Tuesday, 27 November 2018

बरखा बहादुर ..... भाग 2

बरखा बहादुर ..... भाग 2
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कहते हैं वक्त से बड़ा कोई मरहम आज तक नहीं बना। ये वो दवा है जो बड़े से बड़े घाव को भर देती है। बरखा के जाने के बाद चम्पा ही उसके जीवन का हिस्सा बन गई थी। बहादुर ने बड़े प्यार से बच्ची का नाम चम्पा रखा थ। चम्पा के लिए बहादुर ने दूसरी शादी नहीं की। उसके सहारे बहादुर बरखा को भूलने की कोशिश करता। चम्पा थी भी अपने नाम के अनुरुप बिल्कुल कोमल फूल जैसी। बहादुर के लिए चम्पा ही अब जीने का मकसर बद चुकी थी। मजदूरी करना बन्द कर बहादुर ने अब हाथ ठेला लगाना शुरू कर दिया जिस पर वह बच्चों के खिलौने व चौकलेट बेचा करता। चम्पा ठेले पर बैठी उसके पास खेलती रहती। जब थक जाती तो ठेले के नीचे बने कपड़े के अस्थाई झूले में उसे सुला देता। कुल मिलाकर बहादुर उसे मां व बाप दोनों का प्यार देने की पूरी कोशिश करता।
वक्त का पहिया चलता रहा और उसके पहियों से उड़ती धूल बरखा की यादों पर जमती रही। चम्पा अब छः बरस की हो चुकी थी। पास ही के सरकारी स्कूल में बहादुर ने उसका दाखिला करवा दिया था। वह सुबह उसको तैयार कर स्कूल भेजता फिर अपने काम पर जाता। चम्पा के प्रति प्रेम ने बहादुर के स्मृति पटल पर लगी चम्पा की यादों की तस्वीरों को धुन्धला कर दिया था। हां कभी रात को चम्पा के सो जाने के बाद जब एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता तो वह उससे मुंह मोड़कर पुरानी यादों की ओर रूख कर लिया करता।
    समय अपनी गति से चलता रहा। चम्पा अब युवा हो चुकी थी। हूबहू बरखा की तरह लगती थी। चम्पा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही गुणवान भी। वो बहादुर का पूरा ध्यान रखती। एक बार जब बहादुर गम्भीर बिमार पड़ गया तो पूरे तीन दिन तक किसी बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती रही।
कहते हैं कि जब तक पिता कन्या दान ना कर दे तब तक सामाजिक दायित्वों से उऋण नहीं हो सकता। बहादुर को भी यही चिन्ता खाए जा रही थी। उसे अब चम्पा के लिए योग्य वर की तलाश थी जो ‘चन्दन’ के रूप में पूरी हुई। चन्दन पास ही के गांव में रहता था। बहादुर ने थोड़े थोड़े करके जो पैसे बचा कर रखे थे वो चम्पा के विवाह में लगा दिए। चम्पा के जाने के बाद बहादुर अकेला हो गया था।
    घड़ी रात के दो बजा रही थी। बहादुर अतीत से निकल कर वर्तमान में आ चुका था। चम्पा के चले जाने के बाद एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता।  बहादुर की उम्र हालांकि ज्यादा नहीं थी लेकिन जिम्मेदारियों के बोझ से वह वक्त से पहले ही बूढ़ा दिखने लग गया था। अब न उसे खाने की सुधि रहती ना शरीर का ध्यान रहता, नतीजतन वह लगातार बीमार रहने लग गया। चम्पा कभी कभार आकर उसे सम्भाल जाया करती लेकिन वह कभी अपनी हालत को चम्पा के सामने जाहिर नहीं होने देता।  आखिर ऐसा कब तक चलता, एक बार ठेले के पास खड़ा खड़ा गश खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। आस - पड़ौस के लोग उसे जानते थे। तुरन्त अस्पताल लेकर गए और अस्पताल में भर्ती करवा दिया। सबको मालूम था कि चम्पा के सिवा दुनिया में उसका कोई नहीं है सो चम्पा को इतला दी। चम्पा दौड़ी हुई अस्पताल पहुंची।
बहादुर को बेड पर अचेत पड़ा देख चम्पा की आंखे सजल हो गई। वो पिता जिसने अपनी बेटी के लिए अपना जीवन आहूत कर दिया था आज इस हालत में पड़ा था। चम्पा तीन दिन तक बहादुर की देखभाल करती रही। रात को पलंग के पास फर्श पर लेट जाती, थोड़ी सी आवाज होते ही उठकर उसे सम्भालती। तीन दिन बाद बहादुर की हालत में सुधार हुआ तो वो चम्पा से बोला ‘‘बेटी अब मैं ठीक हूं, तुम अपने घर चली जाओ’’
चम्पा बोली — ‘‘पिताजी मैं आपको ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती, आज से आप मेरे साथ ही रहेंगे। ’’
बहादुर बोला - ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे साथ नहीं रह सकता, बेटी के घर का तो पानी भी पीना पाप होता है, मैं अब बिल्कुल  ठीक हूँ मेरी चिन्ता मत करो’’
चम्पा ने कहा ‘‘कैसा पाप पिताजी मेरे लिए आपने अपना  जीवन झौंक दिया क्या मेरा आपके प्रति कोई कर्तव्य नहीं, क्या सारे कर्तव्य सिर्फ बेटों के लिए ही है’’
इसी दौरान चन्दन भी वहां पहुंच जाता है
‘‘पिताजी चम्पा ठीक ही तो कह रही है और वैसे भी मैंने बचपन से मां - बाप का प्यार नहीं देखा है, आप साथ रहेंगे तो पिता का स्नेह भी मिल जाएगा, चलिए बाहर गाड़ी आपका इन्तजार कर रही है।’’
बहादुर अब मना करने की स्थिति में नहीं था। चम्पा जैसी पुत्री के लिए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था।
इति

