Friday, 8 September 2017

मधुर मिलन की रात


सखी कल रात की बात तो सुन
जब चांदनी चटक खिली होगी
नदिया इक प्रेम विवश होकर
सागर से जा यूं मिली होगी
सेज पे बैठी गौरी के भी
नयनों में कोई समाया होगा
देख पिया को सम्मुख मन का
भाव आंखों में आया होगा
महेन्दी रचे हाथों में उसने
चेहरा ढांप लिया होगा
शायद सजना के चेहरे के
भावों को भांप लिया होगा।
लज्जा की दीवार सखी री
शायद तब दरक गई होगी
गौरी के कांधे से जब वो
चुनरी सरक गई होगी
हृदय की बातें भी तो सखी
आंखों ने तब बोली होगी
लज्जा से बन्द हुई आँखें
गौरी ने जब खोली होगी
सुन सखी प्रेम के झूलों में
जब वो दोनों झूले होंगे
प्रेम के उन झौंको में वो
सारी दूनिया भूले होंगे

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