अपने अद्भुत बुद्धिबल व विज्ञान के नित नये आविष्कारोंं से मानव उस स्थिति में आ पहुंचा जहां उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं रह गया। वह अब आकाश में उन्मुक्त विचरण कर सकता था तो समुद्र की अथाह गहराईयों को नाप सकता था। चन्द्रमा पर भी उसने अपने चरण चिन्ह छोड़ दिये थे। कुछ ही घण्टों में पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा सकता था। अत्याधुनिक मशीनों से पहाड़ के पहाड़ काट सकता था। अपने बुद्धिबल के अहंकार में मानव ‘बुद्धि के परम स्त्रोत’के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लगाने लग गया। लम्बे समय के पश्चात उसने समय के आर - पार जाने वाली मशीन भी आविष्कृत कर ली। एक दिन बैठे - बैठे उसने सोचा आखिरकार अपने पूर्वजों से मिलकर उन्हें अपनी प्रगति के बारे में बताउं तो उन्हें कितनी खुशी होगी? यह सोचकर वह एक महिला के साथ उस विशेष यन्त्र की सहायता से उस दौर में पहुंच गया जब मानव वनों में या नदियों के किनारे प्रकृति के बीच ही रहा करता था। जहां तक दृष्टि जाती वहां तक उसे हरे - भरे वृक्ष या हरियाली ही नजर आती। उसे यह देखकर बहुत दु:ख हुआ कि उनके पूर्वज गगनचुम्बी अट्टालिकाओं व भव्य भवनों के स्थान पर घास - फूस की झौंपड़ियों में रहते थे। किन्तु इस दौर की पृथ्वी बहुत मनोहारी थी। स्वच्छ जल से भरी कल - कल बहती नदियां व हरे भरे वृक्ष उन्हें बर - बस मोह लेते थे।
ऐसे ही विचरण करते हुए वे एक झौंपड़ी में पहुंच गये जहां किसी विवाहित जोड़े से भेंट हो गयी। पहले तो वह विवाहित जोड़ा उन्हें देखकर घबरा गया किन्तु समझाने पर भरोसा हुआ कि वह उन्हीं के भविष्य से आया है।
आधुनिक पुरुष अहंकार पूर्वक बोला - ‘‘देखो तुम्हारे दौर से होते हुए आधुनिक दौर तक मैंने कितनी प्रगति कर ली है। अब मैं न केवल जल - थल - नभ में स्वच्छन्द विचरण कर सकता हुं बल्कि भविष्य से अतीत में आ पहुंचा हूँ आप लोगों को बताने कि मैं ने कितनी प्रगती कर ली है। अब मैं कहां से कहां पहुंच चुका हू¡।
पुरातन पुरुष बोला - ‘‘तुम्हारी प्रगति तो मुझे दिखाई दे ही रही है इससे मुझे बहुत प्रसन्नता है, तुम्हारी प्रगति से लगता है तुम्हारे दौर की पृथ्वी हमारे दौर से भी कहीं अधिक सुन्दर होगी, क्या तुम्हारे समय की नदियों में भी इतना ही निर्मल जल बहता है। क्या तुम्हारे दौर की हवा में भी इसी तरह फूलों की सुगन्ध समायी रहती है। तुम्हारी प्रगति के अनुसार तुम्हारे दौर की पृथ्वी इससे भी अधिक हरी - भरी और सुन्दर होगी, सही कहा ना?’’
आधुनिक पुरुष को पुरातन पुरुष से ऐसे प्रश्नों की उम्मीद नहीं थी वह सकुचा गया और बोला - ‘‘हमारे दौर की नदियों में इतना शुद्ध जल नहीं है अपितु इससे अधिक गन्दी हो चुकी है किन्तु हमने जल शुद्ध करने के यन्त्र बना लिय हैं। तुम्हारे दौर की हवा तो बहुत शुद्ध है। हमारे दौर में तो हवा भी दूषित हो चुकी है। नवीन नगरों व रास्तों के निर्माण व विकास के लिये बहुत से हरे - भरे क्षेत्र को भी हमें वन विहीन करना पड़ा किन्तु यह सब तो विकास की प्रक्रिया है’’
पुरातन पुरुष आश्चर्य से बोला - ‘‘अच्छा फिर तुम्हारे समय का विकास तो अद्भुत है, अच्छा यह बताओ तुम लोग रहते तो प्रेम से हो ना कहीं झगड़ते तो नहीं?’’
