बरखा बहादुर ..... भाग 2
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कहते हैं वक्त से बड़ा कोई मरहम आज तक नहीं बना। ये वो दवा है जो बड़े से बड़े घाव को भर देती है। बरखा के जाने के बाद चम्पा ही उसके जीवन का हिस्सा बन गई थी। बहादुर ने बड़े प्यार से बच्ची का नाम चम्पा रखा थ। चम्पा के लिए बहादुर ने दूसरी शादी नहीं की। उसके सहारे बहादुर बरखा को भूलने की कोशिश करता। चम्पा थी भी अपने नाम के अनुरुप बिल्कुल कोमल फूल जैसी। बहादुर के लिए चम्पा ही अब जीने का मकसर बद चुकी थी। मजदूरी करना बन्द कर बहादुर ने अब हाथ ठेला लगाना शुरू कर दिया जिस पर वह बच्चों के खिलौने व चौकलेट बेचा करता। चम्पा ठेले पर बैठी उसके पास खेलती रहती। जब थक जाती तो ठेले के नीचे बने कपड़े के अस्थाई झूले में उसे सुला देता। कुल मिलाकर बहादुर उसे मां व बाप दोनों का प्यार देने की पूरी कोशिश करता।
वक्त का पहिया चलता रहा और उसके पहियों से उड़ती धूल बरखा की यादों पर जमती रही। चम्पा अब छः बरस की हो चुकी थी। पास ही के सरकारी स्कूल में बहादुर ने उसका दाखिला करवा दिया था। वह सुबह उसको तैयार कर स्कूल भेजता फिर अपने काम पर जाता। चम्पा के प्रति प्रेम ने बहादुर के स्मृति पटल पर लगी चम्पा की यादों की तस्वीरों को धुन्धला कर दिया था। हां कभी रात को चम्पा के सो जाने के बाद जब एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता तो वह उससे मुंह मोड़कर पुरानी यादों की ओर रूख कर लिया करता।
समय अपनी गति से चलता रहा। चम्पा अब युवा हो चुकी थी। हूबहू बरखा की तरह लगती थी। चम्पा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही गुणवान भी। वो बहादुर का पूरा ध्यान रखती। एक बार जब बहादुर गम्भीर बिमार पड़ गया तो पूरे तीन दिन तक किसी बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती रही।
कहते हैं कि जब तक पिता कन्या दान ना कर दे तब तक सामाजिक दायित्वों से उऋण नहीं हो सकता। बहादुर को भी यही चिन्ता खाए जा रही थी। उसे अब चम्पा के लिए योग्य वर की तलाश थी जो ‘चन्दन’ के रूप में पूरी हुई। चन्दन पास ही के गांव में रहता था। बहादुर ने थोड़े थोड़े करके जो पैसे बचा कर रखे थे वो चम्पा के विवाह में लगा दिए। चम्पा के जाने के बाद बहादुर अकेला हो गया था।
घड़ी रात के दो बजा रही थी। बहादुर अतीत से निकल कर वर्तमान में आ चुका था। चम्पा के चले जाने के बाद एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता। बहादुर की उम्र हालांकि ज्यादा नहीं थी लेकिन जिम्मेदारियों के बोझ से वह वक्त से पहले ही बूढ़ा दिखने लग गया था। अब न उसे खाने की सुधि रहती ना शरीर का ध्यान रहता, नतीजतन वह लगातार बीमार रहने लग गया। चम्पा कभी कभार आकर उसे सम्भाल जाया करती लेकिन वह कभी अपनी हालत को चम्पा के सामने जाहिर नहीं होने देता। आखिर ऐसा कब तक चलता, एक बार ठेले के पास खड़ा खड़ा गश खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। आस - पड़ौस के लोग उसे जानते थे। तुरन्त अस्पताल लेकर गए और अस्पताल में भर्ती करवा दिया। सबको मालूम था कि चम्पा के सिवा दुनिया में उसका कोई नहीं है सो चम्पा को इतला दी। चम्पा दौड़ी हुई अस्पताल पहुंची।
बहादुर को बेड पर अचेत पड़ा देख चम्पा की आंखे सजल हो गई। वो पिता जिसने अपनी बेटी के लिए अपना जीवन आहूत कर दिया था आज इस हालत में पड़ा था। चम्पा तीन दिन तक बहादुर की देखभाल करती रही। रात को पलंग के पास फर्श पर लेट जाती, थोड़ी सी आवाज होते ही उठकर उसे सम्भालती। तीन दिन बाद बहादुर की हालत में सुधार हुआ तो वो चम्पा से बोला ‘‘बेटी अब मैं ठीक हूं, तुम अपने घर चली जाओ’’
चम्पा बोली — ‘‘पिताजी मैं आपको ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती, आज से आप मेरे साथ ही रहेंगे। ’’
बहादुर बोला - ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे साथ नहीं रह सकता, बेटी के घर का तो पानी भी पीना पाप होता है, मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ मेरी चिन्ता मत करो’’
चम्पा ने कहा ‘‘कैसा पाप पिताजी मेरे लिए आपने अपना जीवन झौंक दिया क्या मेरा आपके प्रति कोई कर्तव्य नहीं, क्या सारे कर्तव्य सिर्फ बेटों के लिए ही है’’
इसी दौरान चन्दन भी वहां पहुंच जाता है
‘‘पिताजी चम्पा ठीक ही तो कह रही है और वैसे भी मैंने बचपन से मां - बाप का प्यार नहीं देखा है, आप साथ रहेंगे तो पिता का स्नेह भी मिल जाएगा, चलिए बाहर गाड़ी आपका इन्तजार कर रही है।’’
बहादुर अब मना करने की स्थिति में नहीं था। चम्पा जैसी पुत्री के लिए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था।
इति
