैं ने कितनी प्रगती कर ली है। अब मैं कहां से कहां पहुंच चुका हू¡।
पुरातन पुरुष बोला - ‘‘तुम्हारी प्रगति तो मुझे दिखाई दे ही रही है इससे मुझे बहुत प्रसन्नता है, तुम्हारी प्रगति से लगता है तुम्हारे दौर की पृथ्वी हमारे दौर से भी कहीं अधिक सुन्दर होगी, क्या तुम्हारे समय की नदियों में भी इतना ही निर्मल जल बहता है। क्या तुम्हारे दौर की हवा में भी इसी तरह फूलों की सुगन्ध समायी रहती है। तुम्हारी प्रगति के अनुसार तुम्हारे दौर की पृथ्वी इससे भी अधिक हरी - भरी और सुन्दर होगी, सही कहा ना?’’
आधुनिक पुरुष को पुरातन पुरुष से ऐसे प्रश्नों की उम्मीद नहीं थी वह सकुचा गया और बोला - ‘‘हमारे दौर की नदियों में इतना शुद्ध जल नहीं है अपितु इससे अधिक गन्दी हो चुकी है किन्तु हमने जल शुद्ध करने के यन्त्र बना लिय हैं। तुम्हारे दौर की हवा तो बहुत शुद्ध है। हमारे दौर में तो हवा भी दूषित हो चुकी है। नवीन नगरों व रास्तों के निर्माण व विकास के लिये बहुत से हरे - भरे क्षेत्र को भी हमें वन विहीन करना पड़ा किन्तु यह सब तो विकास की प्रक्रिया है’’
पुरातन पुरुष आश्चर्य से बोला - ‘‘अच्छा फिर तुम्हारे समय का विकास तो अद्भुत है, अच्छा यह बताओ तुम लोग रहते तो प्रेम से हो ना कहीं झगड़ते तो नहीं?’’
आधुनिक पुरुष बोला - ‘‘हमार दौर में साम्प्रदायिक झगड़े बहुत अधिक है। साम्प्रदायिक कट्टरता में मानव मानव का ही दुश्मन बन बैठा है, युद्ध की विभिषिका से इस समय समूचा विश्व गिरा हुआ है। हथियारों के दौड़ में हमने इतने विनाशकारी हथियार बना लिये हैं कि अब उनकी सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हो गया है। यदि किसी गलत हाथों में पड़ गये तो पल भर में ही पृथ्वी को नष्ट कर सकते हैं’’
पुरातन पुरुष इस बार गम्भीर था, बोला - ‘‘विकास की दौड़ में तुम अपने ही विनाश का सामान बना बैठे, यह तो विकास नहीं हुआ, अच्छा जरा यह बताओ अपनी संस्कृति को सहेज रखा है या उसे भी विकास की भेंट चढा बैठे?’’
आधुनिक पुरुष निरूत्तर सा हो चुका था, बोला - ‘‘संस्कृतियों को सहेजने के लिये हमारे पास समय ही नहीं है। हम अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि इसके बारे में सोच ही नहीं पाते, विवाह परम्परा तो लगभग समाप्ति की ओर है, युवा मादकता व व्याभिचारिता में आकण्ठ डूबे हैं। नास्तिकों की संख्या भी निरन्तर बढ़ रही है’’
पुरातन पुरुष आधुनिक पुरुष के साथ आई महिला की तरफ ईशारा करके बोला - ‘‘क्या तुम्हारे समय की सारी महिलाएं अपनी इच्छा से इस प्रकार के अमर्यादित वस्त्र पहनती है या तुम लोगो ने इन्हें बाध्य कर रखा है?’’
आधुनिक पुरुष बोला - ‘‘हम तुम्हारी दकियानूसी नहीं है। हमारे दौर में महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। तुम्हारे दौर की तरह हम उन्हें ‘देवी’ का दर्जा नहीं देते । हमारे दौर की महिलाएं मात्र ‘भोग्या’ है और यह बात उनके मन मस्तिष्क में इस तरह बैठ चुकी है कि यदि कोई इन्हें मर्यादा में रहने को कह भी दें तो ये खुद उनका कड़ा विरोध कर देंगी, हमें कहने की आवश्यकता ही नहीं होगी’’
इस बार पुरातन पुरुष का धैर्य टूट चुका था, वह क्रोधित हो उठा और बोला - ‘‘तुम जिस विकास का ढिंढोरा पीटने के लिये आये हो वो विनाश के अतिरिक्त् कुछ नहीं है। तुमने समूची पृथ्वी का वातावरण दूषित कर दिया। पवित्र नदियों के निर्मल जल को गंदा करने का पाप कर डाला। हवा तक को दूषित कर डाला। अपने संस्कारों व मूल्यों को भी भूला दिया। महिलाओं को ‘भगवती’ से ‘भोग्या’ बना दिया। आपसी सौहार्द्र खत्म कर दिया। पूरी पृथ्वी को समाप्त करने के विनाशकारी हथियार बनाकर बैठे हो। यदि इन सबको तुम‘विकास’ कहते हो तो फिर ‘विनाश’ की परिभाषा क्या होगी? इससे पहले कि मैं तुम्हे शाप दूं, मेरे सामने से चले जाओ? 
आधुनिक पुरुष घबरा गया और अपने वर्तमान युग में लौट आया। उसका अहंकार अब चूर हो चुका था। विकास के तमाम आधुनिक यन्त्र अब उसे विषैले सर्पों की भांति दिखाई दे रहे थे जो दिन - प्रतिदिन मानवता को डस रहे थे।