आधुनिक पुरुष बोला - ‘‘हमार दौर में साम्प्रदायिक झगड़े बहुत अधिक है। साम्प्रदायिक कट्टरता में मानव मानव का ही दुश्मन बन बैठा है, युद्ध की विभिषिका से इस समय समूचा विश्व गिरा हुआ है। हथियारों के दौड़ में हमने इतने विनाशकारी हथियार बना लिये हैं कि अब उनकी सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हो गया है। यदि किसी गलत हाथों में पड़ गये तो पल भर में ही पृथ्वी को नष्ट कर सकते हैं’’
पुरातन पुरुष इस बार गम्भीर था, बोला - ‘‘विकास की दौड़ में तुम अपने ही विनाश का सामान बना बैठे, यह तो विकास नहीं हुआ, अच्छा जरा यह बताओ अपनी संस्कृति को सहेज रखा है या उसे भी विकास की भेंट चढा बैठे?’’
आधुनिक पुरुष निरूत्तर सा हो चुका था, बोला - ‘‘संस्कृतियों को सहेजने के लिये हमारे पास समय ही नहीं है। हम अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि इसके बारे में सोच ही नहीं पाते, विवाह परम्परा तो लगभग समाप्ति की ओर है, युवा मादकता व व्याभिचारिता में आकण्ठ डूबे हैं। नास्तिकों की संख्या भी निरन्तर बढ़ रही है’’
पुरातन पुरुष आधुनिक पुरुष के साथ आई महिला की तरफ ईशारा करके बोला - ‘‘क्या तुम्हारे समय की सारी महिलाएं अपनी इच्छा से इस प्रकार के अमर्यादित वस्त्र पहनती है या तुम लोगो ने इन्हें बाध्य कर रखा है?’’
आधुनिक पुरुष बोला - ‘‘हम तुम्हारी दकियानूसी नहीं है। हमारे दौर में महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। तुम्हारे दौर की तरह हम उन्हें ‘देवी’ का दर्जा नहीं देते । हमारे दौर की महिलाएं मात्र ‘भोग्या’ है और यह बात उनके मन मस्तिष्क में इस तरह बैठ चुकी है कि यदि कोई इन्हें मर्यादा में रहने को कह भी दें तो ये खुद उनका कड़ा विरोध कर देंगी, हमें कहने की आवश्यकता ही नहीं होगी’’
इस बार पुरातन पुरुष का धैर्य टूट चुका था, वह क्रोधित हो उठा और बोला - ‘‘तुम जिस विकास का ढिंढोरा पीटने के लिये आये हो वो विनाश के अतिरिक्त् कुछ नहीं है। तुमने समूची पृथ्वी का वातावरण दूषित कर दिया। पवित्र नदियों के निर्मल जल को गंदा करने का पाप कर डाला। हवा तक को दूषित कर डाला। अपने संस्कारों व मूल्यों को भी भूला दिया। महिलाओं को ‘भगवती’ से ‘भोग्या’ बना दिया। आपसी सौहार्द्र खत्म कर दिया। पूरी पृथ्वी को समाप्त करने के विनाशकारी हथियार बनाकर बैठे हो। यदि इन सबको तुम‘विकास’ कहते हो तो फिर ‘विनाश’ की परिभाषा क्या होगी? इससे पहले कि मैं तुम्हे शाप दूं, मेरे सामने से चले जाओ?
आधुनिक पुरुष घबरा गया और अपने वर्तमान युग में लौट आया। उसका अहंकार अब चूर हो चुका था। विकास के तमाम आधुनिक यन्त्र अब उसे विषैले सर्पों की भांति दिखाई दे रहे थे जो दिन - प्रतिदिन मानवता को डस रहे थे।