Monday, 26 November 2018

लघु कथा : मासूम सवाल


झौंपड़ी के दरवाजे पर बैठी पांच साल की धनिया कब से मां का इन्तजार कर रही है। 
''हमेशा तो इस वक्त तक मां आ जाती है,। जोरों की भूख लगी है लेकिन मां आएगी तभी तो कुछ खाने को मिलेगा, कुछ ठण्डा बासी भी नहीं है खाने को।''
इतने में सामने से आती हुई रज्जो को देख धनिया अपनी भूख को सांत्वना देती है।
''क्या मां कितनी देर लगा दी, कहां रूक गई थी आज इतनी देर, पता है कब से भूखी बैठी हूं, घर में एक दाना भी नहीं है खाने को।''
''अरे तेरे लिए ही तो रूकी थी, नहीं तो कब की आ जाती''
गठरी खोलती हुई रज्जो बोलती है। धनिया कुछ बोलती इससे पहले ही गठरी में कचौरियां व जलेबी देख आंखों में आश्चर्यमिश्रित चमक आ जाती है
''अरे मां आज कहां से लाई ये सब''
''अभी चुनाव चल रहे हैं ना, एक नेताजी गरीबों को भोजन बांट रहे थे तो ले आई। अभी दस — पन्द्रह दिन तक ये सब चलता रहेगा''
धनिया मासूमियत से पूछ बैठी — ''मां सिर्फ दस — पन्द्रह दिन ही क्यूं, ये चुनाव साल भर क्यूं नहीं चलते''
धनिया के सवाल का रज्जो के पास कोई जवाब नहीं था

Saturday, 24 November 2018

लघुकथा — विचारधारा या व्यक्तिगत स्वार्थ

लघुकथा — विचारधारा या व्यक्तिगत स्वार्थ
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जगन्नाथ प्रसाद अपने क्षेत्र के बहुत बड़े नेता थे। आज उनके घर पर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था। सफेद पोशाक पहने नेताजी बड़ी सी कुर्सी पर पसरे हुए थे, सामने कार्यकर्ता फर्श पर बैठे थे। नेताजी अपने कार्यकर्ताओं को समझा रहे थे। ''देखो भाईयों पार्टी हमेशा विचारधारा से चलती है, और लड़ाई भी विचारधारा की ही है। अब देखिए विरोधी पार्टी को, उनकी विचारधारा देश के खिलाफ है, अब भला जिस पार्टी की विचारधारा ही देश के खिलाफ हो भला वो पार्टी कभी देश का भला कैसे सोच सकती हैं।'' नेताजी की हर बात बरास्ते कान कार्यकर्ता के मन तक पहुंच रही थी।
''अब जरा अपनी पार्टी को ही देखिए, देश के बारे में सोचती है इसी लिए हम पार्टी के साथ है। आज के समय में देश के बारे में सिर्फ हमारी पार्टी ही सोचती है।'' कार्यकर्ता कृतज्ञ भाव से नेताजी की ओर देख रहे थे और ऐसे नेताजी का अनुसरण कर अपने आपको धन्य समझ रहे थे।
तभी सामने चल रही टीवी पर न्यूज फ्लेश होती है —
'मंत्री जगन्नाथ प्रसाद का टिकट कटा, उनकी जगह नये चेहरे को दिया गया मौका'
''पार्टी ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। मैंने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है। मैं इसका बदला पार्टी से लेकर रहूंगा''
तभी नेताजी का फोन बज उठता है विरोधी पार्टी का फोन है जो उन्हे अपनी पार्टी की ओर से टिकट देने का प्रस्ताव रखती है। नेताजी के चेहरे पर चमक लौट आती है और तुरन्त तुरन्त अपनी कार लेकर निकल पड़ते हैं।
विचारधारा को व्यक्तिगत स्वार्थ के काले बादलों ने घेर लिया और नेताजी के कार्यकर्ता भी अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