Sunday, 13 April 2025

पहने मृगछाला तरूणी अहो

पहने मृगछाला तरूणी अहो
नयनों से शर संधान करे
क्षत हो सुध यूं बिसराये कि
अब कौन हृदय का ध्यान धरे



Wednesday, 3 July 2024

तस्वीरी खयाल : बेफिक्री छत पर पसरी है


 हर खाली सिर लादे बैठा देखो चिंता की गठरी है
हंसते चेहरों के पीछे भी समझौतों की एक लड़ी है
युग से आंखें बाट देखती नीन्द का पंछी लौट ना पाया
व्याकुलता गद्दों पर जागे बेफिक्री छत पर पसरी है

Thursday, 6 June 2024

जाओ तुमको मुक्त कर दूं

प्रेम गर स्वीकार ना हो
तुमको मुझसे प्यार ना हो
प्रेम के पथ पर अकेला
तुम कहो तो कूच कर दूं
जाओ तुमको मुक्त कर दूं

क्या भला है दोष मेरा
रह न पाउं बिन तुम्हारे
काटने को दौड़ती है
ये छतें औ ये दीवारें
क्या तुम्हे स्वीकार मैं
तन्हाई से अनुबन्ध कर दूं
जाओ तुमको मुक्त कर दूं

सुन लिया करती थी तुम तो
बोलती जो मेरी आंखें
आज क्यूं सुनती नहीं हो
इस हृदय की मौन चीखें
पर कहां सम्भव हृदय से
प्रेम का ही अन्त कर दूं
जाओ तुमको मुक्त कर दूं

प्रेम का मेरे भले ही
आज तुमको मोल ना हो
और इन होठो पे कोई
प्रेम के भी बोल ना हो
प्रेम से पाषाण को भी
आज मैं द्रवीभूत कर दूं
जाओ तुमको मुक्त कर दूं

Tuesday, 22 August 2023

टिकट

 'टिकट'

उसे किसी ने कह दिया है कि तुम्हारा टिकट पक्का है। ऊपर से बात हो गयी है। एक बारगी तो आदमी 'ऊपरवाले' को जान ले लेकिन यह जो राजनीति का 'ऊपरवाला' है इसके बारे में अभी तक शोध जारी है। आश्वासन मिलने के बाद से ही उसके रंग बदले हुए हैं। उसके बदले रंग देखकर गिरगिटों को अस्तित्व संकट अनुभव होने लगा। उसने तुरन्त दर्जन भर खादी के ​कुरते पायजामे सिलवा लिये। भावशून्य चेहरे पर अब सदैव बनावटी मुस्कान बिखरी रहती व हाथ हमेशा नमस्कार की मुद्रा में जुड़े रहते। रिश्तेदारों व मित्रों से पैसों का जुगाड़ कर लिया। बाकी कसर जमीन बेच कर पूरी कर ली। क्षेत्र के कुछ अति चतुर लोग उसकी महत्वाकांक्षा को ताड़ गये थे वे अब उसके साथ हो लिए। ये लोग अपने नेता की झूठी तारीफ (चालपूसी) से ऐसा माहौल बनाये रखते कि वह उससे आगे कुछ देख ही नहीं पाता। बदले में वह  उनके खाने — पीने सहित तमाम खर्चे उठाता। सभाओं का दौर शुरू हो गया। उसने क्षेत्र के विकास के लिए अपना घोषणा पत्र भी जारी कर दिया। क्षेत्र में चारों तरफ बैनर व होर्डिंग टंग गये जिसमें उसे 'गरीबों का मसीहा' 'जननायक' जैसे कई उपनामों से सम्बोधित किया गया था। वह अब अपने आपको 'विधायक' मान चुका था।

इसी बीच पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी जिसमें उसका कहीं नाम न था। जिस 'ऊपरवाले' ने आश्वासन दिया था वह अब सम्पर्क क्षेत्र से बाहर था। हमेशा वह जिन लोगों से गिरा रहता वे लोग अब असली उम्मीदवार के साथ थे। सपनों की इबारत ढह चुकी थी जिसके मलबे तले वह स्वयं दबा पड़ा था।