चल मुसाफिर चल
तेरा सफर हुआ अब पूरा
कोई स्वप्न रहा ना अधूरा
नहीं दूर अब मंजिल
तेरी साँस बंधी जिस डोर
वो डोर हुई कमजोर
अब रहना ना इक भी पल
चल मुसाफिर चल
हो पिता पुत्र या भाई
ना साथ चलेगा कोई
ना आज चले ना कल
चल मुसाफिर चल
ये जीवन तो है इक डेरा
अब दूर देश है बसेरा
वो बुला रहा तुझे चल
चल मुसाफिर चल
बहुत चल चुका अब रूक
तू अब चुका है थक
अब थकान मिटाले चल
चल मुसाफिर चल
पवन प्रजापति ‘पथिक’
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