Tuesday, 20 November 2018

बरखा बहादुर भाग — 1

बरखा बहादुर 
भाग — 1
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लगभग 10 बाई 10 के कमरे में मरियल सी खाट पर लेटा बहादुर काफी देर से बस पंखे की ओर ही ताके जा रहा था जो मात्र घूमने की औपचारिकता ही पूरी कर रहा था। नीन्द उसकी आंखों से कासों दूर थी। वो तो बस अतीत की गलियों में कहीं खोया हुआ था। उसे अब भी याद है जब वो नेपाल से ब्याह करके अपनी नई नवेली दुल्हन के साथ रामपुर आया था। रात में ‘गोरखे’ का काम करता और दिन में मजदूरी करता। कुल मिलाकर अपनी जिन्दगी से खुश था और संतुष्ट भी। बरखा से ब्याह के बाद तो मानों उसके बरसों से सूखे रेगिस्तान पर पहली बारीश की फुहारें पड़ी थी। कितने खुश थे वे दोनों। ब्याह के दो साल बाद का वो दिन भी उसे याद है जब बरखा ने उसे बताया कि वो पिता बनने वाला है। कितना खुश हुआ था वो उस दिन और हो भी क्यूं नहीं, आखिर उन दोनों का प्यार अब आकार ले रहा था। बहादुर अब बरखा का खूब ध्यान रखता, थोड़ा सा भी वजन उठा लेने पर बरखा को बच्चों की भांति डांट दिया करता। बरखा को भी डांट में आनन्द आता और आता क्यूं नहीं डांट में प्रेम और उसके प्रति चिन्ता मिली हुई थी।
यादों की गलियों में टहलते टहलते बहादुर उस वक्त में पहुंच गया जब बरखा प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। वह अस्पताल में प्रसूति कक्ष के बाहर बैठा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। बरखा की चीखें उसके कानों के रास्ते से होकर उसके दिल तक को बींध रही थी। प्रसव पीड़ा से अधिक पीड़ादायक कुछ नहीं हो सकता या यूं कहें कि प्रसव के बाद नारी का दूसरा जन्म होता है। लेकिन हाय री किस्मत, बरखा ये दूसरा जन्म नहीं ले पाई। फूल सी बच्ची के रूप में खुद को बहादुर के पास छोड़ बरखा हमेशा के लिए विदा हो गई। बहादुर कुछ समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उम्मीदों की नींव पर सपनों की जो ईमारत खड़ी की थी वो यूं ढह जाएगी। वक्त ने एक ही झटके में बहादुर की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। वो तय नहीं कर पा रहा था कि बच्ची को लेकर खुश हो या बरखा जाने का मातम मनाए... 
क्रमश:.......

Tuesday, 13 November 2018

चुनावी राजनीति पर एक कटाक्ष


छलने सिया फिर साधु भेष वाले आ गए
भूखों की थालियों में फिर निवाले आ गए
कल था सशस्त्र आज वो करबद्ध क्यूं खड़ा
लगता है फिर से दिन चुनाव वाले आ गए

Saturday, 10 November 2018

वो बचपन की दीवाली

वो बचपन की दीवाली
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ये भी कोई दीपावली है, दीपावली तो तब थी जब हम छोटे हुआ करते थे। सरकारी स्कूल में पढ़ते थे लिहाजा दीपावली की छुट्टियां भरपूर मिला करती थी। दिन भर की खेलकूद के बाद इन्तजार रहता था पटाखों का। शामको जब पिताजी थैले में भर के पटाखे लाते थे तो मानों बरसों से तपस्या में लीन ध्रुव को ईश्वर प्राप्ति हो गई हो। लक्ष्मी पूजन के दौरान पिताजी का ध्यान पूजा में रहता और हम सभी भाईयों का पटाखों की थैली में। पूजा के पश्चात सभी को बराबर बराबर बांटकर पटाखे दिये जाते, तब आज की तरह पटाखे फोड़ने पर किसी की काली नजर नहीं लगी थी (इसे सुप्रीम कोर्ट से जोड़कर ना देखें) देर रात तक पटाखे फोड़ने के बाद भी सुबह जल्दी नहा धोकर तैयार हो जाते। नए कपड़े जो पहनने का शौक था। जो सेलिब्रिटि फिलिंग उन कपड़ों में आती थी कसम से आज के महंगे से महंगे कपड़ों में नहीं आती है। नए कपड़े पहनकर बाहर दोस्तों को दिखाते और एक दूसरे के कपड़ों की तारीफ करते । जेब में थैली खोंसकर निकल पड़ते मोहल्ले में ''रामा—श्यामा'' करने तब हम ये नहीं देखते कि फलां व्यक्ति हमारी जान पहचान का है या नहीं या वो हमारे घर आए तो हम उसके घर जाएंगे। जो भी घर देखा बच्चों की टोली घुस जाती उस घर में। वो लोग हमें निराश भी नहीं करते। मोहल्ले में कुछ मुस्लिमों के घर भी थे लेकिन तब सोशल मीडिया नहीं था लिहाजा हिन्दु — मुसलमान का इतना लफड़ा नहीं था। दीपावली को वो भी हमारे लिए मिठाई बताशे रखते थे। घर लौटते लौटते मिठाई, बताशे इत्यादि से थैली पूरी भर जाया करती। फिर आपस में तुलना करते कि किसकी थैली ज्यादा भरी है।