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कहते हैं वक्त से बड़ा कोई मरहम आज तक नहीं बना। ये वो दवा है जो बड़े से बड़े घाव को भर देती है। बरखा के जाने के बाद चम्पा ही उसके जीवन का हिस्सा बन गई थी। बहादुर ने बड़े प्यार से बच्ची का नाम चम्पा रखा थ। चम्पा के लिए बहादुर ने दूसरी शादी नहीं की। उसके सहारे बहादुर बरखा को भूलने की कोशिश करता। चम्पा थी भी अपने नाम के अनुरुप बिल्कुल कोमल फूल जैसी। बहादुर के लिए चम्पा ही अब जीने का मकसर बद चुकी थी। मजदूरी करना बन्द कर बहादुर ने अब हाथ ठेला लगाना शुरू कर दिया जिस पर वह बच्चों के खिलौने व चौकलेट बेचा करता। चम्पा ठेले पर बैठी उसके पास खेलती रहती। जब थक जाती तो ठेले के नीचे बने कपड़े के अस्थाई झूले में उसे सुला देता। कुल मिलाकर बहादुर उसे मां व बाप दोनों का प्यार देने की पूरी कोशिश करता।
वक्त का पहिया चलता रहा और उसके पहियों से उड़ती धूल बरखा की यादों पर जमती रही। चम्पा अब छः बरस की हो चुकी थी। पास ही के सरकारी स्कूल में बहादुर ने उसका दाखिला करवा दिया था। वह सुबह उसको तैयार कर स्कूल भेजता फिर अपने काम पर जाता। चम्पा के प्रति प्रेम ने बहादुर के स्मृति पटल पर लगी चम्पा की यादों की तस्वीरों को धुन्धला कर दिया था। हां कभी रात को चम्पा के सो जाने के बाद जब एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता तो वह उससे मुंह मोड़कर पुरानी यादों की ओर रूख कर लिया करता।
समय अपनी गति से चलता रहा। चम्पा अब युवा हो चुकी थी। हूबहू बरखा की तरह लगती थी। चम्पा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही गुणवान भी। वो बहादुर का पूरा ध्यान रखती। एक बार जब बहादुर गम्भीर बिमार पड़ गया तो पूरे तीन दिन तक किसी बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती रही।
कहते हैं कि जब तक पिता कन्या दान ना कर दे तब तक सामाजिक दायित्वों से उऋण नहीं हो सकता। बहादुर को भी यही चिन्ता खाए जा रही थी। उसे अब चम्पा के लिए योग्य वर की तलाश थी जो ‘चन्दन’ के रूप में पूरी हुई। चन्दन पास ही के गांव में रहता था। बहादुर ने थोड़े थोड़े करके जो पैसे बचा कर रखे थे वो चम्पा के विवाह में लगा दिए। चम्पा के जाने के बाद बहादुर अकेला हो गया था।
घड़ी रात के दो बजा रही थी। बहादुर अतीत से निकल कर वर्तमान में आ चुका था। चम्पा के चले जाने के बाद एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता। बहादुर की उम्र हालांकि ज्यादा नहीं थी लेकिन जिम्मेदारियों के बोझ से वह वक्त से पहले ही बूढ़ा दिखने लग गया था। अब न उसे खाने की सुधि रहती ना शरीर का ध्यान रहता, नतीजतन वह लगातार बीमार रहने लग गया। चम्पा कभी कभार आकर उसे सम्भाल जाया करती लेकिन वह कभी अपनी हालत को चम्पा के सामने जाहिर नहीं होने देता। आखिर ऐसा कब तक चलता, एक बार ठेले के पास खड़ा खड़ा गश खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। आस - पड़ौस के लोग उसे जानते थे। तुरन्त अस्पताल लेकर गए और अस्पताल में भर्ती करवा दिया। सबको मालूम था कि चम्पा के सिवा दुनिया में उसका कोई नहीं है सो चम्पा को इतला दी। चम्पा दौड़ी हुई अस्पताल पहुंची।
बहादुर को बेड पर अचेत पड़ा देख चम्पा की आंखे सजल हो गई। वो पिता जिसने अपनी बेटी के लिए अपना जीवन आहूत कर दिया था आज इस हालत में पड़ा था। चम्पा तीन दिन तक बहादुर की देखभाल करती रही। रात को पलंग के पास फर्श पर लेट जाती, थोड़ी सी आवाज होते ही उठकर उसे सम्भालती। तीन दिन बाद बहादुर की हालत में सुधार हुआ तो वो चम्पा से बोला ‘‘बेटी अब मैं ठीक हूं, तुम अपने घर चली जाओ’’
चम्पा बोली — ‘‘पिताजी मैं आपको ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती, आज से आप मेरे साथ ही रहेंगे। ’’
बहादुर बोला - ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे साथ नहीं रह सकता, बेटी के घर का तो पानी भी पीना पाप होता है, मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ मेरी चिन्ता मत करो’’
चम्पा ने कहा ‘‘कैसा पाप पिताजी मेरे लिए आपने अपना जीवन झौंक दिया क्या मेरा आपके प्रति कोई कर्तव्य नहीं, क्या सारे कर्तव्य सिर्फ बेटों के लिए ही है’’
इसी दौरान चन्दन भी वहां पहुंच जाता है
‘‘पिताजी चम्पा ठीक ही तो कह रही है और वैसे भी मैंने बचपन से मां - बाप का प्यार नहीं देखा है, आप साथ रहेंगे तो पिता का स्नेह भी मिल जाएगा, चलिए बाहर गाड़ी आपका इन्तजार कर रही है।’’
बहादुर अब मना करने की स्थिति में नहीं था। चम्पा जैसी पुत्री के लिए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था।
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