Friday, 15 September 2017

चल मुसाफिर चल

चल मुसाफिर चल तेरा सफर हुआ अब पूरा कोई स्वप्न रहा ना अधूरा नहीं दूर अब मंजिल तेरी साँस बंधी जिस डोर वो डोर हुई कमजोर अब रहना ना इक भी पल चल मुसाफिर चल हो पिता पुत्र या भाई ना साथ चलेगा कोई ना आज चले ना कल चल मुसाफिर चल ये जीवन तो है इक डेरा अब दूर देश है बसेरा वो बुला रहा तुझे चल चल मुसाफिर चल बहुत चल चुका अब रूक तू अब चुका है थक अब थकान मिटाले चल चल मुसाफिर चल पवन प्रजापति ‘पथिक’

इन आँखों की और कोई चाह नही

इन आँखों की और कोई चाह नही
बन के ख्वाब तू इनमे समाती रहे
बन के बांसुरी होठो को छू के सनम
मेरी सांसो से तू गीत गाती रहे

Thursday, 14 September 2017

ये बता दे रहूँ कैसे मैं होश में

ये बता दे रहूँ कैसे मैं होश में
तू सिमट के जो आ जाए आगोश में
तेरी सांसो में सांसे मेरी घुल गई
होठ भी हो गए मेरे खामोश से
 ये जो नजरें तेरी यूँ हया से झुकी
यूँ लगा कि अभी होश खो देंगे हम
बन के धागा कोई खुद में तुमको सनम
मोतियों की तरह बस पिरो लेंगें हम

Sunday, 10 September 2017

माधवी

लघु कथा
माधवी गुमसुम सी बैठी अतीत की यादों के पन्ने पलट रही थी, पांच साल पहले का वो दृश्य आज भी उसके जेहन में ताजा है जब एक सड़क दुर्घटना में सुनील उसे छोड़ कर चला गया था। माधवी पर तो मानों दुःखों का पहाड़ ही टूट गया था। उनकी शादी को महज 6 साल ही हुए थे। प्रतीक उस समय सिर्फ चार साल का था। माधवी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सुनील इस तरह से उसे छोड़ कर चला जाएगा। उसके जाने के बाद माधवी सिलाई कर अपना गुजारा करती थी। वो इसी उधेड़बुन में खोई हुई ही थी कि घड़ी पर उसकी नजर पड़ी जो साढ़े तीन बजा रही थी। प्रतीक हमेशा तो तीन बजे आ जाता है आज आधा घण्टा ऊपर हो गया। विचारों के सागर में डूबती उतराती माधवी को समय का पता ही नहीं चला। वो दरवाजे की तरफ लपकी। तभी याद आया कि पड़ौस वाले शर्माजी बेटा भी तो प्रतीक के साथ ही पढ़ता है शायद उसके साथ ना चला गया हो। वो तुरन्त शर्माजी के घर की ओर भागी तो पता चला कि उनका बेटे की तबियत ठीक नहीं होने की वजह से वो स्कूल ही नहीं गया। अब तो माधवी का दिल बैठा जा रहा था। सभी पड़ौसियों से पूछ लिया लेकिन प्रतीक का पता नहीं चल रहा था। एक घण्टे से ज्यादा का समय हो गया था और माधवी के दिल में तो बस बुरे ख्याल ही हा रहे थे.‘‘.कहीं प्रतीक भी... नहीं नहीं ...... ऐसा नहीं हो सकता...’’
माधवी प्रतीक को ढूंढती ढूंढती घर की तरफ आई ही थी तभी पीछे से आवाज आई एक आवाज ने उसके कदम रोक दिए. माधवी मुड़ी तो देखा प्रतीक बस्ता लिए हंसता हुआ आ रहा था।
‘‘कहाँ था शैतान मैं कब से तुझे ढूंढ रही हूँ..’’
‘‘माँ.. वो बस स्टेण्ड पर कोई मदारी खेल दिखा रहा था तो मैं खेल देखने रूक गया’’
माधवी ने प्रतीक को अपने आँचल में छिपा लिया.। वो उसे अपने से चिपकाए लगातार रोए जा रही थी और प्रतीक उसके आँसूओं में नहाता हुआ मा़ँ के रोने के कारण को समझने का असफल प्रयास कर रहा था।

Friday, 8 September 2017

मधुर मिलन की रात


सखी कल रात की बात तो सुन
जब चांदनी चटक खिली होगी
नदिया इक प्रेम विवश होकर
सागर से जा यूं मिली होगी
सेज पे बैठी गौरी के भी
नयनों में कोई समाया होगा
देख पिया को सम्मुख मन का
भाव आंखों में आया होगा
महेन्दी रचे हाथों में उसने
चेहरा ढांप लिया होगा
शायद सजना के चेहरे के
भावों को भांप लिया होगा।
लज्जा की दीवार सखी री
शायद तब दरक गई होगी
गौरी के कांधे से जब वो
चुनरी सरक गई होगी
हृदय की बातें भी तो सखी
आंखों ने तब बोली होगी
लज्जा से बन्द हुई आँखें
गौरी ने जब खोली होगी
सुन सखी प्रेम के झूलों में
जब वो दोनों झूले होंगे
प्रेम के उन झौंको में वो
सारी दूनिया भूले होंगे